मुगलसराय का मानसरोवर तालाब गंदगी का पर्याय: स्वच्छ भारत अभियान के दावों पर उठे सवाल उत्तर प्रदेश 2 महीने पहले 77
उत्तर प्रदेश के चंदौली स्थित मुगलसराय के मानसरोवर तालाब की हालत बदतर है, जहां केवल छठ पूजा के दौरान सफाई होती है और बाकी समय यह कचरे के ढेर में तब्दील रहता है। स्थानीय लोग प्रशासनिक लापरवाही और जवाबदेही के अभाव से खासे नाराज हैं।

छठ पूजा तक सीमित है स्वच्छता का दिखावा

केंद्र सरकार का महत्वाकांक्षी स्वच्छ भारत अभियान देशभर में स्वच्छता का संदेश प्रसारित करने का दावा करता है। लेकिन उत्तर प्रदेश के चंदौली जिले में स्थित मुगलसराय का मानसरोवर तालाब इन सरकारी दावों की जमीनी हकीकत को आईना दिखा रहा है। यह तालाब केवल एक जल स्रोत नहीं है, बल्कि हजारों लोगों की धार्मिक आस्था का केंद्र है, जहाँ हर साल छठ महापर्व के दौरान हजारों की संख्या में श्रद्धालु उमड़ते हैं। पर्व से ठीक पहले प्रशासन सक्रिय हो जाता है और तालाब की विशेष रूप से सफाई कराई जाती है, लेकिन त्योहार खत्म होते ही यह स्थान फिर से गंदगी, बदबू और प्रदूषण का अड्डा बन जाता है। स्थानीय निवासियों का कहना है कि प्रशासन और नगर पालिका की नजरें केवल इसी दौरान इस तालाब की ओर पड़ती हैं, जबकि शेष वर्ष भर यह उपेक्षा का शिकार बना रहता है।

प्रशासनिक उदासीनता और जिम्मेदारी का अभाव

मानसरोवर तालाब की बदहाली का सबसे बड़ा कारण जिम्मेदार विभागों के बीच आपसी खींचतान है। स्थानीय लोगों के अनुसार, इस तालाब की नियमित देखरेख और सफाई की जिम्मेदारी लेने के लिए रेलवे प्रशासन, नगर पालिका और स्थानीय जनप्रतिनिधियों में से कोई भी तैयार नहीं है। जब भी इस दिशा में शिकायत की जाती है, तो संबंधित विभाग एक दूसरे पर जिम्मेदारी का ठीकरा फोड़कर पल्ला झाड़ लेते हैं। इस समन्वय की कमी के चलते एक धार्मिक महत्व वाला तालाब निरंतर दुर्दशा की ओर बढ़ रहा है। तालाब के चारों ओर फैला कचरा और जलता हुआ कूड़ा यहां आने वाले लोगों के लिए भारी परेशानी का कारण बन चुका है। जो स्थान कभी शहर की सुंदरता का प्रतीक हुआ करता था, वहां आज कुछ देर रुकना भी दूभर हो गया है।

स्वच्छता अभियान सिर्फ फोटो खिंचवाने का साधन

स्थानीय अधिवक्ता संतोष पाठक ने प्रशासन पर कड़े शब्दों में निशाना साधते हुए कहा है कि मानसरोवर तालाब पूरे वर्ष कचरे से भरा रहता है। उन्होंने दावा किया कि स्वच्छता के नाम पर चलाया जा रहा अभियान केवल फोटो खिंचवाने और दिखावे तक सीमित रह गया है। पाठक के मुताबिक, भले ही कागजों पर करोड़ों रुपये स्वच्छता मद में खर्च किए जा रहे हों, लेकिन धरातल पर शहर की गलियों, सार्वजनिक स्थलों और मोहल्लों की स्थिति आज भी बदतर है। उनका यह भी आरोप है कि अधिकारी अक्सर अपने निजी आवासों और वीआईपी क्षेत्रों की साफ-सफाई पर तो पूरा ध्यान देते हैं, मगर आम जनता की बस्तियों और सार्वजनिक संपत्तियों के प्रति उनकी कोई जवाबदेही नहीं दिखती।

