बरगी बांध के घटते जलस्तर ने खोला इतिहास का पन्ना, 40 साल बाद पानी से बाहर आया कलचुरी कालीन 'जलमग्न कुंड' मध्य प्रदेश एक महीने पहले 49
मध्य प्रदेश के जबलपुर में स्थित बरगी बांध का जलस्तर अत्यधिक गिरने के कारण लगभग चार दशक पुराना रहस्य सामने आया है। पानी सूखने से सदियों पुराना कलचुरी कालीन ऐतिहासिक कुंड पहली बार सतह पर दिखाई दिया है, जिसे देखने के लिए लोगों की भीड़ उमड़ रही है।

मध्य प्रदेश की जीवनदायिनी कहे जाने वाले जबलपुर के प्रसिद्ध बरगी बांध से इन दिनों एक हैरान कर देने वाली और ऐतिहासिक तस्वीर सामने आ रही है। मानसून की बेरुखी और भीषण गर्मी के चलते बांध का जलस्तर अपने न्यूनतम स्तर पर पहुंच गया है। इस घटते जलस्तर ने एक ऐसी प्राचीन धरोहर को उजागर कर दिया है, जो पिछले चार दशकों से पानी की अगाध गहराइयों में दफन थी। बांध के डूब क्षेत्र से बाहर आई यह संरचना कोई साधारण निर्माण नहीं है, बल्कि यह सदियों पुराना कलचुरी कालीन 'जलमग्न कुंड' है। बांध बनने के बाद यह पहली बार है जब यह ऐतिहासिक कुंड पूरी तरह से सतह पर दिखाई दे रहा है।

बरगी बांध का घटता जलस्तर और सूखा किनारा

जबलपुर का बरगी बांध अपनी अथाह जलराशि और विशालता के लिए पूरे प्रदेश में प्रसिद्ध है। सामान्य दिनों में यहां पर्यटकों का तांता लगा रहता है, जहां लोग बोटिंग का आनंद लेते हैं और बांध के गेट खुलने के विहंगम दृश्य को देखने आते हैं। लेकिन इस साल मानसून की देरी और कम बारिश के कारण परिस्थितियां पूरी तरह बदल चुकी हैं। जहां कभी लबालब पानी हिलोरे लेता था, वहां आज दूर-दूर तक सूखी और दरारें पड़ी जमीन दिखाई दे रही है। बांध का यह वीरान इलाका इस समय पूरी तरह शांत है और स्थानीय लोग भी इस बदलाव को देखकर आश्चर्यचकित हैं। उन्होंने पिछले 40 साल में बांध की ऐसी स्थिति कभी नहीं देखी थी। इसी सूखी जमीन के बीच से उभरा यह प्राचीन कुंड मानो इतिहास के किसी अनकहे अध्याय को दोबारा जीवित कर रहा है।

कलचुरी कालीन इतिहास और नंदकेश्वर महादेव मंदिर का संबंध

इस ऐतिहासिक कुंड का संबंध कलचुरी काल से बताया जा रहा है, जो सैकड़ों वर्ष पुराना है। इतिहासकार आनंद राणा के अनुसार, यह कुंड केवल पत्थरों का एक ढांचा मात्र नहीं है, बल्कि यह अपने आप में एक संपूर्ण युग का जीवंत प्रतीक है। इतिहासकार बताते हैं कि वर्षों पहले, जहां आज यह कुंड दिखाई दे रहा है, उसके बिल्कुल समीप ही एक अत्यंत प्राचीन और प्रसिद्ध मंदिर हुआ करता था, जिसे लोग 'नंदकेश्वर महादेव' मंदिर के नाम से जानते थे। यह मंदिर और उसके पास स्थित यह कुंड आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों के लोगों की अगाध आस्था का मुख्य केंद्र थे। इसके साथ ही, यह ग्रामीणों के दैनिक जीवन के लिए पानी का सबसे बड़ा और विश्वसनीय स्रोत भी हुआ करता था। लेकिन जब बरगी बांध का निर्माण कार्य शुरू हुआ, तो यह पूरा समृद्ध क्षेत्र बांध के डूब क्षेत्र में समा गया, जिसके कारण यह प्राचीन मंदिर और ऐतिहासिक कुंड हमेशा के लिए पानी के नीचे विलीन हो गए थे।

