चीन ने तैयार किया 582 टन का ‘नकली सूर्य’, असली से 10 गुना ज्यादा ताकतवर; दुनिया के ऊर्जा बाजार में मची हलचल विश्व एक घंटा पहले 5
चीन ने ऊर्जा के क्षेत्र में एक बड़ी कामयाबी हासिल करते हुए 582 टन वजनी सुपरकंडक्टिंग फ्यूजन मैग्नेट का सफल परीक्षण किया है। यह 'आर्टिफिशियल सन' प्रोजेक्ट का प्रमुख हिस्सा है, जो भविष्य में दुनिया को असीमित और स्वच्छ बिजली प्रदान करने का आधार बन सकता है।

चीन के ऊर्जा नवाचार ने बढ़ाई वैश्विक चिंता

ऊर्जा के क्षेत्र में चीन ने हाल ही में एक ऐसी उपलब्धि हासिल की है जिसने अमेरिका, सऊदी अरब और ईरान जैसे बड़े देशों की नींद उड़ा दी है। चीनी वैज्ञानिकों ने दुनिया का सबसे शक्तिशाली और विशाल 582 टन वजनी सुपरकंडक्टिंग फ्यूजन मैग्नेट तैयार किया है। यह अविष्कार चीन के उस महत्वाकांक्षी 'आर्टिफिशियल सन' यानी कृत्रिम सूर्य प्रोजेक्ट का सबसे महत्वपूर्ण घटक है। यह मशीन 10 करोड़ डिग्री सेल्सियस से भी अधिक का तापमान उत्पन्न करने में सक्षम है, जो कि हमारे असली सूर्य के केंद्र (कोर) के तापमान से भी कहीं अधिक है।

कृत्रिम सूर्य का निर्माण और उद्देश्य

बीजिंग में स्थित चीनी एकेडमी ऑफ साइंसेज के तहत आने वाले इंस्टिट्यूट ऑफ प्लाज्मा फिजिक्स के शोधकर्ताओं ने वर्षों की कड़ी मेहनत के बाद इसे हकीकत में बदला है। चीन का यह कदम ऊर्जा की बढ़ती मांग को पूरा करने और कार्बन उत्सर्जन को कम करने की दिशा में एक बड़ा दांव है। इस मशीन का मुख्य लक्ष्य साल 2030 तक परमाणु संलयन तकनीक का उपयोग करके व्यावसायिक स्तर पर बिजली उत्पादन शुरू करना है। यदि यह परियोजना अपने अंतिम चरणों में सफल रहती है, तो दुनिया को प्रदूषण मुक्त और लगभग मुफ्त ऊर्जा का एक अनंत स्रोत प्राप्त हो सकता है।

विशालकाय चुंबक की संरचना और तकनीक

इस 582 टन के विशालकाय चुंबक को तैयार करना अपने आप में एक इंजीनियरिंग चमत्कार है। इस परियोजना की कुछ प्रमुख विशेषताएं इस प्रकार हैं:

  • अनोखा आकार: यह चुंबक अंग्रेजी के 'D' अक्षर के आकार में निर्मित है, जिसकी लंबाई 21 मीटर और चौड़ाई 12 मीटर है।
  • अतुलनीय वजन: इसका वजन 582 टन है, जो कई भारी-भरकम ट्रकों के कुल वजन के बराबर है।
  • अंतरराष्ट्रीय मानकों से आगे: यह चुंबक इंटरनेशनल न्यूक्लियर फ्यूजन प्रोजेक्ट यानी ITER में इस्तेमाल होने वाले चुंबकों की तुलना में आकार में 1.3 गुना बड़ा है और ऊर्जा संचय करने की क्षमता में 3 गुना अधिक शक्तिशाली है।

प्लाज्मा को नियंत्रित करने की चुनौती

न्यूक्लियर फ्यूजन यानी परमाणु संलयन की प्रक्रिया के दौरान उत्पन्न गैस एक अत्यधिक गर्म प्लाज्मा का रूप ले लेती है। इसका तापमान 10 करोड़ डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है, जिसे सहन करने वाली कोई धातु या कंक्रीट वर्तमान में पृथ्वी पर उपलब्ध नहीं है। यदि यह गर्म प्लाज्मा रिएक्टर की आंतरिक दीवारों के संपर्क में आता है, तो यह लोहे और स्टील की मोटी दीवारों को पल भर में भाप बना सकता है। इसी विनाशकारी स्थिति को रोकने के लिए इस विशाल चुंबक का निर्माण किया गया है। यह रिएक्टर के भीतर एक तीव्र चुंबकीय क्षेत्र बनाता है, जो उस दहकते हुए प्लाज्मा को रिएक्टर की दीवारों से दूर हवा में ही थामे रखता है।

