भारत
एक महीने पहले
67
विचारों
कोर्टरूम के भीतर अनियंत्रित हुआ याचिकाकर्ता
देश की सर्वोच्च अदालत यानी सुप्रीम कोर्ट में उस समय अफरातफरी का माहौल बन गया, जब एक याचिकाकर्ता ने सुनवाई के दौरान मर्यादा की सारी सीमाएं लांघ दीं। खुद याचिकाकर्ता के तौर पर अदालत में मौजूद इस व्यक्ति ने सीजेआई सूर्यकांत के विरुद्ध आपत्तिजनक शब्दों का प्रयोग किया और कोर्टरूम के भीतर कागज़ के टुकड़े हवा में उछाल दिए। मामले की गंभीरता को देखते हुए सुरक्षाकर्मियों ने तुरंत मोर्चा संभाला और उसे हिरासत में ले लिया। फिलहाल, दिल्ली पुलिस इस व्यक्ति से कड़ी पूछताछ कर रही है।
शुक्रवार की सुबह हुई अप्रत्याशित घटना
यह पूरी घटना शुक्रवार की सुबह करीब 11 बजे घटित हुई। जब जस्टिस के.वी. विश्वनाथन और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ एक मामले की सुनवाई कर रही थी, तब प्रबल प्रताप नामक याचिकाकर्ता ने वहां पहुंचकर अजीबोगरीब व्यवहार करना शुरू कर दिया। उसने खुद को 'सॉवरेन' यानी संप्रभु घोषित किया और पीठ में बैठे जजों को 'न्यायिक सेवक' कहकर संबोधित किया। याचिकाकर्ता ने अहंकारपूर्ण लहजे में जजों को निर्देश देते हुए कहा, 'मिस्टर न्यायिक सेवक, मैं आपको आदेश देता हूं कि आप लखनऊ के एएसपी के खिलाफ साइबर क्राइम सिंडिकेट चलाने के आरोप में एफआईआर दर्ज करने का आदेश जारी करें।'
न्यायाधीशों की प्रतिक्रिया और सुरक्षा व्यवस्था
याचिकाकर्ता की इस असंवैधानिक भाषा और व्यवहार को देखकर जस्टिस के.वी. विश्वनाथन स्तब्ध रह गए। उन्होंने अविश्वास के साथ सवाल किया कि क्या वह सच में अदालत को आदेश दे रहा है। इसके तुरंत बाद, याचिकाकर्ता ने अपना आपा खो दिया और भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत के खिलाफ अभद्र भाषा का इस्तेमाल करते हुए कोर्ट के फर्श पर कागज़ फेंके। सुरक्षाकर्मियों ने फौरन उसे काबू में किया और कोर्टरूम से बाहर निकाल दिया। उसे शुरुआती तौर पर कोर्ट परिसर में ही डीएसपी के कार्यालय में हिरासत में रखा गया था।
सुप्रीम कोर्ट ने दिखाई उदारता
इतने गंभीर हंगामे और न्यायालय की अवमानना के बावजूद, पीठ ने याचिकाकर्ता के प्रति नरम रुख अपनाया। जस्टिस विश्वनाथन ने स्पष्ट किया कि वे इस व्यक्ति के विरुद्ध कोई भी अवमानना की कार्रवाई नहीं करना चाहते हैं। उन्होंने कहा कि याचिकाकर्ता काफी परेशान नजर आ रहा है और यह सब हताशा के कारण हो रहा है, जिसके लिए उन्हें सहानुभूति है। पीठ ने रिकॉर्ड देखने के बाद स्पष्ट किया कि विवादित आदेश में हस्तक्षेप करने का कोई ठोस आधार नहीं है और इसी के साथ उसकी स्पेशल लीव पिटिशन को खारिज कर दिया गया।
आखिर क्या था पूरा मामला
यह विवाद इलाहाबाद हाई कोर्ट के एक निर्णय को चुनौती देने से जुड़ा था। याचिकाकर्ता ने लखनऊ के स्पेशल चीफ ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट (कस्टम्स) के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें एफआईआर दर्ज करने के बजाय याचिका को एक निजी शिकायत के रूप में मानने का निर्देश दिया गया था। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने इस मामले में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया था क्योंकि याचिकाकर्ता के पास अन्य वैकल्पिक उपाय उपलब्ध थे। सुप्रीम कोर्ट ने भी इसी कानूनी तर्क को सही मानते हुए निचली अदालत के निर्णय पर मोहर लगाई और मामले का पटाक्षेप कर दिया।
Comments
0 comment