संतान नहीं हुई तो पेड़ों को बनाया परिवार, रीवा के दीनानाथ-ननकी ने 105 एकड़ बंजर ज़मीन पर उगा दिया 'प्रेम वन' मध्य प्रदेश 2 महीने पहले 71
रीवा के एक दंपती दीनानाथ कोल और ननकी देवी ने संतान न होने के दुख को प्रेरणा में बदलते हुए 10 हजार पौधे लगाकर 105 एकड़ बंजर भूमि को घने जंगल में बदल दिया। आज इस 'प्रेम वन' को देखने दूर-दूर से लोग पहुँचते हैं।

संतान न होने का दर्द अक्सर लोगों को निराशा की ओर धकेल देता है, लेकिन रीवा जिले के डभौरा क्षेत्र के धुरकुच गांव के दीनानाथ कोल और उनकी पत्नी ननकी देवी ने इसी पीड़ा को समाज और प्रकृति के लिए मिसाल बना दिया। संतान न होने पर इस दंपती ने पेड़ों को ही अपनी संतान और परिवार मान लिया और करीब 35 वर्षों की लगातार मेहनत से 10 हजार से अधिक पौधे रोपकर 105 एकड़ बंजर भूमि को घने जंगल में बदल दिया।

जो भूमि कभी वीरान, पथरीली और सूखी हुआ करती थी, आज वहां हरियाली की चादर बिछी है। आम, आंवला, अमरूद और बेर जैसे अनेक फलदार तथा औषधीय वृक्षों से सजा यह जंगल अब क्षेत्र के पर्यावरण और वन्य जीवों के लिए जीवनदायिनी धरोहर बन चुका है।

आम की गुठलियों से हुई शुरुआत

दीनानाथ कोल बताते हैं कि वर्ष 1990 में एक कार्यक्रम से लौटते समय उन्होंने रास्ते में फेंकी गई आम की गुठलियां इकट्ठा कीं और उन्हें बंजर भूमि में बो दिया। शुरुआत में कुछ पौधे नष्ट हो गए, फिर भी उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। धीरे-धीरे यह छोटा-सा प्रयास एक विशाल जंगल का रूप लेता चला गया।

पत्नी की प्रेरणा बनी संकल्प

दीनानाथ कहते हैं कि शादी के कई साल बाद भी संतान न होने पर उन्हें लोगों के ताने सुनने पड़े। इसी दौर में पत्नी ननकी देवी ने उनसे कहा कि अगर बच्चे नहीं हैं तो ऐसा काम किया जाए जिससे समाज में पहचान बने। इसके बाद दोनों ने पौधे लगाने का संकल्प लिया और जीवन भर इसी काम में जुट गए।

पानी की चुनौती के बावजूद नहीं मानी हार

जंगल को बचाने के लिए दंपती ने अपने प्रयासों से कुआं खुदवाया, लेकिन उसे अतिक्रमण बताकर पाट दिया गया। पानी की कमी से कई पौधे सूख गए, फिर भी दोनों ने हिम्मत नहीं छोड़ी। नलकूप की स्वीकृति मिल जाने के बावजूद आज तक उसका खनन नहीं हो पाया है।

प्रेम वन में बसा वन्य जीवन

दंपती के प्रेम और समर्पण से तैयार हुए इस 'प्रेम वन' में आज मोर, हिरण, नीलगाय, खरगोश और कई तरह के पक्षियों का बसेरा है। पक्षियों की चहचहाहट और चारों ओर फैली हरियाली के बीच दीनानाथ और ननकी देवी को अपने जीवन की सबसे बड़ी खुशी का अनुभव होता है। अब इस वन को देखने के लिए दूर-दूर से लोग आते हैं और उनके जज्बे को सलाम करते हैं।

प्रेरणा और पर्यावरण संरक्षण का जीवंत उदाहरण

दीनानाथ कोल और ननकी देवी की यह कहानी संदेश देती है कि दृढ़ इच्छाशक्ति, कठिन परिश्रम और निस्वार्थ सेवा से न केवल बंजर ज़मीन को हरा-भरा बनाया जा सकता है, बल्कि जीवन को भी नई सार्थकता दी जा सकती है। यह दंपती आज पूरे समाज के लिए प्रेरणा और पर्यावरण संरक्षण का जीवंत उदाहरण बन चुका है।

अंजलि सिंह पाबना की राज्य संवाददाता हैं, जो विभिन्न राज्यों की क्षेत्रीय खबरें और खानपान कवर करती हैं। स्थानीय घटनाओं, संस्कृति और जायके की कहानियों को वे करीब से रिपोर्ट करती हैं। अलग-अलग राज्यों की विविधता उनकी रिपोर्टिंग में नजर आती है।

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