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चीन की 'कैरियर किलर' मिसाइल का वायरल फुटेज
दुनिया के समंदरों में तैनात अमेरिकी नौसेना के विशाल विमानवाहक जहाजों पर एक नए खतरे के बादल मंडरा रहे हैं। चीन की DF-26B बैलिस्टिक मिसाइल का एक फुटेज 1 नवंबर 2026 को सोशल मीडिया और वैश्विक सैन्य हलकों में फिर से चर्चा का विषय बन गया है। हालांकि यह वीडियो नया नहीं है और इसे चीन के सरकारी चैनल CCTV द्वारा पहली बार दिसंबर 2024 में जारी किया गया था, लेकिन इसकी भयावहता आज भी सुरक्षा विशेषज्ञों को सोचने पर मजबूर कर रही है। वीडियो में एक रेगिस्तानी इलाके में बने विमानवाहक पोत के डमी ढांचे पर मिसाइल को सटीक हमला करते हुए दिखाया गया है, जिसके बाद से इसे 'कैरियर किलर' का नाम दिया गया है।
क्या है DF-26B मिसाइल की ताकत
DF-26B मिसाइल चीन के DF-26 मिसाइल परिवार का एक उन्नत संस्करण है। इसे मुख्य रूप से जमीन से लॉन्च होने वाली बैलिस्टिक मिसाइल के रूप में विकसित किया गया है, जिसकी सबसे बड़ी खासियत इसकी मोबाइल लॉन्चर प्रणाली है। इसका मतलब यह है कि इसे किसी एक स्थायी ठिकाने से लॉन्च करने की आवश्यकता नहीं होती, बल्कि इसे सड़क मार्ग से कहीं भी ले जाकर तैनात किया जा सकता है। यह तकनीक दुश्मन के लिए मिसाइल को लॉन्च से पहले ट्रैक करना और उसे नष्ट करना बेहद चुनौतीपूर्ण बना देती है।
इस मिसाइल परिवार की मारक क्षमता के बारे में रक्षा जानकारों का मानना है कि यह 4,000 किलोमीटर तक के दायरे में लक्ष्यों को भेदने में सक्षम है। यह दूरी पश्चिमी प्रशांत क्षेत्र में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों, जैसे कि गुआम, के लिए सीधी चुनौती पेश करती है। सबसे गंभीर बात यह है कि इसे पारंपरिक और परमाणु, दोनों तरह के वॉरहेड ले जाने की क्षमता के साथ डिजाइन किया गया है, जिससे युद्ध की स्थिति में यह और भी घातक हो जाती है।
रूसी सीनेटर का बड़ा दावा
इस वीडियो पर प्रतिक्रिया देते हुए रूसी सीनेटर एलेक्सी पेशकोव ने एक तीखा बयान दिया है। उन्होंने दावा किया कि चीन द्वारा तैयार की गई यह मिसाइल अमेरिकी विमानवाहक पोतों को उसी तरह तोड़ सकती है, जैसे हथौड़े की चोट से एक कच्चा अंडा बिखर जाता है। उनका तर्क है कि समुद्री युद्ध की स्थिति में यह हथियार अमेरिका की दशकों पुरानी नौसैनिक श्रेष्ठता को खत्म कर सकता है। हालांकि, सैन्य विशेषज्ञ इसे सावधानी से देखते हैं। एक रेगिस्तानी मॉडल पर परीक्षण और खुले समुद्र में चल रहे 1 लाख टन वजनी जहाज को निशाना बनाने के बीच जमीन-आसमान का अंतर है।
समुद्र में चलते जहाज को निशाना बनाना क्यों है कठिन
खुले समुद्र में लगातार अपनी दिशा और गति बदल रहे विशाल विमानवाहक पोत को निशाना बनाना एक बहुत जटिल प्रक्रिया है। इसके लिए केवल मिसाइल की रफ्तार ही पर्याप्त नहीं है। इस प्रक्रिया में शामिल मुख्य चुनौतियां इस प्रकार हैं:
- सटीक लोकेशन: मिसाइल दागने से पहले दुश्मन के कैरियर स्ट्राइक ग्रुप की सटीक स्थिति का पता लगाना अनिवार्य है, जिसके लिए सैटेलाइट, रडार और निगरानी विमानों के एक विशाल नेटवर्क की आवश्यकता होती है।
- गतिशील लक्ष्य: विमानवाहक पोत स्थिर नहीं होते। मिसाइल को उड़ान के दौरान लगातार अपनी दिशा बदलनी पड़ती है ताकि वह जहाज की नई लोकेशन को भेद सके।
- टर्मिनल गाइडेंस: इस चरण के लिए MaRV तकनीक की जरूरत होती है, जो मिसाइल को आखिरी समय में अपना लक्ष्य पहचानने और दिशा बदलने की क्षमता देती है।
अमेरिकी पोतों की सुरक्षा और 'मिशन किल' का सिद्धांत
USS Gerald R. Ford और USS George Washington जैसे विमानवाहक पोत केवल जहाज नहीं, बल्कि समुद्र में तैरते हुए सैन्य ठिकाने हैं। इन्हें एक बार में पूरी तरह डुबोना आसान नहीं है, क्योंकि इनका ढांचा कई सुरक्षा परतों और डैमेज कंट्रोल सिस्टम से लैस होता है। हालांकि, अगर मिसाइल जहाज के फ्लाइट डेक या मुख्य प्रणालियों को नुकसान पहुंचाती है, तो इसे 'मिशन किल' माना जाएगा। इसका अर्थ यह है कि जहाज भले ही डूबे नहीं, लेकिन उसकी युद्ध लड़ने की क्षमता पूरी तरह समाप्त हो जाएगी।
अमेरिकी नौसेना के पास अपने बचाव के लिए एक अभेद्य सुरक्षा घेरा मौजूद है। उनके कैरियर स्ट्राइक ग्रुप में विध्वंसक जहाज, क्रूजर, पनडुब्बियां और उन्नत रडार सिस्टम शामिल होते हैं। SM-3 और SM-6 जैसे इंटरसेप्टर मिसाइलें दुश्मन के हमलों को हवा में ही नाकाम करने का प्रयास करती हैं। इसके बावजूद, DF-26B जैसी मिसाइलों की तेज रफ्तार और दिशा बदलने की क्षमता अमेरिकी डिफेंस सिस्टम के लिए भी सिरदर्द बनी हुई है।
चीन की रणनीतिक चाल
चीन की इस मिसाइल का असली मकसद केवल जहाज नष्ट करना नहीं, बल्कि अमेरिकी नौसेना को चीन के समुद्री इलाकों से दूर रखना है। यदि अमेरिकी पोतों को हर समय लंबी दूरी की मिसाइलों का डर बना रहेगा, तो उन्हें अपनी तैनाती की योजनाएं बदलनी पड़ेंगी। इससे प्रशांत महासागर में अमेरिका का सैन्य प्रभाव कम हो सकता है और चीन को अपनी समुद्री सीमाओं के पास बेहतर रणनीतिक बढ़त मिल सकती है। अंततः, यह हथियार चीन के लिए केवल एक गोला-बारूद नहीं, बल्कि अमेरिका की वैश्विक नौसैनिक शक्ति को चुनौती देने वाली एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है।
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