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43 मिनट पहले
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PoK का नया 'लूजर पीएम' और लोकतंत्र का मजाक
पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर यानी PoK में एक बार फिर लोकतंत्र के नाम पर एक ऐसा सियासी खेल खेला गया है जिसने दुनिया भर में इस्लामाबाद की किरकिरी करा दी है। भारी विरोध प्रदर्शनों और हिंसा के माहौल के बीच, शुक्रवार को बैरिस्टर इफ्तिखार अली गिलानी को PoK का नया प्रधानमंत्री चुन लिया गया है। यह पूरा घटनाक्रम किसी मजाक से कम नहीं है क्योंकि इफ्तिखार गिलानी को उन चुनावों में जनता ने सीधे तौर पर नकार दिया था। अपनी सीट हारने के बावजूद, इस्लामाबाद और नवाज शरीफ के इशारे पर उन्हें पिछले दरवाजे से विधानसभा में लाकर सत्ता की चाबी सौंप दी गई। इस घटना के बाद PoK की सड़कों पर गुस्सा भड़क उठा है और हिंसा का नया दौर शुरू होने की आशंका जताई जा रही है।
जनता ने नकारा, फिर भी कुर्सी पर बैठाया
पाकिस्तान मुस्लिम लीग-नवाज (PML-N) के नेता इफ्तिखार अली गिलानी ने मुजफ्फराबाद स्थित तथाकथित विधानसभा में अपनी जगह बना तो ली, लेकिन इस पूरी प्रक्रिया में सबसे बड़ा सवाल यह है कि वे खुद अपनी चुनावी सीट हार चुके थे। जिस नेता को आम जनता ने अपना प्रतिनिधि चुनने से मना कर दिया, उसे नवाज शरीफ के दबाव में टेक्नोक्रेट रिजर्व सीट के जरिए राजनीति के गलियारे में प्रवेश कराया गया। इसे PoK की आम जनता अपने अपमान के रूप में देख रही है। इस राजनीतिक तिकड़म के बाद से पूरे क्षेत्र में आक्रोश का माहौल है और लोग इसे इस्लामाबाद का सीधा हस्तक्षेप मान रहे हैं।
क्यों कहा जा रहा है 'लूजर पीएम'?
राजनीतिक जानकारों और वहां के स्थानीय लोगों के बीच इफ्तिखार अली गिलानी को एक 'कठपुतली' और 'लूजर पीएम' के रूप में देखा जा रहा है। इसके पीछे ठोस कारण हैं जो उनकी वैधता पर सवाल खड़े करते हैं:
- जनादेश का अपमान: 27 जुलाई, 2 अगस्त और 3 अगस्त को हुए तीन चरणों के चुनावों में जनता ने गिलानी को करारी शिकस्त दी थी। जब एक नेता को उसका अपना क्षेत्र खारिज कर देता है, तो उसे पूरे प्रदेश की बागडोर सौंपना लोकतांत्रिक मूल्यों के विरुद्ध है।
- चोर दरवाजे से एंट्री: चुनाव में मिली शर्मनाक हार के बाद गिलानी ने शार्टकट अपनाते हुए टेक्नोक्रेट्स के लिए आरक्षित सीटों का सहारा लिया। यह जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधि के बजाय एक नामित मोहरे की तरह सदन में प्रवेश था।
- बिना जनादेश का नेतृत्व: PoK की 53 सीटों वाली विधानसभा में 45 सीटें जनता सीधे चुनती है। गिलानी एक भी सीट जीतने में नाकाम रहे थे, जो साबित करता है कि उनका अपना कोई वोट बैंक नहीं है।
- पार्टी के भीतर असंतोष: उनकी अपनी ही पार्टी के क्षेत्रीय अध्यक्ष शाह गुलाम कादिर ने इस फैसले का खुलकर विरोध किया और वोटिंग से पूरी तरह किनारा कर लिया।
वोटिंग का गणित और सियासी बिसात
मुजफ्फराबाद में बुलाई गई विधानसभा बैठक में कुल 44 सदस्यों ने ही मतदान में भाग लिया। इफ्तिखार गिलानी को 30 वोट मिले, जबकि उनके प्रतिद्वंद्वी पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के मुख्तार अहमद को केवल 14 वोटों से संतोष करना पड़ा। फिलहाल इस विधानसभा में 53 में से केवल 46 सदस्य ही मौजूद हैं, क्योंकि पुंछ और सुधनोती जिलों की 7 सीटों पर हिंसा के कारण चुनाव टाल दिए गए थे। यह दिखाता है कि वहां की स्थिति कितनी अस्थिर है।
पाकिस्तान का दोहरा चरित्र
इस पूरे प्रकरण ने पाकिस्तान के दोहरे रवैये को उजागर कर दिया है। एक तरफ नवाज शरीफ ने लाहौर से गिलानी के नाम पर अंतिम मुहर लगाई, वहीं दूसरी तरफ पार्टी के क्षेत्रीय अध्यक्ष शाह गुलाम कादिर ने इस पूरे नाटक का बहिष्कार कर दिया। 53 सीटों वाले इस ढांचे में, जहां 45 सीटों पर जनता वोट करती है, वहां भी धांधली के गंभीर आरोप लगे हैं। 38 डायरेक्ट सीटों की गिनती में PML-N को 25 और PPP को 12 सीटें मिलीं, लेकिन जो आरक्षित 8 सीटें थीं, उनमें से 6 को फर्जी तरीके से PML-N को दे दिया गया।
जून से सुलग रहा है PoK
PoK में हालात पहले से ही काफी खराब हैं। जून के महीने से 'जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी' के बैनर तले हजारों लोग सड़कों पर हैं। उनकी मुख्य मांगें बढ़ती महंगाई, बिजली के अत्यधिक बिल और पाकिस्तानी सेना की दखलंदाजी के खिलाफ हैं। इस आंदोलन को कुचलने के लिए सुरक्षा बलों ने गोलियां चलाईं, जिसमें कई लोगों की जान गई है। अब एक ऐसे व्यक्ति को प्रधानमंत्री बना देना जिसे जनता ने ठुकराया है, आग में घी डालने जैसा है। लोग अब इस कठपुतली सरकार के खिलाफ और अधिक आक्रामक हो रहे हैं। यह स्थिति इस्लामाबाद के लिए आने वाले समय में एक बड़ी चुनौती बनकर उभर सकती है, क्योंकि वहां की जनता अब इस फर्जी लोकतंत्र को और अधिक बर्दाश्त करने के मूड में नहीं है।
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