अमेरिका
4 दिन पहले
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विचारों
शीत युद्ध के दौरान अमेरिका और सोवियत संघ के बीच हथियारों की होड़ अपने चरम पर पहुंच चुकी थी। दोनों महाशक्तियां जमीन, आसमान और समुद्र में अपनी सैन्य बढ़त बनाने में जुटी थीं। इसी प्रतिस्पर्धा के बीच सोवियत संघ ने एक ऐसा युद्धपोत तैयार किया जिसने पूरी दुनिया का ध्यान खींच लिया। यह था किरोव-क्लास बैटलक्रूजर, जिसे आज भी दुनिया के सबसे भारी हथियारों से लैस सतही युद्धपोतों में गिना जाता है। अपने विशाल आकार और बेमिसाल मिसाइल क्षमता के चलते इसे अक्सर "मिसाइल मॉन्स्टर" कहा गया।
किरोव-क्लास का सबसे आधुनिक और दमदार जहाज प्योत्र वेलिकी था। परमाणु ऊर्जा से चलने वाले इस युद्धपोत को सोवियत नौसेना ने अमेरिकी विमानवाहक पोत समूहों के लिए गंभीर खतरे के रूप में विकसित किया था। इसका पूर्ण भार लगभग 28,000 टन तक पहुंचता है, जो कई देशों के विध्वंसक जहाजों के मुकाबले दोगुना है। करीब 252 मीटर लंबा और 28.5 मीटर चौड़ा यह जहाज 300 से अधिक मिसाइलों, ताकतवर रडार, वायु रक्षा प्रणालियों, टॉरपीडो और पनडुब्बी रोधी हथियारों से लैस था, जिसके कारण इसे शीत युद्ध के दौर का सबसे शक्तिशाली "मिसाइल मॉन्स्टर" माना जाता है।
300 से ज्यादा मिसाइलों का तैरता हुआ किला
किरोव-क्लास बैटलक्रूजर की सबसे बड़ी ताकत इसका विशाल हथियार भंडार था, जिसमें हवा, समुद्र और पनडुब्बियों से एक साथ मुकाबला करने की क्षमता मौजूद थी। जहाज पर 20 पी-700 ग्रेनिट एंटी-शिप मिसाइल लॉन्चर लगे थे, जिन्हें खास तौर पर दुश्मन के विमानवाहक पोतों और बड़े युद्धपोतों को तबाह करने के लिए तैयार किया गया था।
हवाई हमलों से निपटने के लिए जहाज पर 12 एस-300 फोर्ट-एम एयर डिफेंस लॉन्चर मौजूद थे, जिनमें कुल 96 मिसाइलें तैनात की जा सकती थीं। इसके अलावा 16 किंझाल एयर डिफेंस लॉन्चर भी लगे थे, जिनमें कुल 128 मिसाइलें रखी जा सकती थीं। यानी केवल वायु रक्षा के लिए ही इस जहाज पर 224 मिसाइलों का जखीरा रहता था।
करीबी दूरी से आने वाली मिसाइलों और विमानों को रोकने के लिए जहाज पर 6 कोर्तिक क्लोज-इन वेपन सिस्टम तैनात थे। मुख्य तोपखाने के रूप में इसमें 130 मिमी की AK-130 डुअल-पर्पज गन लगी थी, जो समुद्री और हवाई दोनों तरह के लक्ष्यों पर हमला कर सकती थी। पनडुब्बियों से मुकाबले के लिए जहाज पर 10 टॉरपीडो ट्यूब (533 मिमी) लगे थे। साथ ही दो RBU-1200 और एक RBU-1000 एंटी-सबमरीन रॉकेट लॉन्चर भी तैनात थे, जो पानी के नीचे छिपी दुश्मन पनडुब्बियों को निशाना बनाने में सक्षम थे।
इसी विशाल हथियार क्षमता के कारण किरोव-क्लास को अक्सर "समुद्र का मिसाइल मॉन्स्टर" और "फ्लोटिंग मिसाइल फोर्ट्रेस" कहा जाता है। अपने समय में शायद ही कोई दूसरा सतही युद्धपोत था जिसके पास इतनी बड़ी संख्या में मिसाइलें और बहुस्तरीय हथियार प्रणाली मौजूद हो।
हर दिशा से जवाब देने वाला बहुआयामी युद्धपोत
किरोव-क्लास सिर्फ मिसाइलों का भंडार नहीं, बल्कि एक बहुआयामी युद्धपोत था। इसमें पनडुब्बी रोधी रॉकेट, टॉरपीडो सिस्टम, स्वचालित नौसैनिक तोपें और क्लोज-इन वेपन सिस्टम भी मौजूद थे। यानी हमला चाहे हवा से हो, समुद्र की सतह से हो या फिर पानी के नीचे से, यह जहाज हर दिशा से आने वाले खतरे का जवाब देने में सक्षम था। युद्ध के दौरान इसकी भूमिका केवल हमला करना नहीं, बल्कि पूरे नौसैनिक बेड़े की रक्षा करना भी थी। यही वजह थी कि सोवियत नौसेना इसे अपने सबसे अहम युद्धपोतों में गिनती थी।
अमेरिका के लिए क्यों था बड़ा खतरा?
