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एक घंटा पहले
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छठ पूजा का महत्व और परंपरा
छठ महापर्व को सनातन धर्म के सबसे कठिन और पवित्र व्रतों में से एक माना जाता है। इस कठिन उपवास में श्रद्धालु पूरे 36 घंटे तक बिना जल ग्रहण किए निर्जला व्रत रखते हैं। इस विशेष पर्व को सूर्य षष्ठी, डाला पूजा, छठी मैया या डाला छठ जैसे विभिन्न नामों से भी पुकारा जाता है। इस दौरान भगवान सूर्य और छठी मैया की विधि-विधान से पूजा की जाती है। मान्यता है कि जो भी श्रद्धालु सच्ची श्रद्धा से छठ का व्रत करते हैं, उन्हें संतान सुख और दीर्घायु का आशीर्वाद मिलता है। साथ ही, यह पर्व परिवार में सुख, शांति और समृद्धि लाने वाला माना गया है। यह पर्व कुल चार दिनों तक चलता है, जिसकी शुरुआत 'नहाय-खाय' से होती है।
छठ पूजा 2026 का आधिकारिक कैलेंडर
- नहाय-खाय: 13 नवंबर 2026
- खरना: 14 नवंबर 2026
- संध्या अर्घ्य: 15 नवंबर 2026
- उषा अर्घ्य और पारण: 16 नवंबर 2026
पहला दिन: नहाय-खाय
चार दिनों तक चलने वाले इस आस्था के महापर्व का आगाज 13 नवंबर 2026 को 'नहाय-खाय' के साथ होगा। इस दिन व्रती महिलाएं सूर्योदय से पूर्व उठकर पवित्र स्नान करती हैं और स्वच्छ वस्त्र धारण करने के पश्चात सूर्य देव को जल अर्पित करती हैं। इसके बाद सात्विक भोजन ग्रहण किया जाता है। ध्यान रखने योग्य बात यह है कि इस दिन का भोजन पूर्णतः शुद्ध और सात्विक होता है, जिसमें लहसुन और प्याज का उपयोग वर्जित है। पारंपरिक रूप से इस दिन कद्दू की सब्जी, चने की दाल और चावल का सेवन किया जाता है।
दूसरा दिन: खरना
छठ पूजा का दूसरा दिन 'खरना' के रूप में मनाया जाता है, जो इस वर्ष 14 नवंबर 2026 को पड़ेगा। इस दिन व्रती पूरे दिन का उपवास रखते हैं और सूर्यास्त के बाद विशेष पूजा करते हैं। रात में गुड़, दूध और चावल से बनी खीर का प्रसाद ग्रहण किया जाता है। खरना के बाद से ही व्रती महिलाओं का कठिन 36 घंटे का निर्जला उपवास शुरू हो जाता है। खरना के दिन नमक का सेवन पूरी तरह निषेध रहता है।
तीसरा दिन: संध्या अर्घ्य
पर्व का तीसरा दिन अत्यंत महत्वपूर्ण होता है, जिसे 'संध्या अर्घ्य' के नाम से जाना जाता है। इस वर्ष 15 नवंबर 2026 को व्रती महिलाएं नदी या किसी जल निकाय में खड़ी होकर अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ्य देंगी। यह डूबते हुए सूर्य को नमन करने की एक अद्भुत परंपरा है।
चौथा दिन: उषा अर्घ्य और समापन
छठ महापर्व का अंतिम और चौथा दिन 'उषा अर्घ्य' कहलाता है। इस दिन व्रती महिलाएं भोर में उगते हुए सूर्य देव को जल अर्पित करती हैं, जिसे उषा अर्घ्य कहा जाता है। 16 नवंबर 2026 को सूर्य देव को अर्घ्य देने के साथ ही यह महापर्व संपन्न होता है और इसके पश्चात व्रती अपना व्रत खोलते हैं, जिसे पारण कहा जाता है।
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