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2 घंटे पहले
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स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के जरिए ट्रंप का नया एग्जिट प्लान
ईरान के साथ चल रहे सैन्य गतिरोध को हल करने की दिशा में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप एक नई रणनीति पर विचार कर रहे हैं। हालिया मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, ट्रंप अब परमाणु समझौते के बजाय स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को पूरी तरह से दोबारा खोलने को अपनी सर्वोच्च प्राथमिकता बना रहे हैं। ट्रंप ने अपने करीबी सहयोगियों और अधिकारियों के सामने यह संकेत दिए हैं कि यदि ईरान इस महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग पर यातायात को बिना किसी बाधा के बहाल कर देता है, तो अमेरिका परमाणु समझौते के बिना भी इस संघर्ष को समाप्त करने का विकल्प चुन सकता है।
ईरान की कड़वी शर्तें और जटिलताएं
हालांकि, यह राह इतनी आसान नहीं दिख रही है क्योंकि ईरान ने होर्मुज को खोलने के बदले में ऐसी कठोर शर्तें रख दी हैं, जो किसी भी समझौते के रास्ते में बड़ी बाधा बन सकती हैं। तेहरान ने अमेरिका के सामने अरबों डॉलर के भुगतान की मांग रखी है। इसके अलावा, ईरान चाहता है कि अमेरिका क्षेत्र में अपनी नौसैनिक नाकेबंदी को तुरंत प्रभाव से खत्म करे और अपनी सैन्य टुकड़ियों को वापस बुला ले। इन भारी-भरकम रियायतों की मांग ने कूटनीतिक गलियारों में हलचल पैदा कर दी है।
होर्मुज की अहमियत और वैश्विक तेल बाजार
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज दुनिया भर के तेल परिवहन के लिए सबसे महत्वपूर्ण और संवेदनशील समुद्री मार्गों में गिना जाता है। हाल के दिनों में ईरान द्वारा मिसाइल और ड्रोन हमलों की धमकियों ने इस मार्ग पर समुद्री आवाजाही को बुरी तरह प्रभावित किया है। इस अस्थिरता का सीधा असर वैश्विक तेल बाजार पर पड़ा है। ट्रंप प्रशासन के दावे के विपरीत, ईरान का रुख काफी अलग है। तेहरान न केवल अमेरिकी युद्धपोतों की आवाजाही पर आपत्ति जता रहा है, बल्कि उसने व्यावसायिक जहाजों से इस मार्ग के इस्तेमाल के बदले शुल्क वसूलने की भी बात कही है, जिसे अमेरिका ने स्पष्ट रूप से नकार दिया है।
ईरान की मांगों की लंबी सूची
ईरान की सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल के सचिव मोहम्मद बाघेर ज़ोलघद्र ने एक विस्तृत मांग सूची पेश की है। उनकी शर्तों में अमेरिका द्वारा युद्ध को स्थायी रूप से रोकना, ईरानी संपत्तियों पर लगे प्रतिबंधों को हटाना और जब्त की गई संपत्तियों को मुक्त करना शामिल है। तेहरान इसके साथ ही युद्ध क्षतिपूर्ति के रूप में बड़ी आर्थिक सहायता की भी मांग कर रहा है। ईरान चाहता है कि अमेरिका न केवल अपनी धमकियों और बयानबाजी को बंद करे, बल्कि क्षेत्र में ईरान समर्थित मिलिशिया समूहों के खिलाफ चल रही अमेरिकी सैन्य कार्रवाई को भी पूर्ण विराम दे।
घरेलू राजनीति और ट्रंप की मजबूरी
ट्रंप के इस नए रुख के पीछे घरेलू राजनीति का बड़ा दबाव है। अमेरिका में मध्यावधि चुनावों में अब 3 महीने से भी कम समय शेष है। युद्ध के कारण पेट्रोल की कीमतों में हुई भारी वृद्धि ने आम अमेरिकी नागरिकों की जेब पर असर डाला है, जिसका सीधा असर चुनावों पर पड़ सकता है। ऐसे में ट्रंप के लिए यह जरूरी है कि वह इस संघर्ष को एक ऐसी सफलता के रूप में पेश करें जिसे उनकी बड़ी उपलब्धि माना जाए। होर्मुज में सामान्य आवाजाही बहाल होना ट्रंप के लिए एक बड़े राजनीतिक आधार के रूप में काम आ सकता है।
परमाणु मुद्दे को क्यों नजरअंदाज किया जा रहा है?
लंबे समय से अमेरिका और ईरान के बीच परमाणु कार्यक्रम ही विवाद का केंद्र रहा है। ट्रंप प्रशासन का यह दावा हमेशा रहा है कि ईरान को परमाणु हथियार नहीं बनाने दिए जाएंगे। हालांकि, अब ट्रंप का मानना है कि अमेरिका द्वारा ईरान की महत्वपूर्ण परमाणु सुविधाओं को पहुंचाए गए नुकसान के बाद, तेहरान के लिए इस कार्यक्रम को दोबारा शुरू करना बेहद मुश्किल होगा। ट्रंप का खुफिया तंत्र पर भरोसा है कि किसी भी नई हलचल को तुरंत पकड़ा जा सकता है और सैन्य कार्रवाई का डर ईरान को दोबारा परमाणु हथियार की ओर बढ़ने से रोक सकता है। यही कारण है कि अब परमाणु समझौते के बजाय होर्मुज का मुद्दा ट्रंप की प्राथमिकताओं में ऊपर आ गया है।
आर्थिक चुनौतियां बनीं सबसे बड़ी अड़चन
बातचीत में सबसे बड़ा पेंच ईरान की आर्थिक मांगों पर फंसा हुआ है। ट्रंप ने पहले ही यह स्पष्ट कर दिया है कि अमेरिकी करदाताओं का पैसा ईरान को नहीं दिया जाएगा, जबकि तेहरान अरबों डॉलर के मुआवजे और संपत्तियों की रिहाई पर अड़ा हुआ है। हालांकि, अमेरिकी अधिकारियों के बीच इस बात पर चर्चा चल रही है कि क्या कुछ शर्तों के साथ ईरान की जमी हुई संपत्तियों को आंशिक रूप से जारी किया जा सकता है। तेल निर्यात की अनुमति और प्रतिबंधों में ढील भी समझौते के भविष्य के लिए बहुत महत्वपूर्ण साबित होने वाले हैं।
क्या बिना परमाणु समझौते के मिलेगी शांति?
वर्तमान स्थिति यह है कि यदि ईरान होर्मुज में जहाजों की आवाजाही बहाल करने को मान जाता है, तो ट्रंप के पास एक रास्ता खुल सकता है। लेकिन ईरान की मांगे साफ दर्शाती हैं कि तेहरान रियायतों के बिना पीछे हटने वाला नहीं है। आगामी दिनों में बातचीत का पूरा केंद्र परमाणु हथियार से हटकर प्रतिबंध, सैन्य मौजूदगी और मुआवजे जैसे आर्थिक मुद्दों पर सिमट जाने की संभावना है।
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