चीन के जहाज पर ताइवान का जोरदार हमला, बीजिंग की चुनौती को समुद्र में ही किया ध्वस्त विश्व एक घंटा पहले 4
ताइवान जलडमरूमध्य में ताइवान ने अपनी सीमा में घुसी चीनी नौका पर वाटर कैनन से हमला कर उसे पीछे हटने पर मजबूर कर दिया, जिससे क्षेत्र में तनाव बढ़ गया है और अमेरिकी कूटनीति पर सवाल उठे हैं।

ताइवान जलडमरूमध्य में तनाव की स्थिति

ताइवान जलडमरूमध्य का समुद्री क्षेत्र एक बार फिर से अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के केंद्र में आ गया है। इस बार तनाव का कारण ताइवान की जल सीमा में अवैध रूप से प्रवेश करने वाली एक चीनी नौका है, जिसे ताइवानी कोस्ट गार्ड ने कड़ा सबक सिखाया है। ताइवान ने बिना किसी देरी के अपनी संप्रभुता की रक्षा करते हुए चीनी जहाज पर वाटर कैनन से जोरदार हमला किया, जिसके बाद चीनी घुसपैठियों को जान बचाकर भागना पड़ा। यह घटना ताइवान की ग्रे-जोन टैक्टिक्स के खिलाफ एक सख्त और स्पष्ट संदेश के रूप में देखी जा रही है। इस घटना ने केवल क्षेत्रीय समीकरणों को ही नहीं बदला, बल्कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की उस कूटनीतिक रणनीति को भी कठघरे में खड़ा कर दिया है, जिसे लेकर वे लंबे समय से आश्वस्त दिखाई दे रहे थे।

समुद्र में ताइवान का कड़ा प्रहार

ताइवान ने अपने समुद्री क्षेत्र की सुरक्षा के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को साबित करते हुए चीन को स्पष्ट संकेत दिया है। ताइवान के जलक्षेत्र में एक चीनी मछली पकड़ने वाली नौका ने घुसपैठ की कोशिश की। कोस्ट गार्ड ने लाउडस्पीकर के माध्यम से बार-बार चेतावनी जारी की और जहाज को तुरंत वापस लौटने का आदेश दिया। हालांकि, चीनी चालक दल ने ताइवानी चेतावनियों को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया और आगे बढ़ना जारी रखा। इसके जवाब में ताइवानी कोस्ट गार्ड ने बिना समय गंवाए तेज दबाव वाली वाटर कैनन का इस्तेमाल किया। पानी की इस प्रचंड बौछार के सामने चीनी नाव टिक नहीं सकी। नाव का ढांचा और खिड़कियां इस हमले की चपेट में आ गईं, जिससे अफरा-तफरी मच गई और चालक दल को अपनी जान बचाकर ताइवानी सीमा से बाहर भागने पर मजबूर होना पड़ा।

ग्रे-जोन टैक्टिक्स और ताइवान की जवाबी कार्रवाई

चीन लंबे समय से ताइवान के खिलाफ ग्रे-जोन टैक्टिक्स का उपयोग कर रहा है। इसके तहत चीन घोषित युद्ध छेड़े बिना ही अपनी नागरिक, व्यापारिक और मछली पकड़ने वाली नौकाओं को ताइवान की समुद्री सीमाओं में भेजता रहता है। बीजिंग का उद्देश्य ताइवान की सैन्य तत्परता और जवाबी कार्रवाई करने की क्षमता को परखना है। चीन को यह भ्रम था कि ताइवान सीधा हमला करने से डरेगा और चुप्पी साधे रहेगा। लेकिन इस बार ताइवान ने चीन की मंशा को भांपते हुए न केवल प्रतिक्रिया दी, बल्कि कड़ा प्रहार भी किया। इस कार्रवाई से चीन का यह आकलन गलत साबित हो गया कि ताइवान दबाव में झुक जाएगा और ताइवान अपनी क्षेत्रीय संप्रभुता को लेकर अत्यंत गंभीर है।

