जापान की सैन्य शक्ति में बड़ा बदलाव, चीन की घेराबंदी के लिए तैयार हुआ टोक्यो विश्व एक घंटा पहले 2
दशकों से रक्षात्मक नीति पर चलने वाले जापान ने अब अपनी सैन्य रणनीति में बड़ा फेरबदल किया है और लंबी दूरी की मिसाइलों का परीक्षण कर चीन को सख्त संदेश दिया है। इस बदलाव से हिंद प्रशांत क्षेत्र में शक्ति संतुलन बदलने के साथ ही भारत के लिए भी रणनीतिक अवसर बढ़ गए हैं।

जापान की बदलती रक्षा नीति और चीन पर प्रभाव

दुनिया भर में बढ़ रही अस्थिरता और अंतरराष्ट्रीय तनाव के बीच जापान ने अपनी दशकों पुरानी रक्षा नीति से किनारा करना शुरू कर दिया है। लंबे समय से अपनी सुरक्षात्मक सैन्य नीति के लिए पहचाने जाने वाले जापान ने अब आक्रामक क्षमताएं विकसित करने की दिशा में कदम बढ़ाए हैं। जापान द्वारा हाल ही में लंबी दूरी की मिसाइलों का परीक्षण किया गया है, जिसे चीन के विस्तारवादी रवैये और मनमानी के खिलाफ एक बड़े काउंटर के रूप में देखा जा रहा है। पश्चिम एशिया सहित दुनिया के कई हिस्सों में छिड़े संघर्षों ने जापान जैसे शांतिप्रिय देशों को अपनी सुरक्षा प्रणालियों को अपग्रेड करने के लिए मजबूर कर दिया है। वैश्विक स्तर पर अब हथियार खरीदने और उन्हें विकसित करने के लिए बजट का आवंटन तेजी से बढ़ा है।

नई मिसाइल प्रणालियों का परीक्षण और क्षमता

जापान ने अपनी रक्षात्मक नीति में बदलाव करते हुए दो महत्वपूर्ण मिसाइल परीक्षण किए हैं। 'एशिया टाइम्स' की रिपोर्ट के अनुसार, ये परीक्षण केवल तकनीकी उपलब्धि नहीं, बल्कि जापान की सैन्य रणनीति में आए बड़े बदलाव का संकेत हैं। इनमें अमेरिकी टॉमहॉक (Tomahawk) क्रूज मिसाइल और स्वदेशी टाइप-12 मिसाइल शामिल हैं। अब तक जापान केवल दुश्मन के हमलों को रोकने में विश्वास रखता था, लेकिन अब वह दुश्मन के ठिकानों पर सीधे जवाबी हमला करने की क्षमता विकसित कर रहा है।

  • पहला परीक्षण: जापान मैरीटाइम सेल्फ-डिफेंस फोर्स (JMSDF) ने अमेरिकी नौसेना के साथ मिलकर प्रशांत महासागर में कोंगो क्लास के एजिस डिस्ट्रॉयर जेएस चोकाई (JS Chokai) से टॉमहॉक लैंड-अटैक क्रूज मिसाइल का सफल परीक्षण किया। इस उपलब्धि के साथ जापान सतह से मिसाइल दागने वाला दुनिया का तीसरा विदेशी देश बन गया है।
  • दूसरा परीक्षण: जापान एयर सेल्फ-डिफेंस फोर्स (JASDF) ने गिफू एयर बेस पर F-2 लड़ाकू विमान से अपग्रेडेड टाइप-12 मिसाइल का परीक्षण किया। इस मिसाइल की मारक क्षमता 900 किलोमीटर से अधिक है और भविष्य में इसके 1,600 किलोमीटर तक के वेरिएंट विकसित करने की योजना है।

अमेरिका से 400 मिसाइलों की खरीद

जापान ने अपनी रक्षा तैयारियों को मजबूत करने के लिए अमेरिका से 400 टॉमहॉक मिसाइलें खरीदने का समझौता किया है। इन्हें फिलहाल एक अंतरिम उपाय माना जा रहा है, क्योंकि जापान वित्त वर्ष 2027 तक अपनी स्वदेशी लंबी दूरी की स्टैंडऑफ मिसाइलों को सेवा में शामिल करने का लक्ष्य लेकर चल रहा है। इन आधुनिक हथियारों का मुख्य उद्देश्य नेटवर्क आधारित सटीक हमला करना और कम रडार पहचान के साथ दुश्मन के क्षेत्र में घुसपैठ करना है। हालांकि टोक्यो आधिकारिक तौर पर इसे रक्षात्मक ही बताता है, लेकिन रणनीतिक जानकारों का मानना है कि जापान अब हमले की प्रतीक्षा करने के बजाय दुश्मन के ठिकानों को पहले नष्ट करने की सामरिक स्थिति में आना चाहता है।

