अमेरिकी सैन्य रुख में बदलाव से सियोल में हलचल, क्या अब दक्षिण कोरिया अपनी सुरक्षा के लिए अमेरिका पर निर्भरता कम करेगा? विश्व 4 घंटे पहले 3
राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा संयुक्त सैन्य अभ्यास में कटौती के आदेश के बाद दक्षिण कोरिया ने अपनी रक्षा रणनीति में बड़े बदलाव शुरू कर दिए हैं। सियोल अब अमेरिकी सैन्य मदद के बजाय अपनी स्वतंत्र सैन्य क्षमता और कमान को मजबूत करने पर ध्यान केंद्रित कर रहा है।

अमेरिकी राष्ट्रपति के फैसले का सियोल पर असर

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के एक अप्रत्याशित आदेश ने दक्षिण कोरिया की राजधानी सियोल की सुरक्षा चिंताओं को बढ़ा दिया है। राष्ट्रपति ने दक्षिण कोरिया के साथ होने वाले संयुक्त सैन्य अभ्यासों में अचानक कटौती करने का निर्देश दिया है। इस फैसले के बाद सियोल में खलबली मचना स्वाभाविक है, क्योंकि दशकों से दक्षिण कोरिया अपनी सुरक्षा के लिए अमेरिका पर काफी हद तक निर्भर रहा है। हालांकि, दक्षिण कोरियाई प्रशासन ने स्पष्ट रूप से संकेत दिया है कि वे अपनी संयुक्त रक्षा व्यवस्था को किसी भी स्थिति में कमजोर नहीं होने देंगे। लेकिन साथ ही, अब सियोल अपनी सैन्य रणनीति पर पुनर्विचार करने और अमेरिकी निर्भरता को कम करने की दिशा में गंभीरता से कदम उठा रहा है।

संयुक्त सैन्य अभ्यास और दक्षिण कोरिया की नई रणनीति

ट्रंप के निर्देशों के बावजूद दक्षिण कोरिया ने अपने स्तर पर उल्ची फ्रीडम शील्ड सैन्य अभ्यास को जारी रखने का साहसी निर्णय लिया है। इस अभ्यास में दक्षिण कोरियाई सेना के करीब 18 हजार सैनिक भाग ले रहे हैं। यह कदम दर्शाता है कि भले ही अमेरिकी भागीदारी कम हो गई है, सियोल अपनी तैयारियों के मामले में कोई समझौता करने के मूड में नहीं है। अमेरिका की कम उपस्थिति के कारण पैदा हुए सुरक्षा अंतर को पाटने के लिए दक्षिण कोरिया संयुक्त राष्ट्र कमान से जुड़े 11 देशों के सैन्य कर्मियों के साथ समन्वय को और बेहतर बना रहा है।

युद्ध की बदलती चुनौतियां और नई ट्रेनिंग

अब दक्षिण कोरिया अपनी सेना के प्रशिक्षण के तौर-तरीकों में बड़े बदलाव करने की योजना बना रहा है। भविष्य की संभावित चुनौतियों को देखते हुए, बड़े पैमाने के युद्धाभ्यासों के बजाय, सियोल निम्नलिखित क्षेत्रों पर विशेष ध्यान केंद्रित करने जा रहा है:

  • छोटे स्तर के फील्ड अभ्यास जो अधिक प्रभावी हों।
  • कमांड सेंटर में युद्ध की जटिल परिस्थितियों का सटीक सिमुलेशन।
  • ड्रोन हमलों का मुकाबला करने के लिए विशेष तकनीकी ट्रेनिंग।
  • साइबर हमलों को नाकाम करने और डिजिटल सुरक्षा तंत्र को मजबूत करना।
  • जीपीएस सिग्नल को बाधित होने से बचाने और बाधित होने पर विकल्प तलाशने की तकनीक।

इन बदलावों के माध्यम से सियोल यह संदेश दुनिया को देना चाहता है कि अमेरिकी सहयोग कम होने के बावजूद उसकी सेना किसी भी संभावित संकट से निपटने में पूरी तरह सक्षम है।