अमेरिकी कूटनीति और डोनाल्ड ट्रंप का गणित

इस पूरे घटनाक्रम के बीच सबसे महत्वपूर्ण संदेश वॉशिंगटन के लिए है। अमेरिका और ताइवान के बीच 14 अरब डॉलर की हथियार डील का मामला लंबे समय से अधर में लटका हुआ है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस मेगा डिफेंस पैकेज को यह सोचकर होल्ड पर रखा था कि वे इसका उपयोग चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ मोलभाव करने के लिए करेंगे। ट्रंप का मानना था कि हथियार रोककर वे चीन के साथ संबंध मधुर रखेंगे और ताइवान को अपने नियंत्रण में रखेंगे। ट्रंप का यह आत्मविश्वास कि ताइवान और चीन के बीच कोई बड़ा संघर्ष नहीं होगा, अब खतरे में दिखाई दे रहा है। ताजा समुद्री झड़प ने साबित कर दिया है कि ताइवान अपनी सुरक्षा के लिए अमेरिका की हरी झंडी या हथियारों की सप्लाई का अनिश्चित काल तक इंतजार नहीं कर सकता है।

चीन के आक्रमण के जोखिम का आकलन

जैसे-जैसे वाशिंगटन और बीजिंग के बीच बैकडोर कूटनीति तेज हुई, ऐसा प्रतीत होने लगा कि अमेरिका ने ताइवान पर हमले के जोखिम को कम आंकना शुरू कर दिया है। पहले शी जिनपिंग ने पीपुल्स लिबरेशन आर्मी को 2027 तक ताइवान पर कब्जा करने के लिए तैयार रहने का फरमान जारी किया था। हालांकि, अब अमेरिकी खुफिया एजेंसियों का मानना है कि चीन 2028 से पहले कोई बड़ा सैन्य हमला नहीं करेगा। इस बदले हुए दृष्टिकोण के पीछे दो मुख्य कारक बताए जा रहे हैं:

  • शी जिनपिंग द्वारा सेना में बदलाव: शी जिनपिंग ने हाल ही में चीनी सेना और कम्युनिस्ट पार्टी के शीर्ष कमांडरों को उनके पदों से बर्खास्त किया है। इस आंतरिक अस्थिरता के कारण चीनी सेना फिलहाल किसी बड़े युद्ध के लिए तैयार नहीं है।
  • 2028 के ताइवान चुनाव: बीजिंग इस उम्मीद में है कि 2028 में होने वाले चुनावों में कोई चीन समर्थक पार्टी सत्ता में आए, जिससे बिना किसी सैन्य टकराव के विलय की राह आसान हो सके।

2028 का चुनाव और ताइवान की आंतरिक राजनीति

ताइवान की घरेलू राजनीति दो विपरीत ध्रुवों में बंटी हुई है। कुओमिंतांग (KMT) पार्टी चीन के साथ बातचीत और बेहतर व्यापारिक संबंधों की वकालत करती है, और उनके प्रमुख नेताओं ने बीजिंग का दौरा भी किया है। दूसरी ओर, सत्तारूढ़ डेमोक्रेटिक प्रोग्रेसिव पार्टी (DPP) ताइवान की आजादी और संप्रभुता से कोई समझौता नहीं करना चाहती। हालिया वाटर कैनन हमले को इसी DPP सरकार की सख्त नीति का परिणाम माना जा रहा है। यदि 2028 में DPP फिर से सत्ता में आती है, तो चीन के पास कूटनीतिक रास्ते बंद हो जाएंगे। ऐसी स्थिति में चीन द्वारा ताइवान पर सीधे सैन्य हमले का खतरा काफी हद तक बढ़ जाएगा। ताइवान का यह हालिया आक्रामक रुख दर्शाता है कि भविष्य के युद्ध का स्वरूप केवल बड़ी सेनाओं तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि समुद्र में होने वाली छोटी झड़पें भी बड़े कूटनीतिक बदलावों का आधार बन सकती हैं।

साहिल चौहान पाबना के वर्ल्ड अफेयर्स रिपोर्टर हैं, जो अंतरराष्ट्रीय खबरें और वैश्विक मामले कवर करते हैं। विदेश नीति, कूटनीति और दुनिया भर के घटनाक्रमों पर उनकी अच्छी पकड़ है। वे जटिल वैश्विक मुद्दों को भारतीय नजरिए से समझाते हैं।

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