डोनाल्ड ट्रंप पर ईरान का जानलेवा हमला? इज़राइल की खुफिया चेतावनी से मची खलबली विश्व एक घंटा पहले 4
इज़राइल ने अमेरिकी अधिकारियों को आगाह किया था कि ईरान डोनाल्ड ट्रंप की हत्या के लिए स्नाइपर, चाकू और मिसाइलों का इस्तेमाल कर सकता है।

इज़राइल की खुफिया चेतावनी ने बढ़ाई चिंता

इज़राइल ने संयुक्त राज्य अमेरिका को डोनाल्ड ट्रंप की सुरक्षा को लेकर गंभीर चेतावनियां दी थीं। इन चेतावनियों के अनुसार, ईरान द्वारा डोनाल्ड ट्रंप की हत्या के लिए कई साजिशें रची जा रही थीं। इन संभावित हमलों के लिए स्नाइपर, चाकू और कंधे से दागी जाने वाली मिसाइलों जैसे घातक हथियारों का उपयोग करने की योजना थी। ये खुफिया जानकारियां सीधे अमेरिकी इंटेलिजेंस एजेंसियों और व्हाइट हाउस के वरिष्ठ अधिकारियों तक पहुंचाई गई थीं। सबसे विस्तृत चेतावनी उस वक्त सामने आई थी जब ट्रंप नाटो शिखर सम्मेलन में हिस्सा लेने के लिए तुर्की की यात्रा करने वाले थे। हालांकि इन खतरों की पुष्टि पूरी तरह नहीं हो सकी, लेकिन व्हाइट हाउस और सीक्रेट सर्विस ने इन सूचनाओं को गंभीरता से लेते हुए ट्रंप की सुरक्षा व्यवस्था में कड़े बदलाव किए थे। सुरक्षा के मद्देनजर उन्हें एयर फ़ोर्स वन से हटाकर किसी दूसरे विमान में शिफ्ट किया गया था।

जुलाई में आया था अलर्ट

सूत्रों से प्राप्त जानकारी के मुताबिक, ये चेतावनी जुलाई के महीने में अंकारा में आयोजित नाटो शिखर सम्मेलन के दौरान मिली थी। अमेरिकी अधिकारियों के सामने यह बात रखी गई थी कि ईरान एयर फ़ोर्स वन में सफर के दौरान डोनाल्ड ट्रंप को निशाना बना सकता है। ईरान ने संभवतः कंधे से दागी जाने वाली मिसाइल का उपयोग करने की रणनीति बनाई थी। इस अलर्ट ने सीक्रेट सर्विस के होश उड़ा दिए थे, जिसके कारण सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए गए और किसी भी अनहोनी को रोकने के लिए अतिरिक्त सावधानी बरती गई।

ऑपरेशन और धोखे की रणनीति

डोनाल्ड ट्रंप की तुर्की यात्रा के दौरान एक विशेष सुरक्षा अभियान चलाया गया था। सीक्रेट सर्विस ने उन्हें सुरक्षित रखने के लिए एक अनोखी चाल चली और ट्रंप को एयर फ़ोर्स वन के बजाय दूसरे विमान में ले जाया गया, ताकि संभावित हमलावरों को गुमराह किया जा सके। अमेरिकी इंटेलिजेंस एजेंसियों का मानना है कि ईरान 2020 में हुए उस अमेरिकी ड्रोन हमले का बदला लेना चाहता है, जिसमें ईरानी मिलिट्री कमांडर कासिम सुलेमानी की मौत हो गई थी। हालांकि, सीआईए पिछले साल की शुरुआत से ही इज़राइली इंटेलिजेंस द्वारा दी गई इन विशिष्ट चेतावनियों की पुष्टि करने में असमर्थ रही है।

खुफिया जानकारी और भरोसे का संकट

ईरान के खिलाफ दो सैन्य अभियानों के दौरान सीआईए का एक अलग नज़रिया सामने आया था। सीआईए का यह मानना था कि ईरान से जुड़े खतरों के संबंध में इज़राइली खुफिया जानकारी पर पूरी तरह भरोसा नहीं किया जा सकता। एक पूर्व अमेरिकी अधिकारी ने बताया कि ट्रंप के प्रशासन के दौरान इस आकलन की जानकारी कितने उच्च स्तर तक थी, यह स्पष्ट नहीं हो पाया है। इन चेतावनियों ने यह भी उजागर किया कि ईरान के परमाणु हथियारों और वहां से मिलने वाले तत्काल खतरे को लेकर अमेरिका और इज़राइल के आकलन में कितना गहरा मतभेद है। जहां इज़राइल ईरान को तत्काल खतरा मानता था, वहीं अमेरिकी एजेंसियां इसे लेकर अलग राय रखती थीं।

तुर्की का अपना आकलन

तुर्की के एक अधिकारी ने इस मामले पर अलग ही बयान दिया है। अधिकारी के अनुसार, तुर्की की खुफिया एजेंसी ने उस समय ट्रंप पर मंडरा रहे किसी भी खतरे की पुष्टि नहीं की थी। उनके पास ऐसी कोई स्वतंत्र जानकारी या ठोस सबूत नहीं थे जो यह साबित करते कि ईरान ट्रंप को निशाना बनाने की फिराक में है। इस बारे में तुर्की ने अमेरिका के साथ अपनी जानकारी साझा भी की थी। इसके बावजूद, यह घटना दर्शाती है कि तेहरान के साथ बढ़ते तनाव के दौरान इज़राइल की खुफिया एजेंसी ट्रंप की सुरक्षा से जुड़े फैसलों को किस हद तक प्रभावित कर रही थी।

साहिल चौहान पाबना के वर्ल्ड अफेयर्स रिपोर्टर हैं, जो अंतरराष्ट्रीय खबरें और वैश्विक मामले कवर करते हैं। विदेश नीति, कूटनीति और दुनिया भर के घटनाक्रमों पर उनकी अच्छी पकड़ है। वे जटिल वैश्विक मुद्दों को भारतीय नजरिए से समझाते हैं।

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