अमेज़न की 46 लाख की नौकरी छोड़ सेना में बने लेफ्टिनेंट: लगातार 7 बार मिली विफलता, लेकिन 8वें प्रयास में पूरा किया देश सेवा का सपना करियर 5 घंटे पहले 2
लखनऊ के शारदेंदु तिवारी ने अमेज़न में 46 लाख रुपये सालाना पैकेज वाली क्लाउड इंजीनियर की नौकरी छोड़कर देश सेवा का मार्ग चुना है। सात बार असफल होने के बाद आखिरकार आठवें प्रयास में उन्होंने भारतीय सेना में लेफ्टिनेंट बनने का गौरव हासिल किया।

देश सेवा और देशभक्ति का जज्बा जब मन में होता है, तो लाखों-करोड़ों रुपये के कॉर्पोरेट पैकेज भी फीके लगने लगते हैं। उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के रहने वाले शारदेंदु तिवारी ने इस बात को सच साबित कर दिखाया है। शारदेंदु ने ग्लोबल मल्टीनेशनल कंपनी अमेज़न में मिलने वाले 46 लाख रुपये के भारी-भरकम सालाना पैकेज वाली शानदार नौकरी को ठुकरा दिया और देश की रक्षा के लिए भारतीय सेना का रास्ता चुना। गया के ऑफिसर्स ट्रेनिंग एकेडमी में 5 सितंबर को आयोजित पासिंग आउट सेरेमनी के बाद शारदेंदु अब सेना में लेफ्टिनेंट बन चुके हैं।

अमेज़न में क्लाउड इंजीनियर की आरामदायक नौकरी छोड़ी

भारतीय सेना में शामिल होने से पहले शारदेंदु अमेज़न कंपनी में क्लाउड इंजीनियर के पद पर कार्यरत थे। वहां उन्हें न केवल बेहतरीन वेतन मिल रहा था, बल्कि एक बेहद आरामदायक और सुरक्षित जीवन भी हासिल था। लेकिन शारदेंदु के मन में कुछ और ही चल रहा था। वे अपने पिता के नक्शेकदम पर चलना चाहते थे और देश की सेवा को सबसे ऊपर मानते थे। उनके पिता कैप्टन राजकुमार तिवारी ने सेना सेवा कोर में पूरे 36 वर्षों तक देश की सेवा की है। अब उनका बेटा अपने परिवार की इस गौरवशाली विरासत को आगे बढ़ाएगा।

शारदेंदु तिवारी का शैक्षणिक और करियर सफर

  • शारदेंदु की शुरुआती स्कूली शिक्षा केंद्रीय विद्यालय से पूरी हुई थी।
  • उन्होंने पंजाब इंजीनियरिंग कॉलेज चंडीगढ़ से BE IT और MTech कंप्यूटर साइंस एंड इनफॉरमेशन सिक्योरिटी की डिग्री हासिल की।
  • पढ़ाई पूरी होने के बाद उन्हें दिग्गज ई-कॉमर्स कंपनी अमेज़न में क्लाउड इंजीनियर के रूप में 46 लाख रुपये के सालाना पैकेज पर नौकरी मिली थी।
  • इसके साथ ही, उन्हें दुनिया की प्रसिद्ध एयरोस्पेस कंपनी एयरबस से भी एक शानदार ऑफर मिला था, जिसे उन्होंने देश सेवा के लिए ठुकरा दिया।

7 बार मिली विफलता, लेकिन नहीं मानी हार

भले ही शारदेंदु आज भारतीय सेना में अधिकारी बन गए हैं, लेकिन उनका यह सफर इतना आसान नहीं था। इस मुकाम तक पहुंचने के लिए उन्हें कड़ा संघर्ष करना पड़ा है। शारदेंदु सेना की चयन प्रक्रिया में लगातार सात बार असफल हुए। इतनी बार मिली विफलता के बाद कोई भी आम इंसान अपना हौसला खो बैठता है, लेकिन शारदेंदु ने हिम्मत नहीं हारी। उन्होंने लगातार अपनी कमियों को सुधारा और आखिरकार अपने आठवें प्रयास में शॉर्ट सर्विस कमिशन टेक्निकल एंट्री के माध्यम से सफलता हासिल की।

ओटीए गया में दिखाया उत्कृष्ट नेतृत्व कौशल

सेना में चयन के बाद उन्हें गया स्थित ऑफिसर्स ट्रेनिंग एकेडमी में कठिन प्रशिक्षण के लिए भेजा गया। ट्रेनिंग के दौरान शारदेंदु ने अपनी अद्भुत क्षमता और बेहतरीन लीडरशिप स्किल्स का परिचय दिया। उनके इसी शानदार प्रदर्शन को देखते हुए उन्हें एकेडमी में कैडेटों के सबसे ऊंचे पदों में से एक सीनियर अंडर ऑफिसर चुना गया। सेना में औपचारिक रूप से लेफ्टिनेंट के पद पर कमीशन होने के बाद शारदेंदु ने कहा कि सेना की वर्दी पहनने के बाद अब उनके कंधों पर जिम्मेदारी और देश के प्रति कर्तव्य का भार बहुत अधिक बढ़ गया है, जिसे निभाने के लिए वे पूरी तरह तैयार हैं।

बेटे की सफलता पर गर्व से चौड़ा हुआ पिता का सीना

शारदेंदु की इस बड़ी सफलता पर उनके पिता कैप्टन राजकुमार तिवारी बेहद भावुक और गौरवान्वित हैं। उन्होंने अपनी खुशी व्यक्त करते हुए कहा कि उन्हें इस बात पर गर्व है कि उनके बेटे ने उन्हीं के दिखाए रास्ते पर चलकर परिवार का मान-सम्मान बढ़ाया है। उनका कहना है कि भले ही उनका बेटा कॉर्पोरेट जगत में बहुत अच्छे पैकेज पर काम कर रहा था, लेकिन जब बात राष्ट्र सेवा की आती है, तो दुनिया की हर दौलत और ऐशो-आराम उसके सामने छोटे लगने लगते हैं। बचपन से ही शारदेंदु का यह सपना था कि वे सेना में जाएं और आज उनका वह सपना पूरी तरह सच हो गया है।

अंजलि सिंह पाबना की राज्य संवाददाता हैं, जो विभिन्न राज्यों की क्षेत्रीय खबरें और खानपान कवर करती हैं। स्थानीय घटनाओं, संस्कृति और जायके की कहानियों को वे करीब से रिपोर्ट करती हैं। अलग-अलग राज्यों की विविधता उनकी रिपोर्टिंग में नजर आती है।

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