जीवनशैली
3 घंटे पहले
2
विचारों
चिकित्सा विज्ञान ने आज के समय में इतनी असाधारण प्रगति कर ली है कि जिन बातों की कल्पना करना भी कुछ समय पहले तक असंभव लगता था, वे आज हकीकत बन चुकी हैं। क्या आपने कभी सोचा है कि एक अजन्मा बच्चा, जो अभी अपनी मां के गर्भ में ही पल रहा है, उसका भी कोई ऑपरेशन या जटिल इलाज किया जा सकता है? पहली बार सुनने में यह बात किसी चमत्कार जैसी लग सकती है, लेकिन आज की आधुनिक स्वास्थ्य तकनीकों और फीटल मेडिसिन (भ्रूण चिकित्सा) ने इस असंभव कार्य को पूरी तरह से संभव बना दिया है।
गर्भावस्था के दौरान ही शिशु के इलाज की तकनीक
आजकल ऐसी कई गंभीर और आपातकालीन स्थितियां सामने आती हैं, जिनमें डॉक्टर बच्चे के जन्म लेने का इंतजार नहीं कर सकते। वे जानते हैं कि अगर बच्चे के जन्म तक इंतजार किया गया, तो या तो उसकी जान को खतरा हो सकता है या फिर जन्म के तुरंत बाद उसे बहुत गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। इसी वजह से मां के गर्भ के भीतर ही बच्चे का उपचार शुरू कर दिया जाता है। हालांकि, यह बेहद संवेदनशील प्रक्रिया होती है और हर गर्भवती महिला को इसकी जरूरत नहीं होती।
हरियाणा के फरीदाबाद में स्थित प्रसिद्ध अमृता हॉस्पिटल की फीटल मेडिसिन विशेषज्ञ डॉ. रीमा भट्ट इस विषय पर महत्वपूर्ण जानकारी देती हैं। उनका कहना है कि गर्भ के अंदर पल रहे भ्रूण का उपचार अब पूरी तरह से व्यावहारिक और सफल हो चुका है। हालांकि हर मामले में इसकी आवश्यकता नहीं पड़ती, लेकिन कुछ खास गंभीर परिस्थितियों में समय रहते उठाया गया यह कदम अजन्मे बच्चे के लिए जीवनदान साबित होता है। इससे न केवल बच्चे को बचाया जा सकता है, बल्कि पूरी गर्भावस्था को भी सुरक्षित ढंग से आगे बढ़ाया जा सकता है।
शिशु में खून की कमी और गर्भ में ब्लड ट्रांसफ्यूजन
कई बार गर्भावस्था के दौरान गर्भस्थ शिशु को गंभीर रूप से एनीमिया यानी खून की कमी हो जाती है। डॉ. रीमा भट्ट के अनुसार, इसके पीछे कई वजहें हो सकती हैं। उदाहरण के लिए, यदि गर्भवती महिला के शरीर में कोई गंभीर संक्रमण (इंफेक्शन) फैल जाता है, तो उसका सीधा असर बच्चे के स्वास्थ्य पर पड़ता है। इसके अलावा, एक और मुख्य कारण आरएच नेगेटिव (Rh Negative) मां का होना है। जब मां का ब्लड ग्रुप आरएच नेगेटिव होता है और बच्चे का पॉजिटिव, तब मां का शरीर बच्चे की लाल रक्त कोशिकाओं के खिलाफ एंटीबॉडी बनाने लगता है, जिससे बच्चे के शरीर में खून की भारी कमी हो जाती है।
इस खतरनाक स्थिति से निपटने के लिए डॉक्टर बेहद आधुनिक तकनीकों का सहारा लेते हैं। वे अल्ट्रासाउंड मशीन की सटीक निगरानी में गर्भ के भीतर ही सीधे बच्चे के शरीर में खून चढ़ाते हैं। इस प्रक्रिया से बच्चे की सेहत में तेजी से सुधार होता है और गर्भ में ही उसकी जान बचा ली जाती है।
जुड़वा बच्चों की जटिलताएं और लेजर थेरेपी का कमाल
जुड़वा बच्चों की गर्भावस्था (ट्विन प्रेग्नेंसी) में अक्सर कई तरह की स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियां सामने आती हैं। विशेष रूप से उन मामलों में, जहां दोनों बच्चे मां के पेट में एक ही प्लेसेंटा (गर्भनाल) को आपस में साझा करते हैं। इस स्थिति में एक बेहद जटिल समस्या पैदा हो सकती है, जिसे चिकित्सा की भाषा में रक्त का असंतुलन कहा जाता है। इसे चिकित्सा जगत में TTTS भी कहा जाता है।
