हथियार छोड़ कलम उठाई, 7 पूर्व नक्सलियों ने SSC परीक्षा पास कर लिखी नई इबारत करियर 2 घंटे पहले 5
छत्तीसगढ़ में हिंसा का रास्ता छोड़ मुख्यधारा में लौटे 7 पूर्व नक्सलियों ने SSC की परीक्षा पास कर समाज के सामने एक मिसाल कायम की है। इनमें से 3 पूर्व माओवादियों ने फर्स्ट क्लास अंकों के साथ सफलता हासिल की है।

हिंसा के अंधेरे से शिक्षा की रोशनी तक का सफर

जीवन में कई बार इंसान ऐसे मुकाम पर खड़ा होता है, जहां एक ओर बारूद और बंदूकों का शोर होता है, तो दूसरी ओर किताबों की खामोश दुनिया होती है। छत्तीसगढ़ के जंगलों में कभी बंदूक लेकर घूमने वाले युवाओं ने जब हिंसा का दामन छोड़कर मुख्यधारा में वापस आने का फैसला किया, तो शायद ही किसी ने सोचा होगा कि ये लोग इतनी जल्दी समाज में अपनी एक नई पहचान बना लेंगे। पिछले साल आत्मसमर्पण करने वाले 210 माओवादियों में से 7 ऐसे लोग सामने आए हैं, जिन्होंने छत्तीसगढ़ ओपन स्कूल की एसएससी परीक्षा में शानदार प्रदर्शन किया है।

इन सात लोगों की सफलता की कहानी केवल एक परीक्षा पास करने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह इस बात का प्रमाण है कि यदि इरादे नेक हों, तो इंसान अपने अतीत के काले पन्नों को पीछे छोड़कर एक उज्ज्वल भविष्य लिख सकता है। इन 7 सफल छात्रों में से 3 ने तो फर्स्ट क्लास अंक हासिल करके यह साबित कर दिया है कि शिक्षा किसी भी तरह के अंधेरे को दूर करने की ताकत रखती है।

गीता नारोते: डॉ चंपा से नर्स बनने तक की प्रेरणादायक दास्तान

गीता नारोते की जीवन यात्रा बेहद मार्मिक और प्रेरित करने वाली है। महाराष्ट्र के गढ़चिरौली की रहने वाली गीता महज 10 साल की थी, जब माओवादियों ने उनके पिता की बेरहमी से हत्या कर दी थी। इस घटना के बाद वह अनजाने में ही माओवादी संगठन के संपर्क में आ गई और लंबे समय तक उसी का हिस्सा बनी रही। हालांकि, पिछले साल उसने हिंसा का रास्ता हमेशा के लिए त्याग दिया।

संगठन के दिनों में गीता को 'डॉ चंपा' के नाम से जाना जाता था, क्योंकि वह वहां अपने साथियों का इलाज करती थी और गोलियों से घायल हुए लोगों के घाव सिलती थी। अब 35 साल की उम्र में गीता ने हार नहीं मानी है। एसएससी परीक्षा पास करने के बाद अब उसका सपना एक नर्स बनकर अपने परिवार का सहारा बनने का है। गीता का जीवन उन लोगों के लिए एक सबक है जो विपरीत परिस्थितियों में अपनी उम्मीद खो देते हैं।

अर्जुन और संतोष का संघर्ष और कामयाबी

पूर्व माओवादियों में अर्जुन ओयाम और संतोष अचला के नाम भी शामिल हैं, जिन्होंने अपनी लगन से इतिहास रचा है। 32 वर्षीय अर्जुन जब बस्तर के घने जंगलों में थे, तो उनका जीवन बंदूक और डर के साये में बीतता था। लेकिन समाज में लौटने के बाद उन्होंने अपनी रुकी हुई जिंदगी को पटरी पर लाने की ठान ली। स्थानीय पुलिस और प्रशासन ने न केवल उनकी काउंसलिंग की, बल्कि उनके जरूरी दस्तावेज बनवाने और उन्हें पढ़ाई के लिए प्रोत्साहित करने में भी पूरी मदद की।

अर्जुन का दिन मछली पालन और इलेक्ट्रीशियन का काम सीखने में बीतता था, लेकिन वह अपनी रातों को पढ़ाई के नाम कर देते थे। संतोष अचला की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। पारिवारिक त्रासदियों और कठिन परिस्थितियों का सामना करने के बावजूद उन्होंने अपनी मेहनत और निरंतरता से इस परीक्षा में सफलता का परचम लहराया है।

डिजिटल तकनीक ने आसान बनाई पढ़ाई

जंगलों और सुदूर गांवों से ताल्लुक रखने वाले इन युवाओं के लिए पढ़ाई के माहौल में ढलना आसान नहीं था। बरसों से बंदूकों के आदी रहे हाथों के लिए पेन पकड़ना एक बड़ी चुनौती थी। हालांकि, आधुनिक तकनीक और मददगारों के सहयोग ने उनका यह सफर आसान बना दिया। इनमें से कई लोगों को पढ़ाई के लिए टैबलेट उपलब्ध कराए गए, जिस पर वे ऑनलाइन चैप्टर और पीडीएफ नोट्स पढ़कर तैयारी करते थे।

कई युवाओं ने साझा किया कि उनके दोस्तों ने व्हाट्सएप का उपयोग करके उनकी पढ़ाई में बड़ी मदद की। उन्हें पढ़ाई से जुड़े नोट्स भेजे जाते थे और कठिन विषयों व सवालों को समझाने के लिए फोन पर मार्गदर्शन दिया जाता था। स्थानीय शिक्षकों और पुलिसकर्मियों का सहयोग भी उनके लिए संजीवनी साबित हुआ, जिससे उनका आत्मविश्वास हर दिन बढ़ता गया।

सफलता का संदेश: बंदूक नहीं, कलम है असली ताकत

इन 7 पूर्व नक्सलियों की सफलता की कहानी समाज और शासन को एक बड़ा संदेश देती है। यदि राज्य तंत्र और समाज भटके हुए युवाओं को सही दिशा, अवसर और प्रोत्साहन दे, तो वे सकारात्मक बदलाव के बड़े वाहक बन सकते हैं। आज ये सात लोग उन तमाम युवाओं के लिए रोल मॉडल बन चुके हैं जो अभी भी हथियारों की अंधेरी दुनिया में फंसे हुए हैं।

इनकी कामयाबी यह स्पष्ट करती है कि बंदूकों से किसी भी समस्या का स्थायी समाधान संभव नहीं है। समाज में असली ताकत और मुक्ति का रास्ता केवल कलम और शिक्षा से होकर ही गुजरता है। इन लोगों ने जिस तरह से खुद को बदल लिया है, वह इस बात का जीता-जागता प्रमाण है कि इंसान चाह ले तो समाज की मुख्यधारा का हिस्सा बनकर सम्मान के साथ जी सकता है।

अंजलि सिंह पाबना की राज्य संवाददाता हैं, जो विभिन्न राज्यों की क्षेत्रीय खबरें और खानपान कवर करती हैं। स्थानीय घटनाओं, संस्कृति और जायके की कहानियों को वे करीब से रिपोर्ट करती हैं। अलग-अलग राज्यों की विविधता उनकी रिपोर्टिंग में नजर आती है।

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