महाराष्ट्र में सूखे की सूची पर घमासान: मंत्रियों के प्रभाव वाले क्षेत्रों को राहत, 93 तालुके बाहर होने से मचा बवाल महाराष्ट्र एक घंटा पहले 3
महाराष्ट्र सरकार द्वारा 265 तालुकों को सूखाग्रस्त घोषित करने के बाद राज्य की राजनीति गरमा गई है। विपक्ष ने सरकार पर भेदभाव का आरोप लगाया है, जबकि सत्ताधारी गठबंधन के भीतर ही सूची को लेकर भारी असंतोष देखने को मिल रहा है।

महाराष्ट्र में सूखे की मार और राजनीतिक कलह

महाराष्ट्र में महायुति सरकार द्वारा 265 तालुकों को सूखाग्रस्त घोषित किए जाने के फैसले ने राज्य की राजनीति में भूचाल ला दिया है। यह सरकारी अधिसूचना राज्य में कर्जमाफी की घोषणा के महज 4 महीने बाद आई है, जिसके चलते न केवल विपक्षी दलों ने सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है, बल्कि सत्तापक्ष के भीतर भी बगावत के सुर उठने लगे हैं। विपक्ष का आरोप है कि इस सूची को तैयार करने में पूरी तरह से राजनीतिक पक्षपात किया गया है, जिससे प्रभावित किसानों में भारी आक्रोश है।

सूची में पारदर्शिता और मापदंडों पर सवाल

राज्य के 36 जिलों में कुल 358 तालुके हैं, जिनमें से सरकार ने केवल 265 को ही सूखे की जद में माना है। इस चयन प्रक्रिया की पारदर्शिता पर अब गंभीर सवाल उठ रहे हैं। चौंकाने वाली बात यह है कि सूची में महाबलेश्वर, राधानगरी और श्रीवर्धन जैसे उन इलाकों को भी शामिल किया गया है जहाँ सामान्य से अधिक वर्षा होती है। दूसरी ओर, कई ऐसे क्षेत्र जहाँ सूखे का असर स्पष्ट है, उन्हें बाहर रखा गया है। इससे यह स्पष्ट होता है कि सूची का आधार पूरी तरह से वस्तुनिष्ठ नहीं है, बल्कि इसमें राजनीतिक लाभ-हानि का ध्यान रखा गया है।

मंत्रियों के गढ़ में विशेष मेहरबानी

डेटा का विश्लेषण करने पर पता चलता है कि सूखाग्रस्त सूची में उन 28 मंत्रियों के निर्वाचन क्षेत्र शामिल हैं जो महायुति सरकार का हिस्सा हैं। इसमें उप मुख्यमंत्री सुनेत्रा पवार (बारामती), राजस्व मंत्री चन्द्रशेखर बावनकुले (कामठी), छगन भुजबल (येओला), गिरीश महाजन (जामनेर), गुलाबराव पाटिल (जलगांव ग्रामीण), दादाजी भुसे (मालेगांव आउटर), संजय राठौड़ (दिग्रस), उदय सामंत (रत्नागिरी), पंकजा मुंडे (परली), दत्तात्रय भरणे (इंदापुर), अदिति तटकरे (श्रीवर्धन), मकरंद जाधव-पाटिल (वाई-महाबलेश्वर) और प्रकाश अबितकर (राधानगरी) जैसे बड़े नाम शामिल हैं। इसके अलावा मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस का अपना निर्वाचन क्षेत्र नागपुर दक्षिण-पश्चिम, छत्रपति संभाजीनगर से संजय शिरसात, कंकावली से नितेश राणे और खामगांव से आकाश फंडकर जैसे कई अन्य प्रभावशाली क्षेत्रों को भी राहत दी गई है।

