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एक घंटा पहले
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10 मिनट में रची गई जीवन रक्षा की कहानी
नेपाल में आई प्राकृतिक आपदा के बीच त्रिभुवन त्रिशुली सीनियर सेकेंडरी स्कूल के प्रिंसिपल राजेंद्र दुबान ने साहस और सूझबूझ की एक अद्भुत कहानी लिखी है। स्कूल में कुल 1643 विद्यार्थी पंजीकृत हैं, जिनमें से घटना वाले दिन 26 तारीख को करीब 900 बच्चे स्कूल परिसर में मौजूद थे। उसी दौरान पानी का तेज बहाव और मलबा स्कूल की ओर बढ़ने लगा। प्रिंसिपल राजेंद्र दुबान ने बताया कि जैसे ही उन्हें मित्रों के माध्यम से खतरे की जानकारी मिली, उन्होंने बिना समय गंवाए स्कूल को खाली करने का निर्णय लिया। महज 10 मिनट के भीतर उन्होंने सभी 900 छात्रों को स्कूल बसों में सुरक्षित बैठाकर ऊंचाई वाले इलाकों में भेज दिया। छात्रों के सुरक्षित निकलने के बाद ही शिक्षक और अन्य स्टाफ वहां से निकल पाए। यह उनकी तत्परता ही थी कि महज 30 सेकंड के भीतर मौत को मात देकर सभी बच्चों की जान बचा ली गई।
बाढ़ ने मिटा दी स्कूल और बाजार की पहचान
बाढ़ के पानी का प्रलय इतना भीषण था कि स्कूल परिसर पूरी तरह से नष्ट हो गया। पानी अपने रास्ते में आने वाली हर चीज को बहा ले गया। स्कूल के आसपास की इमारतें ढह गईं और यदि समय रहते स्कूल खाली न किया जाता, तो बड़ी जनहानि से बचना असंभव था। त्रिशुली बाजार अब केवल एक मलबे का ढेर बनकर रह गया है। यहाँ मौजूद पुल गिर चुके हैं और पूरा इलाका तबाही के निशान छोड़ रहा है। स्थिति इतनी गंभीर है कि मूलभूत सुविधाओं को फिर से बहाल करने में लंबा समय लगेगा और क्षेत्र का पहले जैसा होना बेहद कठिन है।
व्यापारी अशोक चौरसिया का उजड़ा संसार
इस त्रासदी ने स्थानीय गारमेंट व्यापारी अशोक चौरसिया जैसे कई लोगों का सब कुछ छीन लिया है। अशोक चौरसिया ने बताया कि उनका पूरा व्यापार और घर मलबे में दफन हो गया है। हालात इतने बदतर हैं कि उनके पास पहनने को कपड़े तक नहीं बचे हैं और वे दूसरों से सहायता मांगने को मजबूर हैं। इस आपदा में उन्होंने अपने परिवार के दो सदस्यों को भी खो दिया है। त्रिशुली बाजार में भारतीय परिवारों की भी अच्छी खासी तादाद थी, जहां करीब 60 से अधिक भारतीय परिवार बसे हुए थे, लेकिन अब वहां केवल क्षतिग्रस्त मकान और खंडहर हो चुकी दुकानें ही दिखाई देती हैं।
45 करोड़ का नुकसान और संघर्ष की कहानी
उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के रसड़ा गांव के मूल निवासी अशोक कुमार चौरसिया ने अपना दर्द साझा करते हुए कहा कि उनका परिवार लगभग 44 साल पहले काठमांडू आया था। करीब 20 साल से वे त्रिशुली में अपना व्यापार चला रहे थे। आपदा के दिन पानी का बहाव इतना तेज था कि उसने महज 20 मिनट के भीतर 100 किलोमीटर तक का सफर तय कर लिया। उन्हें संभलने का मौका तक नहीं मिला और वे अपनी दुकान का सामान भी नहीं बचा पाए। पुलिस द्वारा अलर्ट मिलते ही उन्होंने अपनी बाइक निकाली और पत्नी व बच्चों के साथ सुरक्षित स्थान की ओर भागकर जान बचाई। अशोक ने बताया कि उनकी चार दुकानों और चार गोदामों के साथ कई वाहन मलबे में बह गए, जिससे उन्हें 45 करोड़ से ज्यादा का नुकसान हुआ है। वर्तमान में वे आर्थिक तंगी और अपनों को खोने के गम से जूझ रहे हैं, जबकि परिवार के दो सदस्यों को उन्होंने वापस भारत भेज दिया है।
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