राजस्थान के पाली में घर के बाहर दस्तक देने पहुंचा 8 फीट का विशालकाय मगरमच्छ, मचा हड़कंप, वन विभाग ने किया रेस्क्यू राजस्थान 5 घंटे पहले 3
पाली जिले के लालपुरा गांव में तड़के एक मकान के मुख्य द्वार पर 8 फीट लंबा और करीब 70 किलो का मगरमच्छ देखकर हड़कंप मच गया, जिसे वन विभाग की टीम ने कड़ी मशक्कत के बाद सुरक्षित रेस्क्यू किया।

राजस्थान के पाली जिले से एक बेहद हैरान और डरा देने वाला मामला सामने आया है। जिले के बाली उपखंड क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले लालपुरा गांव में उस समय अचानक दहशत फैल गई, जब तड़के एक आवासीय मकान के ठीक सामने करीब 8 फीट लंबा विशालकाय मगरमच्छ पहुंच गया। आबादी क्षेत्र में इतने बड़े मगरमच्छ को देखकर ग्रामीणों के रोंगटे खड़े हो गए। इस घटना की जानकारी तुरंत वन विभाग को दी गई, जिसके बाद रेस्क्यू दल ने मौके पर पहुंचकर कड़ी मशक्कत के बाद इस मगरमच्छ को काबू में किया। राहत की बात यह रही कि पूरी घटना में किसी को कोई नुकसान नहीं पहुंचा और मगरमच्छ को सुरक्षित रूप से उसके प्राकृतिक आवास में वापस भेज दिया गया।

रात के सन्नाटे में दरवाजे पर जोरदार दस्तक

यह पूरी घटना लालपुरा गांव के निवासी मगनाराम मीणा के घर की है। रोज की तरह मगनाराम अपने पूरे परिवार के साथ घर के भीतर गहरी नींद में सो रहे थे। रात का सन्नाटा पसरा हुआ था और समय करीब तड़के 3 बजे का था। अचानक उनके घर के मुख्य दरवाजे से किसी चीज के टकराने की तेज आवाजें आने लगीं। दरवाजे पर बार-बार हो रही इस खटखटाहट को सुनकर मगनाराम की नींद खुल गई। उन्हें लगा कि शायद कोई पड़ोसी या कोई राहगीर मदद के लिए दरवाजा खटखटा रहा है।

मगनाराम जैसे ही बाहर का नजारा देखने के लिए आगे बढ़े और उन्होंने घर का मुख्य द्वार खोला, तो सामने का दृश्य देखकर उनके पैरों तले से जमीन खिसक गई। दरवाजे के ठीक बाहर करीब 70 किलो वजनी और आठ फीट लंबा एक विशाल मगरमच्छ बैठा हुआ था। इतनी पास से साक्षात यमराज जैसी आकृति देखकर मगनाराम बुरी तरह घबरा गए, लेकिन उन्होंने तुरंत हिम्मत जुटाई और सूझबूझ का परिचय देते हुए दरवाजा वापस बंद कर लिया। इसके बाद उन्होंने तुरंत शोर मचाकर आसपास के ग्रामीणों को इस खतरे से आगाह किया।

वन विभाग और रेस्क्यू टीम ने चलाया एक घंटे का अभियान

घर के बाहर मगरमच्छ होने की खबर पूरे लालपुरा गांव में आग की तरह फैल गई। ग्रामीण लाठियां और टॉर्च लेकर सुरक्षा के लिए जमा होने लगे। मगनाराम ने बिना वक्त गंवाए वन विभाग को इसकी सूचना दी। वनपाल प्रकाश मीणा को जैसे ही इस बात की जानकारी मिली, उन्होंने तुरंत अपनी विशेष वाइल्ड एंड स्ट्रीट एनिमल रेस्क्यू टीम को सक्रिय किया और मौके पर रवाना होने के निर्देश दिए।

