दिल्ली
3 महीने पहले
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दिल्ली मेडिकल घोटाले का काला सच
राजधानी दिल्ली में मेडिकल प्रॉक्योरमेंट यानी चिकित्सा सामग्री खरीद में हुए एक बड़े घोटाले ने रेखा गुप्ता सरकार की परेशानियां बढ़ा दी हैं। इस मामले की जांच के दौरान एक ऐसे ठेकेदार का नाम सामने आया है, जिसने कथित तौर पर सरकार को 700 करोड़ रुपये का बड़ा नुकसान पहुंचाया है। दिल्ली स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण महानिदेशालय से जुड़े इस भ्रष्टाचार में इस ठेकेदार ने टेंडर प्रक्रिया को पूरी तरह से अपने जाल में फंसा रखा था। सरकारी धन के दुरुपयोग और धांधली के इस मामले में अब जांच एजेंसियां सक्रिय हो गई हैं।
ठेकेदार का टेंडर प्रक्रिया में दखल
रिपोर्टों के अनुसार, यह बिचौलिया न केवल दवाइयों की खरीद में बल्कि सर्जिकल सामान और मेडिकल उपकरणों के टेंडरों में भी पर्दे के पीछे से खेल करता था। इसने सुनियोजित तरीके से कई फर्जी कंपनियां यानी शेल कंपनियां खड़ी कीं और अपने प्रभाव का इस्तेमाल करते हुए उन्हें टेंडर दिलवाए। जांच में यह भी पता चला है कि इस व्यक्ति ने सप्लायर कंपनियों के साथ मिलकर सप्लाई रेट तय किए, मोटी दलाली का रास्ता बनाया और नकद रिश्वत के लेन-देन का भी प्रबंध किया। इस ठेकेदार का नाम एफआईआर में शामिल है और पुलिस इसे जल्द ही गिरफ्तार कर सकती है।
कोरोना काल से जुड़ा है विवाद
यह पूरा मामला मुख्य रूप से कोरोना महामारी के उस दौर से संबंधित है जब अस्पतालों में चिकित्सा संसाधनों की भारी मांग थी। इस खरीद प्रक्रिया में बड़े पैमाने पर अनियमिताओं की शिकायत विजिलेंस विभाग को मिली थी, जिसके आधार पर जांच शुरू हुई। मई महीने में जब विजिलेंस विभाग ने सीपीए कार्यालयों पर छापे मारे, तब यह घोटाला खुलकर सामने आया। हालांकि, इस भ्रष्टाचार की भनक एक व्हिसिलब्लोअर द्वारा साल 2023 में ही दे दी गई थी, लेकिन कड़ी मशक्कत के बाद 2 जून को इस मामले में औपचारिक एफआईआर दर्ज की गई।
टेंडर की शर्तों में हेरफेर
जांच में यह खुलासा हुआ है कि इस बिचौलिए की पहुंच सरकारी तंत्र में बहुत ऊपर तक थी। इसने टेंडर की शर्तों को अपने अनुकूल बदलवाने के लिए सीपीए के तत्कालीन हेड ऑफ ऑफिस डॉ. विनोद कुमार रंगा का सहारा लिया। आरोप है कि टेंडर कमेटी पर दबाव बनाकर उन शर्तों को मंजूर करवाया गया जो उसकी फर्जी कंपनियों को फायदा पहुंचाती थीं। इसने टर्नओवर, अनुभव और प्रदर्शन से जुड़े मानक इतने जटिल कर दिए कि वास्तविक और अनुभवी कंपनियां प्रतिस्पर्धा से बाहर हो गईं। वहीं, इसकी शेल कंपनियां आसानी से टेंडर जीतने में सफल रहीं। इसके बाद बोलियां चुपचाप खोली गईं और ऑनलाइन रिकॉर्ड में भी हेराफेरी की गई।
गिरफ्तारियों का दौर
इस गंभीर मामले में कानून का शिकंजा कसता जा रहा है। अब तक डीजीएचएस की पूर्व प्रमुख डॉ. वत्सला अग्रवाल को गिरफ्तार किया जा चुका है। इसके अलावा, पूर्व अतिरिक्त रजिस्ट्रार विवेक शुक्ला और डिप्टी कंट्रोलर ऑफ अकाउंट्स अनिल कुमार को भी हिरासत में लिया गया है। जांचकर्ताओं का मानना है कि डॉ. वत्सला अग्रवाल ने इस डील के लिए कथित तौर पर अंतिम मंजूरी प्रदान की थी।
जांच का दायरा और भविष्य की राह
एसीबी यानी भ्रष्टाचार निरोधक शाखा अब इस मामले की तह तक जाने के लिए टेंडर फाइलों, भुगतान के दस्तावेजों और कंपनियों के ढांचों की बारीकी से जांच कर रही है। एजेंसियों का अनुमान है कि इस घोटाले के जरिए सैकड़ों करोड़ रुपये के टेंडर गलत तरीके से आवंटित किए गए। अधिकारी अब यह पता लगाने की कोशिश कर रहे हैं कि अंततः यह सारा पैसा किसके पास गया और सरकारी खजाने को वास्तविक नुकसान कितना हुआ है। इस खुलासे के बाद दिल्ली के स्वास्थ्य विभाग में हलचल मची हुई है और आने वाले दिनों में और भी गिरफ्तारियां होने की संभावना बनी हुई है।
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