धान की फसल में यूरिया डालने का सही समय और तरीका: जानें विशेषज्ञों की राय बिहार 2 घंटे पहले 3
धान की बेहतर पैदावार के लिए यूरिया का सही समय पर इस्तेमाल बेहद जरूरी है। विशेषज्ञ रोपाई के 21 दिन बाद यूरिया देने और इसके साथ सल्फर के उपयोग की सलाह देते हैं।

धान की खेती में खाद का सही प्रबंधन

धान की बंपर पैदावार पाने के लिए केवल फसल लगाना ही काफी नहीं है, बल्कि समय पर उर्वरकों का सही इस्तेमाल करना भी अनिवार्य है। कई किसान खाद के चयन और इसके छिड़काव के सही समय को लेकर उलझन में रहते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यूरिया का प्रयोग सही मात्रा और सही समय पर किया जाए, तो फसल न केवल तेजी से बढ़ती है बल्कि उत्पादन में भी भारी वृद्धि होती है। इस मौसम में जहानाबाद जैसे क्षेत्रों में, जहां बारिश की कमी एक बड़ी चुनौती बनी हुई है, किसानों को अतिरिक्त सावधानी बरतने की आवश्यकता है।

रोपाई के बाद यूरिया कब डालें

जहानाबाद कृषि विज्ञान केंद्र के फसल विशेषज्ञ डॉ मनोज कुमार के अनुसार, यूरिया में 46 प्रतिशत नाइट्रोजन होता है, जो धान की वानस्पतिक वृद्धि के लिए अत्यंत आवश्यक है। धान की रोपाई के 21 दिन बाद यूरिया की पहली खुराक देना सबसे उपयुक्त समय माना जाता है। इस दौरान खेत में खरपतवार नाशी दवाइयों का उपयोग करना भी फायदेमंद रहता है, ताकि फसल को अन्य अवांछित पौधों से बचाया जा सके।

प्रति एकड़ खाद की सही मात्रा

उर्वरक के संतुलित प्रयोग के लिए मृदा परीक्षण अनिवार्य है, लेकिन यदि परीक्षण नहीं हो पाया है, तो सामान्य तौर पर प्रति एकड़ 45 किलोग्राम यूरिया का प्रयोग करना चाहिए। यूरिया के साथ 8 से 10 किलोग्राम सल्फर मिलाना भी फसल की सेहत के लिए काफी गुणकारी साबित होता है। उर्वरक डालने से पहले यह सुनिश्चित कर लें कि खेत में पर्याप्त नमी या पानी उपलब्ध हो। यदि खेत सूखा है, तो खाद डालने के तुरंत बाद सिंचाई करना बेहद जरूरी है ताकि उर्वरक पौधों तक आसानी से पहुंच सके।

उर्वरकों का सही संतुलन

अक्सर किसान खाद की दुकानों पर केवल नाइट्रोजन, फॉस्फोरस और पोटास पर ही केंद्रित रहते हैं, लेकिन विशेषज्ञों का सुझाव है कि संतुलित खेती के लिए जिंक और सल्फर का भी विशेष ध्यान रखना चाहिए। एक आदर्श उर्वरक योजना के तहत फॉस्फोरस, पोटास, जिंक और सल्फर की पूरी मात्रा और नाइट्रोजन की एक तिहाई मात्रा खेत की तैयारी यानी कदवा के समय ही दे देनी चाहिए। इससे फसल की जड़ें मजबूत होती हैं और अंत में उत्पादन के परिणाम बेहतर मिलते हैं।

जहानाबाद में खेती की चुनौतियां

इस वर्ष जहानाबाद में बारिश सामान्य से काफी कम हुई है, जिससे जल स्तर नीचे चला गया है और खेती पर असर पड़ा है। इसके बावजूद किसानों ने हार नहीं मानी है और बोरिंग पंप सेट के जरिए लगभग 70 प्रतिशत धान की रोपाई पूरी कर ली है। हालांकि, कम पानी होने की वजह से खरपतवार की समस्या बढ़ रही है और खाद की दुकानों पर किसानों की लंबी कतारें देखी जा रही हैं।

ऊंची जमीन पर खेती से परहेज

विशेषज्ञों ने उन किसानों को विशेष चेतावनी दी है जिनकी जमीनें ऊंचाई पर स्थित हैं। चूंकि धान की फसल को लगातार जलभराव की आवश्यकता होती है, इसलिए ऊंची जमीन पर पानी का ठहराव नहीं हो पाता। यदि किसान वहां धान लगाते हैं, तो उन्हें बार-बार सिंचाई करनी पड़ेगी, जिससे खेती का खर्च कई गुना बढ़ जाएगा। अतः बेहतर यही है कि ऐसी जमीनों पर धान की खेती से बचा जाए ताकि नुकसान की संभावना कम रहे।

अंजलि सिंह पाबना की राज्य संवाददाता हैं, जो विभिन्न राज्यों की क्षेत्रीय खबरें और खानपान कवर करती हैं। स्थानीय घटनाओं, संस्कृति और जायके की कहानियों को वे करीब से रिपोर्ट करती हैं। अलग-अलग राज्यों की विविधता उनकी रिपोर्टिंग में नजर आती है।

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