रेंजर महेंद्र पाल सिंह के कुशल मार्गदर्शन में रेस्क्यू टीम के जांबाज सदस्य कांतिलाल प्रजापत, गोविंद प्रजापत और दिलीप सेन तुरंत साजो-सामान के साथ लालपुरा गांव पहुंचे। टीम के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि अंधेरे का समय था और मगरमच्छ घबराकर ग्रामीणों पर हमला कर सकता था। सबसे पहले रेस्क्यू टीम ने ग्रामीणों को समझाकर एक सुरक्षित दूरी पर पीछे किया ताकि मगरमच्छ को उकसाया न जा सके।

इसके बाद टीम ने अत्यंत सावधानी के साथ अपना बचाव अभियान शुरू किया। करीब एक घंटे की भारी मशक्कत और बेहद सूझबूझ के साथ टीम के सदस्यों ने रस्सियों की मदद से मगरमच्छ के मुंह और पैरों को सुरक्षित रूप से बांध दिया। जब मगरमच्छ पूरी तरह से काबू में आ गया, तो उसे एक विशेष वाहन में लादकर जवाई बांध के सुरक्षित जलाशय क्षेत्र में ले जाया गया, जहां उसे पानी में छोड़ दिया गया। मगरमच्छ के सुरक्षित चले जाने के बाद ही ग्रामीणों ने राहत की सांस ली।

आबादी की ओर क्यों रुख कर रहे हैं जलीय जीव?

इस घटना ने जलीय जीवों के व्यवहार और उनके संरक्षण को लेकर कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। बाली उपखंड क्षेत्र के विभिन्न जलाशयों से निकलकर इंसानी बस्तियों में मगरमच्छों के घुसने के मामले लगातार बढ़ते जा रहे हैं। स्थानीय लोगों और वन्यजीव विशेषज्ञों ने इस पलायन के पीछे कई मुख्य कारणों की ओर इशारा किया है:

  • प्राकृतिक आवासों में घटता जल स्तर: स्थानीय जलाशयों और प्रसिद्ध जवाई बांध के आसपास के क्षेत्रों में पानी का स्तर लगातार घट रहा है। पानी कम होने से मगरमच्छों के रहने की जगह सीमित हो रही है, जिससे वे नए और अधिक नमी वाले ठिकानों की खोज में आबादी वाले क्षेत्रों की ओर आ रहे हैं।
  • भोजन की भारी किल्लत: जलाशयों में पानी घटने और पारिस्थितिकी तंत्र बिगड़ने के कारण मगरमच्छों को समय पर और पर्याप्त मात्रा में शिकार नहीं मिल पा रहा है। भोजन की इसी तलाश में वे भटकते हुए इंसानी बस्तियों और खेतों की तरफ रुख करने को मजबूर हैं।
  • असामान्य खान-पान की आदतें: भोजन की कमी का असर मगरमच्छों के स्वभाव पर भी पड़ रहा है। स्थानीय ग्रामीणों का दावा है कि उन्होंने कई बार इन मगरमच्छों को भूख मिटाने के लिए गांवों में गाय का गोबर खाते हुए भी देखा है। वन्यजीव विशेषज्ञों के अनुसार, यह बेहद असामान्य व्यवहार है जो केवल पेट भरने की अत्यंत लाचारी की स्थिति में ही देखा जा सकता है।

इस तरह की घटनाओं से पूरे इलाके के ग्रामीणों में गहरा डर बैठ गया है। लोगों का कहना है कि अगर समय रहते वन विभाग ने स्थानीय जलाशयों में पानी की पर्याप्त व्यवस्था और वन्यजीवों के लिए भोजन के उचित इंतजाम नहीं किए, तो आने वाले समय में मानव और वन्यजीवों के बीच संघर्ष की घटनाएं और भी भयावह रूप ले सकती हैं। ग्रामीणों ने प्रशासन से इन बेजुबान जीवों के संरक्षण के साथ-साथ मानव बस्तियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए कड़े कदम उठाने की मांग की है।

देवेंद्र पांडेय पाबना के राजनीतिक संवाददाता हैं और राष्ट्रीय राजनीति, सरकार तथा नीतियों पर रिपोर्टिंग करते हैं। चुनाव, संसद और बड़े सियासी घटनाक्रमों का वे गहराई से विश्लेषण करते हैं। उनकी रिपोर्टिंग निष्पक्ष और तथ्यों पर आधारित होती है।

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