स्वतंत्र रक्षा क्षमता पर जोर

राष्ट्रपति ली जे म्यांग के नेतृत्व में दक्षिण कोरिया अब अपनी स्वतंत्र रक्षा क्षमता को प्राथमिकता दे रहा है। ट्रंप के फैसले ने सियोल को यह अहसास करा दिया है कि सुरक्षा के लिए पूरी तरह से किसी दूसरे देश पर निर्भर रहना कितना जोखिम भरा हो सकता है। भविष्य की रणनीतियों में सैन्य बजट में वृद्धि और मिसाइल शक्ति का विस्तार शामिल है। इसके अलावा, दक्षिण कोरिया युद्धकालीन ऑपरेशनल कंट्रोल यानी ओपीकॉन को अपने हाथ में लेने की प्रक्रिया को भी तेज करना चाहता है। वर्तमान में, युद्ध जैसी स्थितियों में कमांड और कंट्रोल का जो ढांचा है, सियोल उसे बदलना चाहता है ताकि दक्षिण कोरियाई जनरल अपने सैनिकों पर सीधा नियंत्रण रख सकें।

वॉशिंगटन और प्योंगयांग के बीच वार्ता पर नजर

दक्षिण कोरिया की एक और बड़ी चिंता अमेरिका और उत्तर कोरिया के बीच होने वाली बातचीत है। राष्ट्रपति किम जोंग उन के साथ ट्रंप की संभावित वार्ता पर सियोल की पैनी नजर है। सियोल की यह मांग है कि अमेरिका दक्षिण कोरिया की सुरक्षा से जुड़े संवेदनशील मुद्दों पर वॉशिंगटन में अकेले फैसला न ले। दक्षिण कोरिया चाहता है कि यदि अमेरिका उत्तर कोरिया को कोई सुरक्षा रियायत देता है, तो इसके बदले में प्योंगयांग को अपने परमाणु हथियारों या सैन्य क्षमता के विषय पर ठोस और स्पष्ट कदम उठाने के लिए बाध्य किया जाए।

ईरान के साथ बढ़ते तनाव का असर

ट्रंप के फैसले के पीछे की एक अहम वजह ईरान भी मानी जा रही है। अमेरिका ने दक्षिण कोरिया से ईरान के विरुद्ध अपने अभियान में मदद मांगी थी, लेकिन सियोल ने उसमें प्रत्यक्ष रूप से शामिल होने से इनकार कर दिया था। अब दक्षिण कोरिया के सामने एक कठिन स्थिति है कि वह अमेरिका के साथ अपने रिश्तों में तनाव को कैसे कम करे। सियोल इस बात पर विचार कर रहा है कि क्या वह समुद्री सुरक्षा या गैर-युद्ध संबंधी क्षेत्रों में सीमित मदद दे सकता है, बशर्ते इससे वह सीधे ईरान युद्ध में न फंसे और न ही उसे अपने देश के घरेलू कानूनों का उल्लंघन करना पड़े।

निष्कर्ष: सियोल का सबक

ट्रंप के अचानक लिए गए इस फैसले ने दक्षिण कोरिया को यह बड़ा सबक दिया है कि अंतरराष्ट्रीय कूटनीति और सुरक्षा गारंटी कभी भी स्थिर नहीं होती। दक्षिण कोरिया अब एक संतुलन बनाने का प्रयास कर रहा है। एक तरफ वह अमेरिका के साथ अपने पारंपरिक सैन्य गठबंधन को बनाए रखना चाहता है, तो दूसरी तरफ वह अपनी स्वतंत्र सैन्य शक्ति और कमान क्षमता को इतनी मजबूती देना चाहता है कि भविष्य में किसी भी अप्रत्याशित परिस्थिति में उसका बचाव सुनिश्चित रहे। आने वाला समय दक्षिण कोरिया के लिए एक परीक्षा की घड़ी होगी, जहां उसे न केवल अपनी सुरक्षा बढ़ानी होगी, बल्कि अमेरिका के साथ अपने संबंधों को भी बचाए रखना होगा।

साहिल चौहान पाबना के वर्ल्ड अफेयर्स रिपोर्टर हैं, जो अंतरराष्ट्रीय खबरें और वैश्विक मामले कवर करते हैं। विदेश नीति, कूटनीति और दुनिया भर के घटनाक्रमों पर उनकी अच्छी पकड़ है। वे जटिल वैश्विक मुद्दों को भारतीय नजरिए से समझाते हैं।

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