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एक घंटा पहले
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पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों जैसे हिंदुओं और ईसाइयों पर होने वाले अत्याचारों की खबरें तो आम हैं, लेकिन अब वहां अहमदी समुदाय के मुसलमानों के खिलाफ भी नफरत और उत्पीड़न बेहद खतरनाक स्तर पर पहुंच चुका है। जीते-जी अपने अधिकारों से वंचित इस समुदाय के लोगों को अब मृत्यु के बाद अपने प्रियजनों को दो गज जमीन में दफनाने की इजाजत भी नहीं दी जा रही है। हाल ही में पाकिस्तान के पंजाब प्रांत स्थित पचनंद इलाके से एक दुखद मामला सामने आया है, जहां एक अहमदी महिला के निधन के बाद कट्टरपंथियों और मौलवियों ने उनके शव को दफनाने और अंतिम प्रार्थना आयोजित करने से रोक दिया।
पचनंद में अंतिम संस्कार और प्रार्थना पर कट्टरपंथियों की रोक
पचनंद में सामने आई इस ताजा घटना में स्थानीय लोगों और मुस्लिम मौलवियों के कड़े विरोध के चलते पीड़ित परिवार अपनी धार्मिक परंपराओं के अनुसार अपने प्रियजन को अंतिम विदाई भी नहीं दे सका। रिपोर्ट्स के अनुसार, जब अहमदी समुदाय के लोग शव को सुपुर्द-ए-खाक करने पहुंचे, तो मौलवियों ने न केवल उन्हें रोक दिया, बल्कि उनके धार्मिक रीति-रिवाज अपनाने पर भी सख्त ऐतराज जताया। इतना ही नहीं, जब अहमदी समुदाय के लोगों को उस जगह से खदेड़ दिया गया, तो कुछ मौलवियों ने इस पर जश्न तक मनाया। इस घटना ने एक बार फिर पड़ोसी मुल्क के भेदभावपूर्ण और क्रूर चेहरे को दुनिया के सामने लाकर खड़ा कर दिया है। यह मामला दर्शाता है कि पाकिस्तान में धार्मिक उत्पीड़न केवल आम दिनों की पूजा-पाठ तक सीमित नहीं है, बल्कि मृत्यु और शोक जैसे संवेदनशील और निजी लम्हों में भी अमानवीय रूप ले चुका है।
सियालकोट और बादीन में भी दोहराई जा चुकी हैं ऐसी घटनाएं
पाकिस्तान में अहमदी समुदाय के साथ अंतिम संस्कार में रुकावट डालने और कब्रिस्तान में जगह न देने का यह कोई पहला मामला नहीं है। इससे पहले भी ऐसे कई मामले सामने आ चुके हैं:
- सितंबर 2025 की सियालकोट घटना: पंजाब के सियालकोट जिले के पीरो चक गांव में 55 वर्षीय कुदसिया तबस्सुम का निधन हो गया था। उनके अंतिम संस्कार के दौरान तेहरीक-ए-लबबैक पाकिस्तान (TLP) के समर्थकों और अन्य कट्टरपंथी तत्वों ने भारी विरोध प्रदर्शन किया था। इस विरोध के कारण शोकाकुल परिवार को स्थानीय कब्रिस्तान में शव दफनाने के लिए जगह नहीं दी गई। आखिरकार पुलिस के दखल के बाद शव को किसी अन्य अहमदी कब्रिस्तान में ले जाकर दफनाया गया।
- जून 2026 की बादीन घटना: सिंध प्रांत के बादीन जिले में भी ठीक ऐसी ही घटना घटी थी। वहां स्थानीय मौलवियों की आपत्ति के बाद पुलिस ने समुदाय के सदस्यों को उनकी अंतिम प्रार्थना पढ़ने से रोकने का प्रयास किया था।
संवैधानिक संशोधन और कानूनी पाबंदियों का इतिहास
पाकिस्तान में अहमदी समुदाय के खिलाफ बढ़ता यह भेदभाव रातों-रात पैदा नहीं हुआ है, बल्कि इसकी जड़ें देश के संविधान और कानूनों में बहुत गहरी हैं:
- वर्ष 1974 का दूसरा संवैधानिक संशोधन: पाकिस्तान की संसद ने 1974 में दूसरे संवैधानिक संशोधन के जरिए अहमदियों को आधिकारिक तौर पर गैर-मुस्लिम घोषित कर दिया था।
- वर्ष 1984 का अध्यादेश XX: इसके दस साल बाद, 1984 में तत्कालीन जनरल जिया-उल-हक ने अध्यादेश XX लागू किया। इस अध्यादेश ने अहमदियों की धार्मिक अभिव्यक्ति पर और कड़े प्रतिबंध लगा दिए। इसके तहत खुद को मुस्लिम बताना, इस्लामी शब्दों का इस्तेमाल करना या मुस्लिम रीति-रिवाजों का पालन करना अपराध बना दिया गया।
संयुक्त राष्ट्र की चिंता और वैश्विक मांग
अहमदी समुदाय पर हो रहे इस अत्याचार पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी बार-बार आवाज उठाई गई है। 7 सितंबर 2026 को संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार विशेषज्ञों ने अहमदियों के खिलाफ जारी भेदभाव, हिंसा और कानूनी प्रतिबंधों पर गहरी चिंता प्रकट की थी। संयुक्त राष्ट्र ने पाकिस्तान सरकार से अपील की थी कि वह अहमदी समुदाय की धार्मिक स्वतंत्रता की रक्षा करे और कानून के तहत सभी के साथ समान व्यवहार सुनिश्चित करे।
मानवाधिकारों का लगातार हनन
पचनंद की यह नई घटना पूजा-पाठ पर पाबंदी, धार्मिक स्थलों पर हमलों, कब्रों की बेअदबी और अंतिम संस्कार में रुकावट डालने जैसे मामलों की एक लंबी सूची का हिस्सा है। अपनी धार्मिक पहचान और अकीदे के कारण अहमदी समुदाय लगातार नफरत का सामना कर रहा है, और पाकिस्तान में उनके मौलिक अधिकारों की स्थिति दिन-ब-दिन बदतर होती जा रही है।
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