शीत युद्ध के दौर में अमेरिकी नौसेना की असली ताकत उसके विमानवाहक पोत समूह थे। सोवियत रणनीतिकारों का मानना था कि अगर किसी संघर्ष में अमेरिकी कैरियर समूहों को निष्क्रिय कर दिया जाए, तो अमेरिका की समुद्री शक्ति को बड़ा झटका लगेगा। इसी सोच के तहत किरोव-क्लास को विकसित किया गया।
20 ग्रेनिट मिसाइलों की एक साथ दागी गई सलामी किसी भी कैरियर बैटल ग्रुप के लिए गंभीर चुनौती मानी जाती थी। पश्चिमी देशों के रक्षा विशेषज्ञों ने इसे उस दौर के सबसे खतरनाक नौसैनिक प्लेटफॉर्मों में गिना था। इसकी महज मौजूदगी के चलते अमेरिकी नौसेना को अपनी रणनीतियों और रक्षा प्रणालियों को लगातार उन्नत करना पड़ा।
आज भी क्यों याद किया जाता है यह जहाज?
हालांकि आधुनिक युद्ध में अब ड्रोन, स्टेल्थ तकनीक, हाइपरसोनिक हथियार और नेटवर्क-सेंट्रिक युद्ध का महत्व बढ़ गया है, फिर भी किरोव-क्लास नौसैनिक इतिहास में आज भी एक खास स्थान रखता है। यह उन गिने-चुने युद्धपोतों में शामिल है जिन्हें सही मायनों में "फ्लोटिंग मिसाइल फोर्ट्रेस" यानी तैरता हुआ मिसाइल किला कहा जा सकता है।
शीत युद्ध खत्म हुए तीन दशक से अधिक का समय बीत चुका है, लेकिन जब भी दुनिया के सबसे शक्तिशाली युद्धपोतों की चर्चा होती है, किरोव-क्लास बैटलक्रूजर का नाम जरूर लिया जाता है। अपने विशाल मिसाइल भंडार, परमाणु शक्ति और बहुस्तरीय युद्ध क्षमता के कारण यह आज भी सैन्य इतिहास के सबसे प्रभावशाली युद्धपोतों में गिना जाता है।
आज सिर्फ एक ही किरोव-क्लास जहाज़ सक्रिय
सोवियत संघ ने शीत युद्ध के दौरान कुल चार किरोव-क्लास बैटलक्रूजर बनाए थे। हालांकि समय के साथ इनमें से अधिकांश जहाज सेवा से बाहर हो गए। फिलहाल केवल प्योत्र वेलिकी ही सक्रिय सेवा में बना हुआ है और इसे रूसी नौसेना की ताकत का अहम हिस्सा माना जाता है।
इसका सिस्टर शिप एडमिरल नखिमोव कई अरब डॉलर की व्यापक आधुनिकीकरण परियोजना से गुजर रहा है। जहाज में नई मिसाइल प्रणालियां, आधुनिक रडार और उन्नत इलेक्ट्रॉनिक युद्ध क्षमताएं जोड़ी गई हैं। रिपोर्टों के अनुसार, यह युद्धपोत अपने समुद्री परीक्षणों के अंतिम चरण में है और जल्द ही रूसी नौसेना में दोबारा शामिल हो सकता है।
वहीं इस श्रेणी के अन्य दो जहाज किरोव और एडमिरल लाजारेव को वर्षों पहले सेवा से हटा दिया गया था और बाद में दोनों को स्क्रैप के रूप में तोड़ दिया गया। यदि एडमिरल नखिमोव पूरी तरह सेवा में लौट आता है, तो रूस एक बार फिर दुनिया के सबसे भारी हथियारों से लैस दो परमाणु-संचालित बैटलक्रूजरों का संचालन करने वाले गिने-चुने देशों में शामिल हो जाएगा। इससे रूसी नौसेना की लंबी दूरी तक मार करने और समुद्री शक्ति प्रदर्शन की क्षमता में बड़ी बढ़ोतरी होगी।
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