मध्य प्रदेश
एक दिन पहले
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सागर में गुरु पूर्णिमा का विशेष आयोजन
आषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को पूरे देश में गुरु पूर्णिमा का पावन पर्व उत्साह के साथ मनाया जाता है। मध्य प्रदेश का सागर शहर प्राचीन काल से ही साधु-संतों और वीर शिरोमणियों की तपोभूमि रहा है। इसी धरा से जुड़े थे प्रसिद्ध संत देव प्रभाकर शास्त्री, जिन्हें भक्त श्रद्धा से दद्दा जी कहते थे। उनके ब्रह्मलीन होने के बाद सागर के मकरोनिया स्थित गौर नगर में उनकी स्मृति में एक भव्य मंदिर स्थापित किया गया है। इस बार गुरु पूर्णिमा के अवसर पर यहां एक विशाल महा-महोत्सव का आयोजन किया जा रहा है, जिसमें देश और विदेश से हजारों की संख्या में भक्त अपनी उपस्थिति दर्ज कराने पहुंच रहे हैं।
दद्दा जी की अनूठी साधना और विश्व रिकॉर्ड
ब्रह्मलीन गृहस्थ संत देव प्रभाकर शास्त्री की ख्याति उनके द्वारा किए गए धार्मिक कार्यों के कारण पूरी दुनिया में फैली थी। उन्होंने अपने जीवनकाल में कुल 131 बार सवा-सवा करोड़ पार्थिव शिवलिंगों के निर्माण का अनुष्ठान पूरा किया। उनकी इस अद्भुत उपलब्धि को गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में भी दर्ज किया गया है। इसके अलावा, उनके पांच प्रमुख आयोजनों को गोल्डन बुक ऑफ रिकॉर्ड में स्थान मिला, क्योंकि उनमें सर्वाधिक शिवलिंगों का निर्माण किया गया था। कुल मिलाकर, दद्दा जी ने विश्व कल्याण की भावना से प्रेरित होकर लगभग 6 अरब पार्थिव शिवलिंगों का निर्माण करवाया। उनका मानना था कि वे विश्व की जनसंख्या के बराबर पार्थिव शिवलिंगों की स्थापना करवा रहे हैं। पूरे देश में उनके 18 लाख से अधिक दीक्षित अनुयायी हैं, जो आज भी कटनी स्थित समाधि स्थल और सागर के मंदिर में आकर उन्हें नमन करते हैं।
जीवन का प्रारंभिक संघर्ष और शिक्षा
मंदिर के महंत केशव दास महाराज ने बताया कि दद्दा जी का जन्म अनंत चतुर्दशी के दिन जबलपुर जिले के कूड़ा ग्राम में हुआ था। उनके जीवन का प्रारंभिक दौर काफी संघर्षपूर्ण था। जब वे मात्र 8 वर्ष के थे, तब उनके पिता गिरधारी दत्त का निधन हो गया। इसके बाद उनकी माता ललिता देवी ने खेती-किसानी और शिष्य परिवारों से भिक्षा मांगकर उनका पालन-पोषण किया। दद्दा जी ने अपनी पूरी शिक्षा संस्कृत भाषा में प्राप्त की। खमरिया गांव से शुरू हुई उनकी शिक्षा का सफर काशी तक पहुंचा। उच्च शिक्षा ग्रहण करने के बाद वे करपात्री महाराज के सानिध्य में आए और उनके शिष्य बन गए। दद्दा जी की सरलता, सहजता और विलक्षण प्रतिभा देखकर करपात्री जी महाराज बेहद प्रभावित थे।
सामाजिक समरसता का संदेश
शास्त्री जी ने अपने महायज्ञ की शुरुआत संस्कारधानी जबलपुर से 1980 में की थी। उन्होंने 2020 तक निरंतर 131 बार सवा करोड़ पार्थिव शिवलिंग बनवाए। इन आयोजनों की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि वे पूजा और प्रसाद वितरण के दौरान सभी भक्तों को एक ही पंक्ति में बैठाते थे। इस व्यवस्था के पीछे उनका उद्देश्य धर्म और संस्कृति के साथ-साथ समाज में समरसता का संदेश देना था। आज सागर के मकरोनिया स्थित मंदिर में उनकी और उनकी पत्नी की प्रतिमाएं विराजमान हैं। यहां रोजाना सुबह-शाम आरती होती है और महंत द्वारा उनकी चरण सेवा की जाती है। मंदिर में उनके उपयोग की वस्तुएं जैसे पत्थर की थाली, लकड़ी की कटोरी, लोटा और पादुकाएं आज भी श्रद्धा के साथ सुरक्षित रखी गई हैं।
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