सत्ताधारी दल के भीतर असंतोष

इस फैसले के बाद सत्तारूढ़ गठबंधन को अपने ही कार्यकर्ताओं और नेताओं के दबाव का सामना करना पड़ रहा है। कई मंत्रियों के इलाकों को बाहर रखे जाने के बाद उन पर सवाल खड़े हो गए हैं। जिन क्षेत्रों को इस सूची में जगह नहीं मिली है, उनमें शंभूराज देसाई का पाटन, हसन मुश्रीफ का कगल, राधाकृष्ण विखे-पाटिल का शिरडी, नरहरि जीरवाल का दिंडोरी, योगेश कदम का दापोली और भरत गोगावाले का महाड शामिल हैं। स्थिति का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि भारतीय जनता पार्टी के सांसद अशोक चव्हाण की एक ऑडियो क्लिप सोशल मीडिया पर वायरल हो गई है, जिसमें वह पार्टी कार्यकर्ताओं को धैर्य रखने और सार्वजनिक आलोचना से बचने की सलाह दे रहे हैं क्योंकि उनका अपना तालुका सूची से बाहर है। भाजपा विधायक सुमित वानखेड़े ने तो सीधे मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर अपने अरवी निर्वाचन क्षेत्र को शामिल करने की मांग रखी, जिसे मुख्यमंत्री ने तुरंत स्वीकार कर लिया, जिसके बाद उन्होंने सोशल मीडिया से अपनी पोस्ट हटा दी।

विपक्ष का तीखा प्रहार

महा विकास अघाड़ी (एमवीए) ने इस अधिसूचना को शर्मनाक बताते हुए सरकार पर तीखा हमला बोला है। वरिष्ठ कांग्रेस नेता विजय वडेट्टीवार ने प्रशासन की कड़ी आलोचना करते हुए कहा कि सरकार को सूखे जैसे गंभीर मुद्दे पर राजनीति करना शोभा नहीं देता। उन्होंने आरोप लगाया कि ब्रह्मपुरी जैसे विपक्षी दल के प्रभाव वाले क्षेत्रों को जानबूझकर नजरअंदाज किया गया है। वडेट्टीवार ने सवाल किया कि क्या विपक्षी निर्वाचन क्षेत्र महाराष्ट्र का हिस्सा नहीं हैं, और क्यों कोई मंत्री इन क्षेत्रों का दौरा करने की जहमत नहीं उठा रहा है। उधर, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरदचंद्र पवार) के वरिष्ठ नेता शरद पवार ने फडणवीस को पत्र लिखकर मांग की है कि किसानों को प्रति हेक्टेयर 1 लाख रुपए की वित्तीय सहायता प्रदान की जाए। वहीं, शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) के विधायक आदित्य ठाकरे ने पेयजल संकट और किसानों की आत्महत्याओं के बढ़ते मामलों पर सरकार की निष्क्रियता पर सवाल उठाए हैं।

आर्थिक संकट की आशंका

सूखे के कारण महाराष्ट्र की पूरी अर्थव्यवस्था पर गहरा असर पड़ने का अंदेशा है। राहत एवं पुनर्वास विभाग के अधिकारियों ने चेतावनी दी है कि 2026 की खरीफ फसल में होने वाले भारी नुकसान से ग्रामीण अर्थव्यवस्था पूरी तरह चरमरा सकती है। किसानों के सामने आजीविका का संकट खड़ा हो गया है और सरकारी स्तर पर की जा रही राजनीति ने इस दर्द को और बढ़ा दिया है। यदि समय रहते प्रभावित तालुकों की सही पहचान करके उन्हें उचित राहत नहीं दी गई, तो आगामी समय में राज्य को गंभीर आर्थिक और सामाजिक चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है।

देवेंद्र पांडेय पाबना के राजनीतिक संवाददाता हैं और राष्ट्रीय राजनीति, सरकार तथा नीतियों पर रिपोर्टिंग करते हैं। चुनाव, संसद और बड़े सियासी घटनाक्रमों का वे गहराई से विश्लेषण करते हैं। उनकी रिपोर्टिंग निष्पक्ष और तथ्यों पर आधारित होती है।

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