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एक घंटा पहले
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झारखंड को प्राकृतिक संपदा से समृद्ध राज्य माना जाता है। घने जंगल, ऊंचे पहाड़, बहती नदियां और चारों ओर फैली हरियाली इस राज्य की पहचान हैं। यही वजह है कि यहां की संस्कृति और परंपराएं भी प्रकृति से गहराई से जुड़ी हुई हैं। राज्य के अनेक ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में आज भी प्रकृति की शक्तियों की आराधना की जाती है। इन्हीं परंपराओं में से एक आस्था से जुड़ा महत्वपूर्ण पर्व है मां पहाड़ी पूजा, जिसे लोग पूरी श्रद्धा, विश्वास और उत्साह के साथ मनाते हैं।
मां पहाड़ी को गांव, समाज और प्रकृति की रक्षक देवी के रूप में पूजा जाता है। श्रद्धालुओं का विश्वास है कि मां अपने भक्तों की हर छोटी-बड़ी कठिनाई का समाधान करती हैं और उन्हें सुख, शांति तथा समृद्धि का आशीर्वाद देती हैं। इस पूजा के जरिए लोग प्रकृति के प्रति अपनी आस्था भी व्यक्त करते हैं और आने वाली पीढ़ियों को अपनी सांस्कृतिक विरासत से जोड़ते हैं।
पूरे विधि-विधान से होती है पूजा
पूजा के कर्ता दुर्गा राव बताते हैं कि यह आयोजन हर वर्ष पूरे विधि-विधान और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ किया जाता है। पूजा लगभग पांच दिनों तक चलती है। इस अवधि में मां पहाड़ी की प्रतिमा अथवा प्रतीक स्वरूप पत्थर को विशेष सम्मान के साथ लाया जाता है। इसके बाद हल्दी मिले जल और नीम के पत्तों से मां का स्नान कराया जाता है, उनके चरण धोए जाते हैं और विशेष पूजा-अर्चना की जाती है।
स्थानीय लोगों की मान्यता है कि मां पहाड़ी की आराधना से गांव और मोहल्ले में सुख-शांति बनी रहती है। साथ ही चिकन पॉक्स जैसी बीमारियों से भी लोगों की रक्षा होती है। बुजुर्गों का कहना है कि माता की कृपा से अनेक प्रकार की बीमारियां और संकट दूर हो जाते हैं। यही कारण है कि लोग मां पहाड़ी को अत्यंत शक्तिशाली और चमत्कारी देवी मानकर उनकी पूजा करते हैं।
लगातार 5 दिनों तक चलते हैं भंडारे
पूजा के दौरान पूरे गांव और बस्ती का माहौल किसी बड़े उत्सव से कम नहीं होता। पांच दिनों तक लगातार भंडारे और सामूहिक भोजन का आयोजन किया जाता है, जिसमें सभी लोग एक साथ बैठकर प्रसाद ग्रहण करते हैं। दिन-रात गीत-संगीत, पारंपरिक वाद्य यंत्रों की धुन और सांस्कृतिक नृत्यों की प्रस्तुतियां होती रहती हैं। इससे पूरे क्षेत्र में उत्सव जैसा वातावरण बन जाता है और लोगों के बीच आपसी भाईचारा तथा सामाजिक एकता और मजबूत होती है।
आस्था और लोक संस्कृति का प्रतीक
पूजा के अंतिम दिन श्रद्धालु पूरे सम्मान और भावुक मन से मां पहाड़ी की विदाई करते हैं। इस दौरान लोग अगले वर्ष पुनः माता के आगमन की कामना करते हैं। दरअसल, मां पहाड़ी पूजा केवल एक धार्मिक अनुष्ठान भर नहीं है, बल्कि झारखंड की समृद्ध लोक संस्कृति, प्रकृति प्रेम और सामुदायिक एकता का जीवंत प्रतीक भी है।
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