भारत के लिए सामरिक लाभ

जापान का यह सैन्य कायापलट भारत के लिए काफी महत्वपूर्ण साबित हो सकता है। भारत और जापान के बीच ऐतिहासिक रूप से गहरे और मैत्रीपूर्ण संबंध रहे हैं। चीन अपनी विस्तारवादी नीतियों के कारण समय-समय पर भारत की सीमाओं पर तनाव पैदा करता रहा है। ऐसे में हिंद-प्रशांत क्षेत्र में जापान का सैन्य रूप से मजबूत होना भारत के लिए एक बड़ा रणनीतिक समर्थन है। जापान की बढ़ती सैन्य क्षमता चीन की मनमानियों पर लगाम लगाने के लिए दबाव बनाने का काम करेगी, जिसका सीधा लाभ भारत की क्षेत्रीय सुरक्षा को मिलेगा।

चीन की चिंता और क्षेत्रीय अस्थिरता

जापान की नई सैन्य नीति से बीजिंग की नींद उड़ गई है। पिछले कुछ महीनों में जापान के रक्षा मंत्री शिंजिरो कोइजुमी द्वारा परमाणु हथियारों पर चर्चा की संभावना जताने और प्रधानमंत्री सानाए ताकाइची द्वारा ताइवान को जापान की सुरक्षा से जुड़ा मुद्दा बताने के बाद चीन ने अपनी नाराजगी जाहिर की है। विश्लेषकों का मानना है कि यदि जापान दुश्मन पर पहले हमला करने की क्षमता हासिल कर लेता है, तो चीन अपनी परमाणु और सैन्य रणनीति में भी बड़ा बदलाव कर सकता है, जिससे पूरे क्षेत्र में सामरिक अस्थिरता बढ़ सकती है।

जापान की सीमाएं और चुनौतियां

इतनी बड़ी क्षमताओं के बावजूद जापान के सामने कुछ बड़ी चुनौतियां भी हैं। सबसे बड़ी समस्या स्वतंत्र 'किल चेन' की कमी है। जापान अभी भी लक्ष्य की पहचान, निगरानी और हमले के आकलन के लिए अमेरिकी खुफिया, निगरानी और टोही (ISR) सिस्‍टम पर पूरी तरह निर्भर है। यदि किसी संघर्ष के दौरान अमेरिका और जापान का तालमेल बिगड़ता है या चीन संचार तंत्र को बाधित कर देता है, तो जापान की नई मिसाइल प्रणालियों का प्रभाव काफी सीमित हो जाएगा। साथ ही, जापान के घरेलू रक्षा उद्योग की उत्पादन क्षमता अभी सीमित है। अमेरिका से मिलने वाली टॉमहॉक मिसाइलों की आपूर्ति में वैश्विक मांग के कारण 47 महीने तक का समय लग सकता है।

संवैधानिक और राजनीतिक पेच

जापान के सामने केवल सामरिक नहीं, बल्कि संवैधानिक प्रश्न भी खड़े हैं। जापान का संविधान केवल आत्मरक्षा के लिए ही सैन्य बल के प्रयोग की अनुमति देता है। सरकार का तर्क है कि दुश्मन के क्षेत्र पर हमला करना भी संवैधानिक हो सकता है, यदि वह किसी सशस्त्र हमले के जवाब में न्यूनतम आवश्यक बल के रूप में हो। हालांकि विपक्षी दल और कोमेतो जैसे सहयोगी दलों का मानना है कि इससे भविष्य में बिना उकसावे के हमलों का रास्ता खुल सकता है। बहस इस बात पर है कि क्या जवाबी कार्रवाई केवल वास्तविक हमले के बाद होनी चाहिए या दुश्मन की तैयारी को देखते हुए पहले ही हमला कर देना चाहिए। ये उलझनें जापान को अमेरिकी नेतृत्व वाले अभियानों में और अधिक गहराई से शामिल कर सकती हैं, जो वहां की घरेलू राजनीति में भी एक बड़ा मुद्दा बना हुआ है।

साहिल चौहान पाबना के वर्ल्ड अफेयर्स रिपोर्टर हैं, जो अंतरराष्ट्रीय खबरें और वैश्विक मामले कवर करते हैं। विदेश नीति, कूटनीति और दुनिया भर के घटनाक्रमों पर उनकी अच्छी पकड़ है। वे जटिल वैश्विक मुद्दों को भारतीय नजरिए से समझाते हैं।

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