ऐसी स्थिति में एक बच्चे को जरूरत से ज्यादा खून मिलने लगता है, जबकि दूसरे बच्चे तक पर्याप्त मात्रा में रक्त नहीं पहुंच पाता। इसका परिणाम यह होता है कि एक बच्चा बहुत तेजी से विकसित होने लगता है और दूसरा बच्चा बेहद कमजोर और कुपोषित रह जाता है। इस असंतुलन को ठीक करने के लिए डॉक्टर अब आधुनिक लेजर थेरेपी का इस्तेमाल करते हैं। लेजर तकनीक की मदद से उन रक्त वाहिकाओं को बंद कर दिया जाता है जो इस असंतुलन का कारण बनती हैं, जिससे दोनों बच्चों को बराबर मात्रा में पोषण मिल सके और उनका विकास सही तरीके से हो।
फेफड़ों में पानी भरना और रीढ़ की हड्डी की जटिल सर्जरी
कुछ मामलों में गर्भावस्था के दौरान अजन्मे बच्चे के फेफड़ों या पेट के हिस्से में असामान्य रूप से पानी जमा होने लगता है। अगर इस पानी को समय पर बाहर न निकाला जाए, तो बच्चे के अंगों के विकास में बाधा आती है और उसकी जान को गंभीर खतरा पैदा हो जाता है। डॉ. रीमा भट्ट बताती हैं कि ऐसी स्थिति में डॉक्टर सबसे पहले उस पानी के नमूने की जांच करते हैं ताकि समस्या की असली वजह का पता लगाया जा सके।
जांच के बाद, यदि आवश्यक हो, तो गर्भ के भीतर ही बच्चे के शरीर में एक विशेष प्रकार का शंट (एक छोटी नली) डाला जाता है। यह शंट अतिरिक्त पानी को लगातार बाहर निकालता रहता है, जिससे बच्चे के अंगों पर दबाव कम होता है और वह गर्भ में सुरक्षित रूप से सांस ले पाता है। इसके अलावा, रीढ़ की हड्डी से जुड़ी कुछ जन्मजात विकृतियों (जैसे स्पाइना बिफिडा) का इलाज भी अब गर्भावस्था के दौरान ही सर्जरी के जरिए संभव हो गया है।
प्रक्रिया के लाभ, संभावित जोखिम और सफलता की दर
क्या गर्भ के भीतर होने वाली यह जटिल सर्जरी और इलाज पूरी तरह से सुरक्षित है? इस सवाल पर डॉ. रीमा भट्ट का कहना है कि दुनिया की किसी भी अन्य बड़ी सर्जरी की तरह यह प्रक्रिया भी पूरी तरह से जोखिम मुक्त नहीं होती। इस इलाज के दौरान कुछ संभावित खतरे हमेशा बने रहते हैं, जिनमें निम्नलिखित शामिल हैं:
- गर्भवती महिला को समय से पहले प्रसव पीड़ा (प्रीमैच्योर लेबर पेन) शुरू होना।
- गर्भ के भीतर पानी की थैली (एमनियोटिक सैक) का अचानक फट जाना।
- गर्भाशय में संक्रमण का खतरा पैदा होना।
डॉक्टर स्पष्ट करती हैं कि इन जोखिमों के बावजूद, जब बच्चे की जान बचाने के लिए कोई दूसरा रास्ता नहीं बचता, तब इस प्रक्रिया के फायदे इसके नुकसान से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो जाते हैं। यदि सही चिकित्सीय कारणों से और पूरी सावधानी के साथ यह इलाज किया जाए, तो लगभग 90 प्रतिशत मामलों में इसके बेहद सकारात्मक और अच्छे परिणाम देखने को मिलते हैं। इसके साथ ही, यह प्रक्रिया आमतौर पर मां के स्वास्थ्य के लिए भी काफी सुरक्षित मानी जाती है।
नियमित जांच ही है सुरक्षित मातृत्व की कुंजी
इस पूरी प्रक्रिया में सबसे महत्वपूर्ण कड़ी है समय पर सही बीमारी की पहचान होना। यदि समय रहते अजन्मे बच्चे की बीमारी का पता चल जाए, तो उसे गर्भ में ही खून चढ़ाकर, शंट लगाकर या लेजर थेरेपी देकर एक नया जीवन दिया जा सकता है। डॉ. रीमा भट्ट विशेष रूप से जोर देकर कहती हैं कि प्रत्येक गर्भवती महिला को अपनी गर्भावस्था के दौरान डॉक्टरों द्वारा बताई गई सभी नियमित जांचें (जैसे समय-समय पर अल्ट्रासाउंड और रक्त परीक्षण) जरूर करानी चाहिए। किसी भी मामूली दिखने वाली असहजता या परेशानी को नजरअंदाज करना भारी पड़ सकता है। सही समय पर लिया गया एक सही फैसला अजन्मे शिशु को एक पूर्ण, स्वस्थ और खुशहाल जीवन की सौगात दे सकता है।
Comments
0 comment