स्वदेशी तकनीक पर जोर

चीन ने इस बात पर गर्व जताया है कि इस पूरी परियोजना में किसी भी बाहरी देश की सहायता या उपकरण का उपयोग नहीं किया गया है। यहाँ तक कि फ्यूजन रिएक्टर का दिल कहे जाने वाले 'सेंट्रल सोलेनोइड कॉइल' को भी पूरी तरह से चीन में ही निर्मित किया गया है। पिछले 6 वर्षों के इस गुप्त और चुनौतीपूर्ण मिशन के दौरान वैज्ञानिकों ने 47 नए पेटेंट हासिल किए हैं और इंडस्ट्री के लिए 25 नए मानक तय किए हैं। इससे स्पष्ट है कि अब इस हाई-टेक तकनीक के लिए चीन को अन्य वैश्विक शक्तियों पर निर्भर रहने की आवश्यकता नहीं है।

अत्यधिक कठिन परिचालन स्थितियां

इस मशीन का संचालन अत्यंत कठिन और प्रतिकूल परिस्थितियों में किया जाता है। वैज्ञानिकों ने इसे -269 डिग्री सेल्सियस के बर्फीले तापमान पर स्थिर रहने के लिए डिज़ाइन किया है, और इसे अगले 60 वर्षों तक बिना किसी तकनीकी खराबी के काम करना है। इसमें बिजली के प्रवाह में प्रतिरोध को न्यूनतम कर दिया गया है, जिससे 1,00,000 एम्पीयर से अधिक का विद्युत प्रवाह बिना किसी ऊर्जा ह्रास के संपन्न हो सकता है।

चीन का भविष्य का रोडमैप

यह उपलब्धि चीन के एक सुव्यवस्थित त्रि-चरणीय योजना का हिस्सा है। इससे पहले चीन के EAST (Experimental Advanced Superconducting Tokamak) ने 10 करोड़ डिग्री तापमान पर प्लाज्मा को 1,066 सेकंड तक रोककर विश्व रिकॉर्ड बनाया था। अब आगामी योजनाओं में निम्नलिखित चरण शामिल हैं:

  • वर्ष 2027 के अंत तक: बर्निंग प्लाज्मा एक्सपेरिमेंटल टोकामैक को सफलतापूर्वक पूरा करना।
  • वर्ष 2030 तक: कृत्रिम सूर्य के माध्यम से इतिहास में पहली बार कमर्शियल स्तर पर बिजली उत्पादन का लक्ष्य।
  • अंतिम चरण: दुनिया का पहला 'चीन फ्यूजन इंजीनियरिंग डेमोंस्ट्रेशन रिएक्टर' स्थापित करना, जो पूरे देश को असीमित ऊर्जा की आपूर्ति करेगा।

क्या यह परियोजना पूरी तरह सुरक्षित और सरल है?

वैज्ञानिक समुदाय का मानना है कि इस नकली सूर्य से घर-घर तक बिजली पहुंचाना रातों-रात संभव नहीं होगा। अभी रिएक्टर के विभिन्न हिस्सों को एकीकृत करना, उनका दीर्घकालिक परीक्षण करना और यह सिद्ध करना बाकी है कि मशीन बिजली की खपत से कहीं अधिक बिजली का उत्पादन कर सके। इसके बावजूद, इस 582 टन के सुपर-मैग्नेट ने पूरी दुनिया को यह संकेत दे दिया है कि ऊर्जा भविष्य का नक्शा बदल सकता है। यदि चीन अपने इस लक्ष्य को पाने में पूरी तरह कामयाब होता है, तो खाड़ी देशों के तेल, कोयले और गैस आधारित ऊर्जा बाजार की महत्ता कम हो सकती है, जिससे वैश्विक ऊर्जा राजनीति का केंद्र पूरी तरह बदल जाएगा।

साहिल चौहान पाबना के वर्ल्ड अफेयर्स रिपोर्टर हैं, जो अंतरराष्ट्रीय खबरें और वैश्विक मामले कवर करते हैं। विदेश नीति, कूटनीति और दुनिया भर के घटनाक्रमों पर उनकी अच्छी पकड़ है। वे जटिल वैश्विक मुद्दों को भारतीय नजरिए से समझाते हैं।

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