विश्व
एक दिन पहले
5
विचारों
पाकिस्तान के नियंत्रण को बलूचों का कड़ा जवाब
बलूचिस्तान में हालात तेजी से बदल रहे हैं। वहां के आम नागरिक लंबे समय से पाकिस्तानी सेना के सैन्य नियंत्रण और प्रांत में चल रही विभिन्न आर्थिक परियोजनाओं के खिलाफ खुलकर अपनी नाराजगी जाहिर कर रहे हैं। स्थानीय निवासियों की मांग स्पष्ट है कि पाकिस्तानी सेना और उसकी विभिन्न संस्थाएं बिना किसी देरी के बलूचिस्तान की धरती छोड़कर बाहर निकल जाएं। बलूच जनता अब किसी भी प्रकार का बाहरी नियंत्रण या अपने प्राकृतिक संसाधनों के अंधाधुंध दोहन को और अधिक बर्दाश्त करने के लिए तैयार नहीं है। बलूच सभ्यता का इतिहास और उनकी परंपराएं करीब 9000 साल पुरानी हैं, जो उन्हें अपनी जड़ों से मजबूती से जोड़ती हैं।
पाकिस्तान पर लगा भाड़े की सेना का आरोप
इस समय बलूचिस्तान में पाकिस्तान के विरुद्ध विरोध प्रदर्शनों का सिलसिला लगातार गहराता जा रहा है। वहां के कई सक्रिय बलूच समूह और प्रमुख कार्यकर्ता पाकिस्तान की सेना, खुफिया एजेंसियों और उन तमाम सरकारी संस्थानों के खिलाफ सड़कों पर उतर आए हैं जो बलूचिस्तान के अधिकारों का हनन कर रहे हैं। बलोचों ने एक स्वर में पाकिस्तानी सेना को चेतावनी दी है कि वे बलूचिस्तान से बाहर चले जाएं, क्योंकि अब वे अपने संसाधनों और भविष्य को खुद संभालने में सक्षम हैं।
पाकिस्तान प्रोजेक्ट के अंत की ओर संकेत
मीर यार बलोच ने सोशल मीडिया पर अपनी बात रखते हुए लिखा कि बलूचिस्तान की विरासत 9000 साल पुरानी है, जबकि इसके उलट पाकिस्तान मात्र 78 साल पुराना एक कृत्रिम बफर जोन है। उन्होंने दावा किया कि इस देश का निर्माण अंग्रेजों द्वारा किया गया था और इसे पूरी तरह से भाड़े की मिलिट्री स्ट्रक्चर के दम पर टिकाए रखा गया है। उन्होंने तर्क दिया कि हर राजनीतिक प्रोजेक्ट की एक निश्चित उम्र होती है और अंततः वह अपने तार्किक अंजाम तक पहुँचता है। इस दृष्टिकोण से देखें तो, पाकिस्तान नामक यह प्रोजेक्ट अब अपनी उम्र के अंतिम पड़ाव पर खड़ा है। उनके अनुसार, बलूचिस्तान के रिपब्लिक में आम जनता पाकिस्तानी सेना के बाहरी हस्तक्षेप के खिलाफ शांतिपूर्ण तरीके से अपना विरोध दर्ज करा रही है।
शोषण से तंग आ चुकी है बलूच जनता
मीर यार बलोच ने जोर देकर कहा कि बलूचिस्तान के लोग अब कब्जे और आर्थिक शोषण के बोझ से पूरी तरह थक चुके हैं। बलूच समाज ने अपने भविष्य का फैसला खुद करने का मन बना लिया है। वे अपनी विकास नीतियां खुद तैयार करना चाहते हैं और अपने संसाधनों का प्रबंधन भी स्वयं करना चाहते हैं। उनका कहना है कि वे अपनी नियति का निर्माण करने में पूरी तरह से समर्थ हैं। बलोच ने यह भी साफ किया कि पाकिस्तानी सेना को बलूचिस्तान के हर कोने में जनता के भारी विरोध का सामना करना पड़ रहा है। इतिहास गवाह है कि जब किसी विदेशी सेना को स्थानीय निवासियों के लगातार कड़े विरोध का सामना करना पड़ता है, तो समझदार राष्ट्र कब्जे को बनाए रखने के बजाय पीछे हटना ही उचित समझते हैं।
तोपों और बंदूकों से नहीं जीती जा सकती जंग
वर्तमान में इस्लामाबाद की सेना अमेरिका, चीन और इंटरनेशनल मॉनेटरी फंड से प्राप्त वित्तीय मदद के बल पर बलूच जनता पर लगातार बमबारी कर रही है। हालांकि, उन्हें यह बात समझ लेनी चाहिए कि जीत कभी भी तोपों, राइफलों या फाइटर जेट्स से सुनिश्चित नहीं होती। सच्ची और स्थायी विजय उन्हीं की होती है जिनकी जड़ें अपनी मिट्टी में गहराई से जमी होती हैं और जिन्हें अपने लोगों का अटूट समर्थन हासिल होता है। बलूचिस्तान की जड़ें वहां की मिट्टी में जमी हुई हैं। इसके विपरीत, पाकिस्तानी सेना के जवान केवल कुछ हजार रुपये की मासिक सैलरी के लिए बलूचिस्तान में तैनात हैं, जहाँ वे स्थानीय लोगों के नरसंहार जैसे गंभीर कृत्यों में शामिल होकर इतिहास में अपनी भूमिका निभा रहे हैं।
Comments
0 comment