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एक घंटा पहले
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पाकिस्तान की सियासत का नया मोड़
पाकिस्तान की राजनीति में इन दिनों एक बेहद दिलचस्प और चौंकाने वाला घटनाक्रम देखने को मिल रहा है। एक तरफ जहां जेल में बंद पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान की रिहाई को लेकर सरगर्मियां तेज हैं, वहीं दूसरी तरफ इस मांग के पीछे जो चेहरा सबसे आगे नजर आ रहा है, उसने हर किसी को हैरान कर दिया है। ये नेता और कोई नहीं, बल्कि जमीयत उलेमा-ए-इस्लाम के प्रमुख मौलाना फजलुर रहमान हैं। मौलाना फजलुर रहमान, जिन्हें पाकिस्तान में 'मौलाना डीजल' के उपनाम से जाना जाता है, अब इमरान खान के पक्ष में खुलकर आवाज उठा रहे हैं।
कट्टर दुश्मनी का इतिहास
मौलाना फजलुर रहमान और इमरान खान का रिश्ता पाकिस्तान की राजनीति के सबसे तीखे और कड़वे संबंधों में गिना जाता रहा है। एक समय था जब दोनों नेता एक-दूसरे पर हमला करने का कोई मौका नहीं छोड़ते थे। इमरान खान अपने सार्वजनिक भाषणों में मौलाना को 'मौलाना डीजल' कहकर संबोधित करते थे और उनका मजाक उड़ाते थे। वहीं, मौलाना फजलुर रहमान ने भी इमरान खान पर गंभीर आरोप लगाने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। उन्होंने सार्वजनिक मंचों से इमरान खान को इजरायल समर्थक एजेंट तक करार दिया था। इन दोनों नेताओं के बीच की यह राजनीतिक खटास इतनी अधिक थी कि किसी को भी उम्मीद नहीं थी कि कभी ये दोनों एक ही मंच पर या एक ही एजेंडे के साथ नजर आएंगे। लेकिन वक्त का पहिया कुछ ऐसा घूमा है कि आज वही मौलाना इमरान खान की रिहाई की पैरवी कर रहे हैं।
इमरान खान की राजनीति में एंट्री का वाकया
इस पूरे घटनाक्रम को समझने के लिए वरिष्ठ पत्रकार हामिद मीर द्वारा साझा की गई जानकारी अत्यंत महत्वपूर्ण है। हामिद मीर ने हाल ही में बांग्लादेश के एक अखबार 'प्रथम आलो' में लिखे लेख में उन दिनों की याद ताजा की है जब इमरान खान ने राजनीति में कदम रखा था। मीर बताते हैं कि वे इमरान खान और मौलाना फजलुर रहमान दोनों को वर्ष 1988 से जानते हैं। उस समय पाकिस्तान में जनरल जिया-उल-हक का सैन्य शासन अपने चरम पर था।
हामिद मीर के अनुसार, उस वक्त जनरल जिया ने भ्रष्टाचार के कथित आरोपों के बीच प्रधानमंत्री मुहम्मद खान जुनेजो को उनके पद से हटा दिया था। उल्लेखनीय है कि जुनेजो को 1985 के गैर-दलीय चुनावों के बाद खुद जिया-उल-हक ने ही प्रधानमंत्री के पद पर नियुक्त किया था। जुनेजो के हटने के बाद की स्थिति का वर्णन करते हुए हामिद मीर कहते हैं कि उस समय पंजाब के मुख्यमंत्री नवाज शरीफ ने जुनेजो का समर्थन करने के बजाय जनरल जिया-उल-हक के साथ खड़े होने का फैसला किया था।
क्रिकेट से सियासत तक का सफर
हामिद मीर के लेख के मुताबिक, जनरल जिया-उल-हक इमरान खान की छवि और लोकप्रियता का फायदा उठाना चाहते थे। जिया की योजना इमरान को अपनी नई सरकार में शामिल करने की थी। उस समय इमरान खान ने 1987 में टेस्ट क्रिकेट से संन्यास की घोषणा कर दी थी, लेकिन जनरल जिया के व्यक्तिगत आग्रह और कहने पर उन्होंने अपना फैसला वापस लिया और क्रिकेट के मैदान पर दोबारा वापसी की। जिया को यह उम्मीद थी कि इमरान खान की लोकप्रियता का इस्तेमाल करके वे अपनी लड़खड़ाती सरकार और गिरती हुई छवि को सहारा दे सकेंगे।
बदलते समीकरण और मध्यस्थता की कोशिश
आज स्थिति यह है कि मौलाना फजलुर रहमान इमरान खान की पार्टी पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ और सरकार के बीच एक सेतु का काम करने की कोशिश कर रहे हैं। मौलाना ने खुले तौर पर पाकिस्तान सरकार के सामने यह प्रस्ताव रखा है कि वे दोनों पक्षों के बीच चल रहे भारी गतिरोध को सुलझाने के लिए मध्यस्थता की भूमिका निभा सकते हैं।
सरकारी गलियारों से आ रही खबरों के अनुसार, मौलाना फजलुर रहमान ने प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ को यह सलाह दी है कि वे खैबर पख्तूनख्वा जैसे संवेदनशील इलाकों में बल प्रयोग करने के बजाय बातचीत और सुलह का रास्ता अपनाएं। यह कदम यह दर्शाता है कि पाकिस्तान की विपक्षी पार्टियां अब एक साझा रणनीति की ओर बढ़ रही हैं। हालांकि, क्या मौलाना की ये कोशिशें वाकई इमरान खान को जेल से बाहर निकाल पाएंगी, यह आने वाले समय का बड़ा सवाल है।
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