मोती डूंगरी गणेश मंदिर का इतिहास: मेवाड़ से जयपुर कैसे आई भगवान गणेश की यह प्राचीन प्रतिमा? धर्म एक घंटा पहले 3
जयपुर के प्रसिद्ध मोती डूंगरी गणेश मंदिर की स्थापना वर्ष 1761 में हुई थी। यह मंदिर मेवाड़ से जुड़ी एक रोचक ऐतिहासिक गाथा के लिए जाना जाता है, जिसके तहत सवाई माधोसिंह भगवान गणेश की प्रतिमा जयपुर लाए थे।

जयपुर की आस्था का केंद्र मोती डूंगरी गणेश

गुलाबी नगरी जयपुर में स्थित मोती डूंगरी गणेश मंदिर को यहां का प्रथम आराध्य माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं और परंपराओं के अनुसार, हर शुभ काम की शुरुआत से पहले लोग बप्पा का आशीर्वाद लेने यहां जरूर आते हैं। चाहे कोई नया वाहन खरीदना हो या किसी नए व्यवसाय की नींव रखनी हो, भक्त अपनी मनोकामना पूरी करने के लिए मंदिर में धागा बांधने की विशेष परंपरा का पालन भी करते हैं।

वर्ष 1761 की ऐतिहासिक दास्तान

इस मंदिर के इतिहास के तार वर्ष 1761 से जुड़े हुए हैं। स्थानीय किंवदंतियों के अनुसार, उस समय के जयपुर नरेश सवाई माधोसिंह के प्रयासों से ही यह प्रतिमा जयपुर पहुंची थी। कहा जाता है कि राजा भगवान गणेश की इस दिव्य प्रतिमा को मेवाड़ के मावली क्षेत्र से लेकर आए थे। इस प्रकार मावली से जयपुर तक का सफर तय करने वाली यह मूर्ति आज शहर की पहचान बन गई है।

श्रद्धालुओं की विशेष आस्था

मोती डूंगरी गणेश मंदिर में हर बुधवार को भक्तों का तांता लगा रहता है। वहीं, गणेश चतुर्थी के पावन अवसर पर यहां का दृश्य देखते ही बनता है, जब देश-विदेश से श्रद्धालु बप्पा के दर्शन करने के लिए भारी संख्या में उमड़ते हैं। मंदिर की वास्तुकला और शांति भक्तों को अपनी ओर आकर्षित करती है, जिससे यह स्थान जयपुर के प्रमुख पर्यटन और धार्मिक स्थलों में शुमार हो गया है।

अंजलि सिंह पाबना की राज्य संवाददाता हैं, जो विभिन्न राज्यों की क्षेत्रीय खबरें और खानपान कवर करती हैं। स्थानीय घटनाओं, संस्कृति और जायके की कहानियों को वे करीब से रिपोर्ट करती हैं। अलग-अलग राज्यों की विविधता उनकी रिपोर्टिंग में नजर आती है।

आपकी प्रतिक्रिया?

Comments

https://pabna.in/assets/images/user-avatar-s.jpg

0 comment

Write the first comment for this!

फेसबुक वार्तालाप