जून ने किया निराश, बारिश को तरस रहे लोग: क्या जुलाई में मिलेगी गर्मी से राहत या बढ़ेगी मुसीबत? राष्ट्रीय राजनीति एक घंटा पहले 2
जून 2026 पिछले 125 वर्षों में पांचवां सबसे सूखा महीना साबित हुआ है, जिसमें सामान्य से करीब 40 प्रतिशत कम बारिश दर्ज की गई। अब आम जनता और मौसम वैज्ञानिकों की नजरें जुलाई पर टिकी हैं कि क्या यह महीना राहत लेकर आएगा या फिर गर्मी का दौर जारी रहेगा।

जून का सूखा: 125 वर्षों का नया रिकॉर्ड

इस साल का जून महीना देशभर के लोगों के लिए भीषण गर्मी और मायूसी लेकर आया है। मॉनसून के सीजन में भी बारिश की एक-एक बूंद के लिए लोग तरसते रहे हैं। आलम यह है कि जून 2026 ने मौसम विज्ञान के इतिहास में एक अनचाहा रिकॉर्ड कायम कर दिया है। पिछले 125 वर्षों के आंकड़ों पर नजर डालें, तो यह जून का महीना पांचवां सबसे सूखा महीना दर्ज किया गया है। मौसम के इस बदलते मिजाज ने न केवल सामान्य जनजीवन को प्रभावित किया है, बल्कि कृषि और जल स्रोतों को लेकर भी चिंता बढ़ा दी है।

जून में बारिश का गणित

भारतीय मौसम विभाग के आंकड़ों के अनुसार, जून 2026 में पूरे देश में केवल 99.5 मिमी बारिश दर्ज की गई है। यदि हम इसे सामान्य बारिश के आंकड़ों से तुलना करें, तो यह औसत से 39.8 प्रतिशत कम है। पूरे 30 दिनों तक देश के अधिकांश हिस्सों में सूखे जैसी स्थिति बनी रही और भीषण गर्मी का प्रकोप जारी रहा। आंकड़ों की मानें तो वर्ष 1901 के बाद से अब तक का यह पांचवां सबसे सूखा जून है।

मॉनसून की सुस्ती और देरी

आखिर मॉनसून इतना कमजोर क्यों रहा और समय पर बारिश क्यों नहीं हुई, इसके पीछे कई महत्वपूर्ण कारण बताए जा रहे हैं। भारतीय मौसम विभाग के विशेषज्ञों के मुताबिक, इस बार मॉनसून ने दक्षिण भारत के केरल में अपनी दस्तक 3 दिन की देरी से दी। इसके बाद भी मॉनसून की रफ्तार काफी धीमी रही और लगभग 2 हफ्ते तक यह एक ही जगह रुका रहा। हैरानी की बात यह है कि केरल में भी मॉनसून के आने के बाद भारी बारिश नहीं हुई, वहां भी बारिश का स्तर सामान्य से काफी नीचे रहा। मॉनसून की यह सुस्ती लगातार बनी हुई है, जिससे पूरे देश में इसका असर साफ देखा जा रहा है।

अल-नीनो का संकट

बारिश में इस भारी कमी के पीछे जलवायु संकट और मुख्य रूप से एल-नीनो को बड़ा जिम्मेदार माना जा रहा है। विशेषज्ञों का स्पष्ट मानना है कि एल-नीनो के प्रभाव के कारण ही मॉनसून का प्रवाह सुस्त पड़ा है। हालांकि, भारतीय मौसम विभाग के वैज्ञानिकों ने कुछ राहत भरी उम्मीद भी जताई है। वर्ष 1951 से 2025 तक के रिकॉर्ड का विश्लेषण करें, तो पता चलता है कि कमजोर जून के बाद करीब 58 प्रतिशत मामलों में मॉनसून ने बाद में रिकवरी की है। हालांकि, 31 प्रतिशत ऐसे मामले भी रहे हैं जहां पूरा सीजन ही कमजोर रहा और सूखे के हालात बने रहे।

दिल्ली का हाल और तापमान

राजधानी दिल्ली की स्थिति भी काफी चिंताजनक बनी हुई है। दिल्ली में जून के दौरान मात्र 32.92 मिमी बारिश ही हो पाई है। यह साल 2011 के बाद से दिल्ली का चौथा सबसे सूखा जून महीना रहा है। पूरे महीने में केवल 4 दिन ही बारिश देखने को मिली। वहीं, तापमान की बात करें तो औसत अधिकतम तापमान 39.1 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया है, जो पिछले 16 वर्षों का सातवां सबसे गर्म जून है। मॉनसून की बेरुखी के कारण जून के आखिरी दिनों तक लोगों को गर्मी से कोई राहत नहीं मिली है।

जुलाई को लेकर उम्मीदें और आशंकाएं

अब सबकी निगाहें जुलाई के महीने पर टिकी हैं। सवाल यह है कि क्या जुलाई का महीना जून की कमी को पूरा कर पाएगा या गर्मी का कहर और बढ़ेगा। जहां एक तरफ लोग बारिश का बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर सुपर एल-नीनो के प्रभाव को लेकर डर भी बना हुआ है। हालांकि, वैज्ञानिक जुलाई के लिए राहत का अनुमान जता रहे हैं, लेकिन असली तस्वीर आने वाले दिनों में ही साफ होगी कि क्या जुलाई बारिश की सौगात लेकर आता है या गर्मी की तपिश बरकरार रहेगी।

अंजलि सिंह पाबना की राज्य संवाददाता हैं, जो विभिन्न राज्यों की क्षेत्रीय खबरें और खानपान कवर करती हैं। स्थानीय घटनाओं, संस्कृति और जायके की कहानियों को वे करीब से रिपोर्ट करती हैं। अलग-अलग राज्यों की विविधता उनकी रिपोर्टिंग में नजर आती है।

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