गर्व से कहो हम हिंदू हैं: बदलती राजनीति और विपक्ष का बदलता मिजाज भारत 2 महीने पहले 77
देश की बदलती राजनीतिक फिजा में हिंदुत्व और सनातन का मुद्दा केंद्र में आ गया है। कॉफी पर कुरुक्षेत्र कार्यक्रम में इस बात पर मंथन किया गया कि क्यों अब विपक्षी दल भी अपनी छवि बदलने के लिए धार्मिक प्रतीकों का सहारा ले रहे हैं।

हिंदुत्व की सियासत पर नए सिरे से मंथन

मौजूदा राजनीतिक दौर में 'गर्व से कहो हम हिंदू हैं' का नारा केवल एक भावना नहीं, बल्कि चुनावी रणनीति का मुख्य केंद्र बन चुका है। कॉफी पर कुरुक्षेत्र कार्यक्रम में इस विषय पर विस्तार से चर्चा की गई। चर्चा की शुरुआत आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल के उस दावे से हुई, जिसमें उन्होंने अपनी पार्टी को देश की असली सनातनी पार्टी करार दिया था। विशेषज्ञों का मानना है कि यह बयान महज एक राजनीतिक प्रतिक्रिया नहीं है, बल्कि यह देश के बदलते राजनीतिक मिजाज का स्पष्ट संकेत है। आज के समय में राजनीतिक दलों ने यह भांप लिया है कि हिंदू समाज की चेतना पहले के मुकाबले कहीं ज्यादा जागृत और सशक्त हो चुकी है। एक दौर था जब हिंदू आस्था या सनातन की बात करने वालों को सांप्रदायिक करार दे दिया जाता था, लेकिन अब तस्वीर पूरी तरह बदल गई है। विपक्षी दल भी अब मंदिर और धार्मिक प्रतीकों के जरिए खुद को सनातनी साबित करने की होड़ में हैं।

बीजेपी की अडिग विचारधारा और विपक्षी चुनौती

कार्यक्रम के दौरान इस बात पर जोर दिया गया कि भारतीय जनता पार्टी ने दशकों से अपनी हिंदुत्व की राजनीति को बिना किसी झिझक के आगे बढ़ाया है। पार्टी अपने मूल वैचारिक एजेंडे से कभी पीछे नहीं हटी और कई चुनावी हार के बावजूद अपनी राह पर डटी रही। राम मंदिर आंदोलन से शुरू हुआ यह सफर आज इस मुकाम पर है कि आम जनता की पहली पसंद बीजेपी बनी हुई है। वहीं दूसरी तरफ, विपक्ष के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह है कि हिंदू वोट बैंक के एक बड़े हिस्से में अब उनके लिए पहले जैसी जगह नहीं बची है। विपक्ष को अब अपनी खोई हुई जमीन वापस पाने के लिए नई रणनीति की तलाश है, जिसके तहत वे धार्मिक आयोजनों में बढ़-चढ़कर भाग ले रहे हैं।

साल 2014 के बाद बदली सियासी हवा

चर्चा के दौरान पंजाब की राजनीति का विशेष उल्लेख किया गया, जहां अरविंद केजरीवाल द्वारा मंदिरों में जाना और भजन संध्याओं का आयोजन करना एक बड़ी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। हालांकि विशेषज्ञों ने स्पष्ट किया कि पंजाब की सामाजिक और धार्मिक बुनावट बाकी देश से काफी अलग है, इसलिए वहां की जनता पर इसका वैसा प्रभाव पड़ना आसान नहीं है। मंच पर वक्ताओं ने 2014 के बाद से देश में आए बड़े राजनीतिक बदलावों का विश्लेषण किया। पहले की राजनीति जहां पूरी तरह से जातिगत समीकरणों और सामुदायिक आधार पर टिकी थी, अब वहां हिंदुत्व का प्रभाव हावी हो गया है। आज सोशल मीडिया के युग में नेताओं के लिए अपने पुराने बयानों को छिपाना नामुमकिन है, इसलिए मतदाता अब किसी भी नेता की नीतियों और उनकी नीयत की गहराई से जांच-परख करते हैं।

कल्याणकारी योजनाओं का असर

बातचीत में सरकारी योजनाओं और सामाजिक न्याय के महत्व को भी रेखांकित किया गया। वक्ताओं ने माना कि गरीबों को मिलने वाला मुफ्त राशन, पक्के घर, शौचालय जैसी सुविधाओं ने पारंपरिक जातिगत राजनीति के प्रभाव को काफी कमजोर किया है। जनता को अब यह साफ नजर आ रहा है कि सरकारी योजनाओं का लाभ उन तक सीधे पहुंच रहा है, जिससे उनका जीवन स्तर बदल रहा है। निष्कर्ष यही निकला कि भारत की राजनीति अब एक नए दौर में है, जहां हिंदुत्व, सनातन, विकास और लोक कल्याण ही विमर्श के प्रमुख स्तंभ हैं। हर दल इस नई परिस्थिति में खुद को ढालने की कोशिश में है, लेकिन अब मतदाता केवल खोखले बयानों के आधार पर नहीं, बल्कि नेताओं की विश्वसनीयता और उनके पिछले कामकाज के रिकॉर्ड को देखकर ही अपना फैसला ले रहे हैं।

देवेंद्र पांडेय पाबना के राजनीतिक संवाददाता हैं और राष्ट्रीय राजनीति, सरकार तथा नीतियों पर रिपोर्टिंग करते हैं। चुनाव, संसद और बड़े सियासी घटनाक्रमों का वे गहराई से विश्लेषण करते हैं। उनकी रिपोर्टिंग निष्पक्ष और तथ्यों पर आधारित होती है।

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