बिहार
2 घंटे पहले
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विचारों
नाव बनाने में जामुन की लकड़ी का महत्व
पहले के समय में नावें आवागमन का एक महत्वपूर्ण साधन थीं। नाव की मजबूती में लकड़ी की गुणवत्ता का बड़ा हाथ होता था। यदि सही और टिकाऊ लकड़ी का चयन नहीं किया जाता, तो नाव जल्दी सड़ जाती थी, जिससे नाविकों को नुकसान उठाना पड़ता था।
जामुन की लकड़ी की विशेषताएँ
गंगा और अन्य नदियों में चलने वाली नावें पहले जामुन की लकड़ी से बनाई जाती थीं। छपरा के नाव बनाने वाले कारीगर आज भी मानते हैं कि जामुन की लकड़ी सबसे मजबूत और टिकाऊ होती है। उनका कहना है कि यह लकड़ी जल्दी सड़ती नहीं है और पानी में कीड़ा भी नहीं लगने देती।
नाव बनाने की प्रक्रिया
अशोक कुमार, एक स्थानीय कारीगर, ने बताया कि वे जामुन की लकड़ी से नाव तैयार करते हैं, जो पानी को दूषित नहीं होने देती और उसमें कीड़ा पनपने नहीं देती। पूर्वजों ने बहुत खोजबीन के बाद इस लकड़ी का चयन किया था।
अन्य लकड़ियों की तुलना
अशोक ने बताया कि जामुन की लकड़ी से भी मजबूत लकड़ियाँ जैसे सखुआ मौजूद हैं, लेकिन पूर्वजों ने जामुन की लकड़ी को प्राथमिकता दी। दूसरी लकड़ी से बनी नावें अधिकतम एक साल तक ही चल पाती हैं, जबकि जामुन की लकड़ी से बनी नावें लगभग पांच साल या उससे अधिक समय तक सुरक्षित रहती हैं।
पर्यावरण की सुरक्षा
अशोक कुमार के अनुसार, उनके पास जंगली लकड़ी और जामुन की लकड़ी दोनों से बनी नावें हैं। जंगली लकड़ी की नाव एक साल बाद सड़ गई, जबकि जामुन की लकड़ी की नाव अब भी सुरक्षित है। उन्होंने कहा कि जामुन की लकड़ी की कमी के कारण नाव का जितना हिस्सा पानी में होता है, उतना ही हिस्सा जामुन से बनाया जाता है, जबकि अन्य हिस्से में शीशम और सखुआ जैसी लकड़ियों का उपयोग किया जाता है।
जल और पर्यावरण की शुद्धता
अशोक ने यह भी बताया कि उनके पूर्वज गंगा को पूजते थे और पानी को साफ रखने का ध्यान रखते थे। यही वजह है कि वे जामुन की लकड़ी से नाव बनाते थे। उनका मानना है कि जल और पर्यावरण को शुद्ध रखने के लिए ऐसी छोटी-छोटी बातों पर ध्यान देना आवश्यक है, नहीं तो भविष्य में बड़ा नुकसान हो सकता है।
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