क्या विपक्षी खेमे में अकेले रह जाएंगे राहुल गांधी, कॉफी पर कुरुक्षेत्र में दिखी सियासी बेचैनी भारत एक महीने पहले 73
हालिया राजनीतिक घटनाक्रमों और सुप्रिया सुले के बयान के बाद विपक्ष की एकजुटता पर बड़े सवाल खड़े हो रहे हैं। चर्चा है कि क्या कांग्रेस और राहुल गांधी आने वाले समय में राजनीतिक रूप से अलग-थलग पड़ सकते हैं?

सुप्रिया सुले के बयान से शुरू हुई अटकलें

इंडिया टीवी के कार्यक्रम कॉफी पर कुरुक्षेत्र में इन दिनों देश की बदलती राजनीति पर तीखी बहस देखने को मिल रही है। इस बार चर्चा का केंद्र बिंदु शरद पवार की पार्टी बनी हुई है। सुप्रिया सुले के हालिया बयान ने राजनीतिक गलियारों में खलबली मचा दी है। संकेत मिल रहे हैं कि अगर डीलिमिटेशन यानी परिसीमन विधेयक में सभी राज्यों की सीटों में 50 प्रतिशत तक की वृद्धि का प्रावधान शामिल किया जाता है, तो उनकी पार्टी इसे अपना समर्थन दे सकती है। इस रुख के सामने आने के बाद विपक्षी गठबंधन की मजबूती को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। ऐसा माना जा रहा है कि कई क्षेत्रीय दल अपने राज्य के भविष्य और विकास कार्यों को सुनिश्चित करने के लिए केंद्र सरकार के साथ तालमेल बैठाने की मजबूरी महसूस कर रहे हैं।

बढ़ती राजनीतिक मुलाकातों के सियासी मायने

कार्यक्रम के दौरान देश में हो रही अहम राजनीतिक बैठकों का विस्तार से विश्लेषण किया गया। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के बीच हुई मुलाकात को बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इसके साथ ही, महाराष्ट्र में देवेंद्र फडणवीस की एनसीपी के नेताओं के साथ हुई बातचीत और सुप्रिया सुले व योगी आदित्यनाथ की मुलाकात ने नई चर्चाओं को जन्म दिया है। जानकारों का कहना है कि इन तमाम गतिविधियों को आगामी संसद सत्र और भविष्य में बनने वाले नए राजनीतिक समीकरणों के चश्मे से देखा जाना चाहिए।

एनसीपी के भीतर सत्ता के साथ जाने की चर्चा

विश्लेषकों का यह मानना है कि महाराष्ट्र में एनसीपी के भीतर एक बड़ा खेमा ऐसा है जो मौजूदा सत्ता के साथ कदम मिलाकर चलने के पक्ष में है। उनका तर्क है कि सत्ता पक्ष के साथ रहने से न केवल प्रशासनिक सहयोग मिलना आसान होता है, बल्कि अपने क्षेत्र के विकास के लिए जरूरी बजट और राजनीतिक प्रभाव भी बरकरार रहता है। हालांकि, इस पूरे मामले पर अंतिम निर्णय क्या होगा, यह अभी भी भारतीय जनता पार्टी और शरद पवार के रणनीतिक रुख पर टिका हुआ है।

क्या विपक्ष में कांग्रेस होगी अकेली

चर्चा में इस बात पर जोर दिया गया कि यदि क्षेत्रीय दल महिला आरक्षण और परिसीमन जैसे बड़े मुद्दों पर सरकार का साथ देते हैं, तो कांग्रेस पार्टी और राहुल गांधी के लिए चुनौती बढ़ सकती है। समाजवादी पार्टी, झारखंड मुक्ति मोर्चा, आरजेडी और अन्य क्षेत्रीय दलों पर अपने राज्यों के हितों को सुरक्षित रखने का दबाव है। विशेष रूप से उत्तर प्रदेश में सीटों की संख्या बढ़ने की संभावना को देखते हुए किसी भी बड़े बिल का विरोध करना राजनीतिक रूप से जोखिम भरा हो सकता है।

बड़े बदलावों की आहट

कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह के उन पुराने बयानों को भी याद किया गया, जिनमें महिला आरक्षण से जुड़ी सभी बाधाओं को हटाने का वादा किया गया था। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि संसद में पर्याप्त संख्याबल जुट गया, तो सरकार महिला आरक्षण, डीलिमिटेशन और वन नेशन वन इलेक्शन जैसे बड़े एजेंडे पर तेजी से काम शुरू कर सकती है। अंत में यही निष्कर्ष निकला कि आने वाला संसद सत्र भारतीय राजनीति की नई दिशा तय करेगा। यदि सहयोगी दल अलग रुख अपनाते हैं, तो कांग्रेस को अकेले संघर्ष करना पड़ सकता है।

देवेंद्र पांडेय पाबना के राजनीतिक संवाददाता हैं और राष्ट्रीय राजनीति, सरकार तथा नीतियों पर रिपोर्टिंग करते हैं। चुनाव, संसद और बड़े सियासी घटनाक्रमों का वे गहराई से विश्लेषण करते हैं। उनकी रिपोर्टिंग निष्पक्ष और तथ्यों पर आधारित होती है।

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