विस्थापित बुजुर्गों के लिए भावुक पल और यादों का सैलाब

लगभग चार दशकों के लंबे इंतजार के बाद जब यह कुंड पानी से बाहर निकलकर आया है, तो यह उन लोगों के लिए बेहद भावुक क्षण बन गया है जो कभी इस क्षेत्र की बस्तियों में रहा करते थे। बांध निर्माण के समय विस्थापन का दर्द झेलने वाले बुजुर्ग जब आज इस स्थान पर पहुंचकर कुंड को देखते हैं, तो उनकी पुरानी यादें ताजा हो जाती हैं और उनकी आंखें नम हो उठती हैं। स्थानीय बुजुर्गों के लिए यह कुंड केवल एक प्राचीन वास्तुकला या पत्थर की संरचना नहीं है, बल्कि यह उनके जीवन के उन अनमोल क्षणों का हिस्सा है जिन्हें वे दशकों पहले अपनी मातृभूमि छोड़ते समय पीछे भूल आए थे। कलचुरी कालीन इस कुंड का उपयोग विस्थापित ग्रामीण अपने दैनिक कार्यों के लिए करते थे। इसके अतिरिक्त, परंपरा के अनुसार, जब भी कोई श्रद्धालु नंदकेश्वर महादेव मंदिर में दर्शन करने जाता था, तो वह सबसे पहले इसी पवित्र कुंड में स्नान करता था और उसके बाद ही भगवान शिव के दर्शन के लिए मंदिर परिसर में प्रवेश करता था।

रहस्यमयी गहराई और सदाबहार पानी का स्रोत

इस कुंड के बारे में कई ऐसी बातें हैं जो आज भी रहस्य बनी हुई हैं। स्थानीय लोगों के अनुसार, इस ऐतिहासिक कुंड की वास्तविक गहराई क्या है, इसे आज तक वैज्ञानिक तौर पर नापा नहीं जा सका है। यह कुंड प्राचीन काल से ही सदाबहार रहा है, जिसका पानी कभी नहीं सूखता था। दिलचस्प बात यह है कि जब बरगी बांध का निर्माण कार्य चल रहा था, तब इस बड़ी परियोजना में काम करने वाले सैकड़ों मजदूर भी अपनी प्यास बुझाने और अन्य आवश्यकताओं के लिए इसी कुंड के पानी का इस्तेमाल किया करते थे। विषम परिस्थितियों में भी इस कुंड का पानी हमेशा स्वच्छ और प्रचुर मात्रा में उपलब्ध रहता था, जिसने बांध निर्माण के समय मजदूरों की बड़ी सहायता की थी।

पर्यटकों के लिए कौतूहल का केंद्र बनी ऐतिहासिक धरोहर

जैसे-जैसे बांध के पानी के सूखने की खबर फैल रही है, वैसे-जैसे लोगों में इस ऐतिहासिक धरोहर को देखने का कौतूहल बढ़ता जा रहा है। दूर-दराज के इलाकों से बड़ी संख्या में लोग और इतिहास प्रेमी इस स्थान पर पहुंच रहे हैं। 40 साल बाद बांध की कोख से बाहर आए इस अद्भुत नजारे को लोग अपने मोबाइल फोन और कैमरों में कैद करने के लिए उत्सुक दिखाई दे रहे हैं। फिलहाल, मानसून का इंतजार लंबा होता जा रहा है और जैसे-जैसे गर्मी और शुष्कता के कारण बांध का जलस्तर और नीचे जा रहा है, यह प्राचीन कुंड और भी अधिक स्पष्ट और सुंदर रूप में सामने आ रहा है। प्रकृति का यह बदलता रूप जहां एक तरफ चिंता का विषय है, वहीं दूसरी ओर इसने हमें यह भी सिखाया है कि समय चाहे कितना भी बीत जाए और परिस्थितियां चाहे कितनी भी बदल जाएं, इतिहास के पन्नों को कभी पूरी तरह मिटाया नहीं जा सकता और वह एक न एक दिन वापस सामने आ ही जाता है।

अंजलि सिंह पाबना की राज्य संवाददाता हैं, जो विभिन्न राज्यों की क्षेत्रीय खबरें और खानपान कवर करती हैं। स्थानीय घटनाओं, संस्कृति और जायके की कहानियों को वे करीब से रिपोर्ट करती हैं। अलग-अलग राज्यों की विविधता उनकी रिपोर्टिंग में नजर आती है।

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