भारत
एक घंटा पहले
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विचारों
सऊदी अरब के लिए संकट का वर्ष
ईरान और अमेरिका के बीच छिड़ी जंग ने पूरे अरब जगत को हिला कर रख दिया है। इस भू-राजनीतिक उथल-पुथल में हूती विद्रोहियों की सक्रियता ने स्थिति को और भी अधिक विस्फोटक बना दिया है। सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान, जिन्हें दुनिया एमबीएस के नाम से जानती है, ने अपने देश की सुरक्षा के लिए डोनाल्ड ट्रंप के अमेरिका से लेकर तुर्की और पाकिस्तान तक के साथ गठबंधन किए थे। हालांकि, समय आने पर ये सभी रणनीतिक साझीदार एक-दूसरे की ओर देखने लगे हैं और कोई भी खुलकर साथ देने को तैयार नहीं है। ऐसा प्रतीत हो रहा है कि सऊदी अरब के प्रिंस के सभी सपने एक-एक करके बिखर रहे हैं।
साल 2026 और बिगड़ते समीकरण
वर्ष 2026 सऊदी अरब के लिए अत्यंत चुनौतीपूर्ण सिद्ध हो रहा है। जिस प्रकार ज्योतिष में राहु की स्थिति घातक मानी जाती है, कुछ वैसा ही हाल इस समय सऊदी अरब का है। इजरायल द्वारा ईरान के खिलाफ अमेरिका से सैन्य हस्तक्षेप की मांग के बाद स्थिति बिगड़ गई। अमेरिका और ईरान के बीच सीधी जंग छिड़ गई है और सऊदी अरब अनजाने में ही इस क्रॉसफायर के बीच फंसा हुआ है। सऊदी अरब ने हमेशा तेल की शक्ति और अमेरिकी सुरक्षा छतरी के भरोसे अपने भविष्य की नींव रखी थी। जब अमेरिकी सुरक्षा नाकाफी लगी, तो उन्होंने तुर्की और पाकिस्तान को शामिल करते हुए एक इस्लामिक नाटो जैसी व्यवस्था बनाने का प्रयास किया, लेकिन धरातल पर यह प्रयोग पूरी तरह विफल साबित हुआ है।
हूती लड़ाकों की चुनौती और सुरक्षा का संकट
यमन के हूती लड़ाकों ने सऊदी अरब की नींद हराम कर दी है। अब तक रियाद के हवाई अड्डे पर हमले हो चुके हैं, और हाल ही में दम्माम एयरपोर्ट भी निशाने पर रहा है। सऊदी अरब के तेल के कुओं, रिफाइनरियों और महत्वपूर्ण पाइपलाइनों पर बार-बार हमले हो रहे हैं। हैरानी की बात यह है कि अमेरिका, पाकिस्तान और तुर्की सभी मदद के वादे तो करते हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर मोहम्मद बिन सलमान के बनाए गए सुरक्षा ढांचे को कोई भी नहीं संभाल पा रहा है। प्रिंस के लिए यह स्थिति बेहद पीड़ादायक है क्योंकि उन्होंने अपनी सत्ता और देश की छवि को आधुनिक बनाने के लिए अथक प्रयास किए थे।
सत्ता का केंद्रीकरण और विजन 2030
मोहम्मद बिन सलमान की सत्ता यात्रा 2015 में शुरू हुई थी, जब उनके पिता किंग सलमान ने उन्हें रक्षा मंत्री नियुक्त किया था। 2017 में उन्होंने अपने चचेरे भाई मोहम्मद बिन नायेफ को हटाकर खुद क्राउन प्रिंस का पद संभाला। इसके बाद उन्होंने रिट्ज-कार्लटन होटल में एक व्यापक अभियान चलाकर कई राजकुमारों और व्यापारियों को गिरफ्तार किया, जिससे विरोधियों को स्पष्ट संदेश मिल गया। इसके बाद उन्होंने अपना महात्वाकांक्षी प्रोजेक्ट 'विजन 2030' लॉन्च किया। इस योजना का उद्देश्य सऊदी अरब की अर्थव्यवस्था को तेल पर निर्भरता से मुक्त करना था। उन्होंने नीओम जैसे आधुनिक शहर बनाने, लाल सागर पर पर्यटन को बढ़ावा देने और सिनेमाघरों व कॉन्सर्ट जैसे सांस्कृतिक बदलावों के माध्यम से देश को एक खुला और प्रगतिशील वैश्विक केंद्र बनाने का सपना देखा था।
