करौली में नए सत्र की शुरुआत लेकिन जर्जर स्कूलों में जान जोखिम में, 737 स्कूलों की मरम्मत अब भी अधूरी
राजस्थान
एक महीने पहले
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स्कूली बच्चों की सुरक्षा पर बड़ा खतरा
राजस्थान के करौली जिले में भीषण गर्मी की छुट्टियों के बाद सोमवार से सरकारी और निजी स्कूलों के दरवाजे फिर से खुल गए हैं। नए शैक्षणिक सत्र की शुरुआत के साथ ही स्कूलों में रौनक तो लौट आई है, लेकिन कई सरकारी विद्यालयों के जर्जर भवन विद्यार्थियों और शिक्षकों के लिए बड़ा खतरा बने हुए हैं। सत्र के पहले ही दिन से स्कूलों में बच्चों की उपस्थिति कम देखी गई, लेकिन बदतर बुनियादी ढांचे ने शिक्षा व्यवस्था की पोल खोल दी है।
मरम्मत के लिए स्वीकृत बजट और जमीनी हकीकत
बीते साल मानसून के दौरान जिले के कई विद्यालय भवनों को भारी नुकसान पहुंचा था। इस क्षति को देखते हुए आपदा प्रबंधन मद से कुल 737 विद्यालयों के लिए दो-दो लाख रुपये की राशि मरम्मत कार्य हेतु स्वीकृत की गई थी। इस कार्य को दो भागों में बांटा गया था, जिसमें शिक्षा विभाग को 281 विद्यालयों और पंचायती राज विभाग को 456 विद्यालयों में मरम्मत का जिम्मा सौंपा गया था। हालांकि, प्रशासन के तमाम दावों के एक साल बाद भी बड़ी संख्या में विद्यालयों में मरम्मत कार्य अधर में लटका हुआ है। काम पूरा न होने के कारण अब छात्र-छात्राएं टूटी-फूटी छतों और जोखिम भरे वातावरण में पढ़ाई करने के लिए मजबूर हैं।
बालिका विद्यालय की चिंताजनक स्थिति
जिले के वजीरपुर दरवाजा क्षेत्र में स्थित राजकीय बालिका उच्च माध्यमिक विद्यालय की स्थिति सबसे अधिक दयनीय और चिंताजनक है। इस स्कूल की इमारत काफी पुरानी है और करीब दो वर्ष पहले हुई तेज बारिश के कारण भवन का एक बड़ा हिस्सा ढह गया था, जिसकी मरम्मत अब तक नहीं हो पाई है। विद्यालय की प्रधानाचार्या मिथिलेश शर्मा के अनुसार, विभाग को कई बार लिखित प्रस्ताव भेजे गए हैं, लेकिन अब तक कोई समाधान नहीं निकल सका है। छात्राओं की सुरक्षा को देखते हुए, क्षतिग्रस्त कमरों के ऊपर भामाशाहों की मदद से अस्थायी रूप से टीनशेड लगाए गए हैं ताकि शिक्षण कार्य जारी रखा जा सके। बरसात के मौसम में खतरे को देखते हुए भवन के प्रभावित हिस्से को पूरी तरह बंद करना पड़ता है, जिससे कमरों की भारी कमी हो गई है।
पढ़ाई की व्यवस्था पर पड़ा बुरा असर
विद्यालय में पहली से बारहवीं कक्षा तक 300 से ज्यादा छात्राएं पढ़ रही हैं, और नए सत्र में 62 से अधिक नए प्रवेश भी दर्ज किए जा चुके हैं। कमरों के अभाव में शिक्षकों को एक ही कमरे में तीन-तीन कक्षाओं की छात्राओं को बिठाकर पढ़ाना पड़ रहा है। अध्यापिका अर्चना शर्मा ने अपनी पीड़ा साझा करते हुए बताया कि सीमित संसाधनों और एक ही कमरे में कई कक्षाओं के संचालन से पढ़ाई की गुणवत्ता पर गहरा असर पड़ रहा है। छात्राओं के भविष्य को संवारने की कोशिशों के बीच यह जर्जर भवन सबसे बड़ी बाधा बने हुए हैं।
प्रशासन का क्या कहना है
इस पूरे मामले पर जिला शिक्षा अधिकारी इंद्रेश तिवारी ने सफाई देते हुए कहा कि क्षतिग्रस्त भवनों की स्थिति को लेकर पहले ही आवश्यक दिशा-निर्देश दिए जा चुके हैं। उन्होंने माना कि कई विद्यालयों में निर्माण कार्य अभी भी अधूरा है, जिसे जल्द से जल्द पूर्ण करने के लिए निर्देश जारी कर दिए गए हैं। उन्होंने आम जनता, अभिभावकों और शिक्षकों से आग्रह किया है कि यदि कोई ऐसा जर्जर भवन सर्वे में शामिल होने से छूट गया है, तो विभाग को तुरंत इसकी सूचना दी जाए। शिक्षा विभाग का कहना है कि वे स्थिति की गंभीरता को समझ रहे हैं और बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए हर संभव प्रयास किए जा रहे हैं।
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