सात साल के लंबे अंतराल के बाद भारत आ रहे शी जिनपिंग, साथ में होंगे उनके सबसे भरोसेमंद रणनीतिकार काई ची विश्व एक घंटा पहले 4
चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग 12 और 13 सितंबर को नई दिल्ली में आयोजित होने वाले 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में भाग लेने के लिए भारत की यात्रा करेंगे, जिसमें उनके साथ उनके बेहद करीबी और प्रभावशाली नेता काई ची भी मौजूद रहेंगे।

दिल्ली में ब्रिक्स सम्मेलन और शी जिनपिंग की अहम यात्रा

चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग करीब सात साल बाद भारत की धरती पर कदम रखने जा रहे हैं। उनका यह दौरा आगामी 12 और 13 सितंबर को नई दिल्ली में आयोजित होने वाले 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के मद्देनजर हो रहा है। अंतरराष्ट्रीय राजनीति में इस यात्रा को बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि केवल शी जिनपिंग ही नहीं, बल्कि उनके साथ चीन के सत्ता प्रतिष्ठान के सबसे शक्तिशाली चेहरों में से एक, काई ची और विदेश मंत्री वांग यी भी भारत पहुंचेंगे। यह दौरा ऐसे समय में हो रहा है जब भारत और चीन के बीच कूटनीतिक संबंधों को सुधारने और सीमा पर लंबे समय से चले आ रहे तनाव को कम करने के लिए गंभीर प्रयास किए जा रहे हैं।

कौन हैं काई ची और क्यों है उनकी मौजूदगी चर्चा में

चीनी राष्ट्रपति के साथ आने वाले प्रतिनिधिमंडल में काई ची का नाम सबसे ज्यादा सुर्खियां बटोर रहा है। सत्तर वर्षीय काई ची चीन की कम्युनिस्ट पार्टी की अत्यंत शक्तिशाली सात सदस्यीय पोलित ब्यूरो स्थायी समिति में पांचवें पायदान पर आते हैं। उनकी प्रशासनिक क्षमता और जिनपिंग के प्रति निष्ठा के कारण उन्हें डी फैक्टो चीफ ऑफ स्टाफ की संज्ञा दी गई है। उनके पास पार्टी सचिवालय के पहले रैंकिंग सदस्य और कम्युनिस्ट पार्टी की केंद्रीय समिति के जनरल ऑफिस के निदेशक जैसे महत्वपूर्ण उत्तरदायित्व हैं। जनरल ऑफिस का मुख्य कार्य चीन के शीर्ष नेतृत्व के प्रशासनिक और समन्वय संबंधी सभी कार्यों को संभालना है, जो काई ची के कद को स्पष्ट करता है। जून 2026 में उन्हें सीपीसी सेंट्रल पार्टी स्कूल और नेशनल एकेडमी ऑफ गवर्नेंस का प्रमुख नियुक्त किए जाने के बाद से पार्टी के भीतर उनका प्रभाव और अधिक बढ़ गया है।

जिनपिंग के दाएं हाथ के रूप में काई ची की भूमिका

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि काई ची केवल पदों के कारण प्रभावशाली नहीं हैं, बल्कि उनका जिनपिंग के साथ गहरा वैचारिक और राजनीतिक जुड़ाव है। दोनों नेताओं के बीच की यह निकटता फुजियान और झेजियांग के उन शुरुआती राजनीतिक दिनों से जुड़ी है जब वे साथ मिलकर काम करते थे। आज की तारीख में भी, जब शी जिनपिंग किसी भी अंतरराष्ट्रीय दौरे या उच्च स्तरीय कूटनीतिक कार्यक्रमों में भाग लेते हैं, काई ची उनके साथ साये की तरह मौजूद रहते हैं। ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के दौरान भारतीय पक्ष के साथ होने वाली अनौपचारिक या औपचारिक चर्चाओं में उनकी उपस्थिति यह संकेत देती है कि चीन अपने सबसे भरोसेमंद रणनीतिकार के माध्यम से कूटनीतिक रुख स्पष्ट करना चाहता है।

प्रतिनिधिमंडल का स्वरूप और कूटनीतिक चुनौतियां

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ कुल 67 सदस्यों वाला एक उच्च-स्तरीय चीनी प्रतिनिधिमंडल दिल्ली आएगा। इसमें विदेश मंत्री वांग यी भी शामिल होंगे, जो वैश्विक स्तर पर चीन की विदेश नीति का चेहरा हैं। ब्रिक्स के मंच पर भारत और चीन के नेताओं के बीच होने वाली संभावित बैठकों पर पूरी दुनिया की नजर रहेगी। वर्ष 2020 में उत्पन्न हुए सीमा विवाद के बाद से दोनों एशियाई दिग्गजों के बीच संबंधों में एक बड़ी गिरावट आई थी, हालांकि पिछले कुछ समय से कूटनीतिक स्तर पर बातचीत और संपर्कों में तेजी देखी गई है। व्यापार, निवेश, सीमा निर्धारण और क्षेत्रीय सुरक्षा जैसे कई ऐसे मुद्दे हैं जिन पर अब भी दोनों देशों के बीच काफी मतभेद हैं। ऐसे में शी जिनपिंग की यह भारत यात्रा इन कूटनीतिक उलझनों को सुलझाने और द्विपक्षीय संबंधों में जमी हुई बर्फ पिघलाने की दिशा में एक अहम कदम साबित हो सकती है। चीन के राष्ट्रपति का यह दौरा निश्चित रूप से ब्रिक्स देशों के बीच आपसी तालमेल और भविष्य की रणनीतियों पर नई बहस को जन्म देगा।

साहिल चौहान पाबना के वर्ल्ड अफेयर्स रिपोर्टर हैं, जो अंतरराष्ट्रीय खबरें और वैश्विक मामले कवर करते हैं। विदेश नीति, कूटनीति और दुनिया भर के घटनाक्रमों पर उनकी अच्छी पकड़ है। वे जटिल वैश्विक मुद्दों को भारतीय नजरिए से समझाते हैं।

आपकी प्रतिक्रिया?

Comments

https://pabna.in/assets/images/user-avatar-s.jpg

0 comment

Write the first comment for this!

फेसबुक वार्तालाप