विदेशी नीति के दांव और बदली हकीकत
एमबीएस ने विदेश नीति में भी कई बड़े बदलाव किए थे। 2015 में यमन में हूती विरोधी अभियान, कतर की नाकाबंदी, और ट्रंप प्रशासन के साथ घनिष्ठ संबंध बनाकर भारी मात्रा में हथियारों की खरीद उनके प्रमुख कदम थे। 2023 में चीन की मध्यस्थता से ईरान के साथ समझौता करना उनकी स्थिरता की चाहत को दर्शाता था। उन्होंने फुटबॉल क्लब खरीदने और गोल्फ लीग शुरू करने जैसे खेलों के माध्यम से अपनी वैश्विक छवि को पूरी तरह बदल दिया था। लेकिन आज, जब रियाद और दम्माम जैसे प्रमुख शहरों के हवाई अड्डे निशाने पर हैं, तो फ्लाइटें रद्द हो रही हैं और विदेशी निवेशकों का डर बढ़ रहा है। मिसाइल हमलों के डर से न तो टूरिस्ट आ रहे हैं और न ही निवेशक, जिससे उनके विजन 2030 का भविष्य अधर में लटक गया है।
ट्रंप पर भरोसे की विफलता
एमबीएस की रणनीति का एक मुख्य स्तंभ डोनाल्ड ट्रंप पर भरोसा करना था। उन्हें विश्वास था कि अमेरिका के साथ मजबूत संबंध और हथियारों की बड़ी खरीद उन्हें ईरान से सुरक्षा प्रदान करेगी। लेकिन यमन में जैसे ही हूती हमलों की तीव्रता बढ़ी, अमेरिका ने सऊदी अरब में मौजूद अपने स्टाफ और उनके परिवारों को वहां से निकाल लिया। इसके अलावा, अमेरिका से खरीदे गए अरबों डॉलर के पेट्रियट एयर डिफेंस सिस्टम भी हमलों को रोकने में पूरी तरह सक्षम नहीं हो पाए हैं। लगातार हमलों के कारण इंटरसेप्टर मिसाइलें कम पड़ रही हैं और इन प्रणालियों की तकनीकी खामियां सार्वजनिक हो गई हैं।
इस्लामिक नाटो की जमीनी सच्चाई
तुर्की और पाकिस्तान के साथ रक्षा समझौते को इस्लामिक नाटो के रूप में पेश किया गया था, जो पूरी तरह खोखला साबित हुआ है। तुर्की के विदेश मंत्री ने स्पष्ट कर दिया है कि वे आक्रामक लड़ाई में शामिल नहीं होंगे और किसी दूसरे देश की भूमि पर सेना नहीं भेजेंगे। तुर्की के अपने हित हैं और वह ईरान के साथ सीधे टकराव से बच रहा है। वहीं, पाकिस्तान की स्थिति अलग है। वहां के रक्षा मंत्री के अनुसार, पाकिस्तान केवल सहयोग की भूमिका में है। हकीकत यह है कि पाकिस्तान ईरान का पड़ोसी है और वह हूती लड़ाकों के खिलाफ सीधी सैन्य कार्रवाई करके ईरान से अपने संबंधों को खतरे में नहीं डालना चाहता। सुख के समय में सभी सऊदी अरब के साथी थे, लेकिन आज इस गंभीर संकट के समय में मोहम्मद बिन सलमान अकेले खड़े नजर आ रहे हैं।
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