राजस्थान
एक घंटा पहले
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विचारों
संघर्ष से उपजी सेवा की भावना
पाली के निवासी झालाराम देवासी जोयला ने साबित कर दिया है कि यदि हौसले बुलंद हों, तो शारीरिक कमियां भी बाधा नहीं बन सकतीं। झालाराम स्वयं दिव्यांग हैं और उन्होंने अपने जीवन में तमाम मुश्किलों और सामाजिक उपेक्षा का सामना किया है। इन्हीं अनुभवों ने उन्हें दूसरों के दर्द को गहराई से समझने की दृष्टि दी। अपनी लाचारी को कमजोरी बनाने के बजाय, उन्होंने इसे अपनी सबसे बड़ी ताकत में बदल दिया। आज वे जिस राह पर चल रहे हैं, वह न केवल प्रेरणादायक है, बल्कि सैकड़ों बेसहारा लोगों के लिए जीवन जीने का नया आधार बन गई है।
दिव्यांग सेवा संस्थान का सफर
झालाराम ने पाली के चिमनपुरा इलाके में दिव्यांग सेवा संस्थान की नींव रखी। इस संस्थान का मुख्य उद्देश्य उन लोगों को सहारा देना है, जो समाज में खुद को बोझ महसूस करते थे। संस्थान केवल एक आश्रय स्थल नहीं है, बल्कि यह एक ऐसा केंद्र है जहाँ दिव्यांगों के सर्वांगीण विकास पर काम किया जाता है। यहाँ रहने, खाने और चिकित्सीय उपचार की पूरी व्यवस्था नि:शुल्क की जाती है, ताकि किसी भी व्यक्ति को बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष न करना पड़े। झालाराम का मानना है कि सांत्वना देने से किसी का पेट नहीं भरता, इसलिए उन्होंने आर्थिक आत्मनिर्भरता को अपनी सेवा का मुख्य आधार बनाया है।
रोजगार की नई मिसाल: सक्षम केबिन और अन्य पहल
संस्थान द्वारा निशक्तजनों को आर्थिक रूप से स्वतंत्र बनाने के लिए कई अनूठी योजनाएं लागू की गई हैं। इनमें से प्रमुख पहल सक्षम केबिन है। इसके माध्यम से संस्थान दिव्यांगों को छोटे स्तर पर व्यापार शुरू करने के लिए आवश्यक संसाधन उपलब्ध कराता है। इसी प्रयास को आगे बढ़ाते हुए जय भवानी किराणा एंड सब्जी भंडार जैसे रोजगार मॉडल स्थापित किए गए हैं। इन केंद्रों का संचालन स्वयं दिव्यांगजन ही करते हैं। इन प्रयासों ने साबित किया है कि सही मार्गदर्शन और अवसर मिलने पर वे न केवल अपनी आजीविका चला सकते हैं, बल्कि अपने परिवार का गौरव भी बन सकते हैं।
आत्मनिर्भरता से लौटा खोया आत्मविश्वास
संस्थान से जुड़े कई दिव्यांगों के जीवन में आए सकारात्मक बदलाव स्पष्ट देखे जा सकते हैं। अपनी नई पहचान पा चुके एक लाभार्थी ने भावुक होकर बताया कि अब वे खुद को समाज का बोझ नहीं समझते। उन्होंने कहा, आज मुझे खुद पर गर्व है कि मैं अपने पैरों पर खड़ा हूं और किसी पर निर्भर नहीं हूं। उन्होंने झालाराम को एक मसीहा के रूप में बताते हुए कहा कि वे उन जैसे भटकते हुए लोगों को सही दिशा देने का काम कर रहे हैं। इस आत्मनिर्भरता ने उनमें इतना आत्मविश्वास भर दिया है कि वे अब भविष्य को नई उम्मीदों के साथ देख रहे हैं।
सरकार से सहयोग की दरकार
जैसे-जैसे दिव्यांग सेवा संस्थान का दायरा बढ़ रहा है, वैसे-वैसे उसकी जिम्मेदारियां और संसाधन जुटाने की चुनौतियां भी बढ़ती जा रही हैं। संस्थान की कार्यप्रणाली और समाज में इसके योगदान को देखते हुए पाली के नागरिकों और संस्था से जुड़े लोगों ने राज्य सरकार और स्थानीय प्रशासन से एक विशेष अपील की है। उन्होंने आग्रह किया है कि सरकार इस संस्थान को अपनी विभिन्न कल्याणकारी योजनाओं के साथ जोड़कर वित्तीय और ढांचागत मदद प्रदान करे। यदि सरकार का सहयोग मिलता है, तो झालाराम देवासी की यह मुहिम आने वाले समय में राज्य के हजारों अन्य दिव्यांगों के जीवन में नई रोशनी बिखेर सकती है।
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