PoK का काल बन गई चीन की 42 हजार करोड़ की मदद, क्या है नीलम-झेलम का श्राप? विश्व 2 घंटे पहले 3
पाकिस्तान के अवैध कब्जे वाले कश्मीर में चीन की मदद से बनी नीलम-झेलम जलविद्युत परियोजना अब स्थानीय लोगों के लिए मुसीबत का सबब बन चुकी है, जिसके चलते वहां व्यापक विरोध-प्रदर्शन हो रहे हैं।

पाकिस्तान के अवैध कब्जे वाले कश्मीर में हाहाकार

पाकिस्तान के अवैध कब्जे वाले कश्मीर यानी PoK की स्थिति इस समय बेहद नाजुक बनी हुई है। एक समय जिसे जन्नत कहा जाता था, वह अब स्थानीय लोगों के लिए जहन्नुम में तब्दील हो चुका है। इस पूरे संकट के पीछे चीन की ओर से दी गई 42 हजार करोड़ रुपए की भारी-भरकम वित्तीय मदद और उससे तैयार हुआ नीलम-झेलम जलविद्युत प्रोजेक्ट है। शहबाज शरीफ और आसिम मुनीर की जोड़ी पर आरोप है कि उन्होंने चीन के साथ मिलकर स्थानीय जनता के संसाधनों को लूटने का रास्ता साफ किया है। आज मुजफ्फराबाद की सड़कों पर आम नागरिक अपने अधिकारों के लिए बगावत पर उतारू हैं और सरकारी तंत्र के खिलाफ खुलकर आवाज उठा रहे हैं।

विकास के दावों का खोखलापन

नीलम-झेलम जलविद्युत परियोजना को शुरुआत में एक बड़े विकास मॉडल के रूप में पेश किया गया था। तब दावे किए गए थे कि नदियों के प्रवाह का उपयोग करके करीब 969 मेगावाट बिजली का उत्पादन किया जाएगा, जिससे न केवल इलाके की तस्वीर बदलेगी बल्कि पाकिस्तान का नेशनल ग्रिड भी समृद्ध होगा। हालांकि, आज वास्तविकता इन दावों से बिल्कुल उलट है। यह परियोजना अब एक ऐसे खंडहर में बदल चुकी है जो केवल सरकारी भ्रष्टाचार और झूठे वादों की दास्तान बयां करता है। स्थानीय लोगों के लिए यह परियोजना किसी श्राप से कम नहीं है क्योंकि इसके साए में रहने वाली जनता बिजली के घोर संकट से जूझ रही है।

नदियों का दोहन और अंधेरे का दंश

इस इलाके की सबसे बड़ी संपत्ति यहां की नदियां हैं। विडंबना यह है कि जिन नदियों के पानी से बांध बनाकर बिजली तैयार की जाती है, उन इलाकों के घरों में ही रोशनी नहीं पहुंचती। बिजली को सीधे बड़े शहरों की ओर स्थानांतरित कर दिया जाता है, जबकि स्थानीय आबादी घंटों की लोड-शेडिंग और बिजली कटौती का सामना करने को मजबूर है। यदि कभी बिजली मिलती भी है, तो उसके लिए लोगों से अत्यधिक उच्च दरें वसूल की जाती हैं। यह कोई तकनीकी चूक नहीं बल्कि एक नियोजित शोषणकारी मॉडल है, जिसका उपयोग पाकिस्तान सरकार केवल अपने वित्तीय लाभ के लिए कर रही है।

ढाई साल से जारी है जन-आंदोलन

स्थिति इतनी भयावह हो चुकी है कि यूनाइटेड कश्मीर पीपुल्स नेशनल पार्टी ने खुले तौर पर इस कुप्रबंधन की आलोचना की है। पूरे क्षेत्र में वोल्टेज की इतनी कमी रहती है कि घरेलू उपकरण काम करना बंद कर देते हैं। इंटरनेट और मोबाइल जैसी बुनियादी सेवाएं भी अक्सर ठप रहती हैं। इसी दमनकारी नीति के विरोध में 'जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी' के नेतृत्व में आम नागरिक पिछले ढाई साल से भी अधिक समय से सड़कों पर उतरकर विरोध जता रहे हैं। जब जनता अपनी ही धरती से पैदा होने वाली बिजली के लिए वर्षों तक संघर्ष करे, तो उसे विकास कहना सरासर गलत है, यह स्पष्ट रूप से संसाधनों का शोषण है।

चीन की खैरात और तकनीकी विफलता

इस पूरे प्रोजेक्ट के पीछे चीन की भूमिका बेहद संदिग्ध रही है। चूँकि यह इलाका अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विवादित है, इसलिए विश्व बैंक जैसे बड़े वित्तीय संस्थानों ने यहां निवेश करने से मना कर दिया था। उस वक्त चीन ने पाकिस्तान को मदद का लालच दिया और 448 मिलियन डॉलर, जो कि भारतीय मुद्रा में लगभग 42 हजार करोड़ रुपए के बराबर है, इस परियोजना में झोंक दिए। यह सौदा पाकिस्तान के लिए एक अस्थायी राहत की तरह था, जिसके जरिए वह नीलम नदी पर अपने जल अधिकारों को मजबूत करना चाहता था। वाबडा ने 67 किलोमीटर लंबी सुरंगों का निर्माण, ट्रांसफार्मर हॉल और अंडरग्राउंड पावरहाउस तैयार करने में एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया। वादे किए गए थे कि प्रति वर्ष 5.15 अरब यूनिट बिजली उत्पादन से 45 अरब रुपये का लाभ होगा, लेकिन यह सब केवल कागजों तक ही सीमित रह गया।

शहबाज और मुनीर की गले की हड्डी

आज स्थिति यह है कि यह फ्लैगशिप प्रोजेक्ट तकनीकी खामियों के कारण पूरी तरह ठप पड़ा है। जैसे ही इसे शुरू करने का प्रयास किया गया, बड़ी तकनीकी गड़बड़ियां सामने आईं, जिसके बाद इसे बंद करने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा। मुजफ्फराबाद के व्यापारी और आम जनता अब इस परियोजना में हुए भ्रष्टाचार की निष्पक्ष जांच की मांग कर रही है। लोगों का कहना है कि उनके प्राकृतिक संसाधनों को लूटा गया है और बदले में उन्हें केवल अंधेरा और बदहाली मिली है। यह परियोजना अब पाकिस्तान की गलत नीतियों और जनता के प्रति उसकी उपेक्षा का सबसे बड़ा उदाहरण बनकर रह गई है। जनता का आक्रोश सरकार के लिए किसी बड़े खतरे से कम नहीं है, क्योंकि वे अब और अधिक समय तक शोषण सहने को तैयार नहीं हैं।

साहिल चौहान पाबना के वर्ल्ड अफेयर्स रिपोर्टर हैं, जो अंतरराष्ट्रीय खबरें और वैश्विक मामले कवर करते हैं। विदेश नीति, कूटनीति और दुनिया भर के घटनाक्रमों पर उनकी अच्छी पकड़ है। वे जटिल वैश्विक मुद्दों को भारतीय नजरिए से समझाते हैं।

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