लगातार जलते कचरे से स्वास्थ्य पर मंडरा रहा खतरा

स्थानीय निवासी अजय यादव ने इस भयावह स्थिति का जिक्र करते हुए बताया कि तालाब के किनारे लंबे समय से कचरे के ढेर में आग लगी हुई है। उन्होंने कहा कि लगभग एक महीने से यह सिलसिला जारी है, जिससे उठने वाला जहरीला धुआं आसपास के वातावरण को प्रदूषित कर रहा है। यद्यपि एक बार फायर ब्रिगेड ने आग बुझाने का प्रयास जरूर किया था, लेकिन वे पूर्ण रूप से सफल नहीं हो सके। यह धुआं न केवल दुर्गंध फैला रहा है, बल्कि स्थानीय निवासियों के स्वास्थ्य के लिए भी गंभीर खतरा पैदा कर रहा है। इस मार्ग से प्रतिदिन हजारों लोगों का आना-जाना होता है, जिन्हें मजबूरी में इस जहरीले धुएं और गंदगी के बीच से गुजरना पड़ता है, जबकि नगर पालिका के अधिकारी इस गंभीर समस्या से पूरी तरह अनभिज्ञ बने हुए हैं।

भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ी सरकारी योजनाएं

नागरिक माधवेंद्र मूर्ति ओझा ने इस पूरे प्रकरण के पीछे व्यापक भ्रष्टाचार की ओर इशारा किया है। उन्होंने बताया कि सरकार द्वारा तालाबों के सौंदर्यीकरण, खुदाई और मत्स्य पालन को बढ़ावा देने के लिए भारी बजट जारी किया जाता है, लेकिन उसका कहीं कोई धरातलीय प्रभाव नहीं दिखता। तालाब में मरती हुई मछलियों को दिखाते हुए उन्होंने कहा कि भारी प्रदूषण और ऑक्सीजन की कमी के चलते जलजीवों का जीवन संकट में है। यदि सरकार की योजनाओं का क्रियान्वयन ईमानदारी और नियमानुसार हुआ होता, तो आज मानसरोवर तालाब की यह दुर्दशा नहीं देखी जाती। उन्होंने स्पष्ट किया कि बजट तो आवंटित होता है, लेकिन उसका बड़ा हिस्सा बंदरबांट की भेंट चढ़ जाता है।

अमृत सरोवर योजना का लाभ जनता से कोसों दूर

स्थानीय निवासी अरुण द्विवेदी ने सरकार की अमृत सरोवर जैसी योजनाओं पर सवाल उठाते हुए कहा कि इन योजनाओं के तहत करोड़ों रुपये खर्च होने के दावे किए जाते हैं, लेकिन मानसरोवर तालाब की जर्जर स्थिति इन दावों की पोल खोलती है। तालाब के किनारे जलते कचरे से निकलने वाली हानिकारक गैसें और गंदगी स्थानीय लोगों के लिए एक अभिशाप बन चुकी हैं। उन्होंने जोर देकर कहा कि बजट आता तो है, लेकिन उसका लाभ आम जनता तक पहुंचने के बजाय फाइलों में ही सिमट जाता है।

सुंदरीकरण के वादे और खत्म होता आकर्षण

एक समय था जब मानसरोवर तालाब के सुंदरीकरण के लिए विशेष प्रयास किए गए थे। उस दौर में तालाब में हंस छोड़े गए थे ताकि यह एक पर्यटन स्थल के रूप में विकसित हो सके, लेकिन आज वह सारी सुंदरता कूड़े के ढेर के नीचे दब चुकी है। स्थानीय लोगों का मानना है कि यदि नियमित रूप से सफाई और रखरखाव सुनिश्चित किया जाए, तो यह तालाब निश्चित रूप से एक उत्कृष्ट पर्यटन और धार्मिक स्थल बन सकता है। अंत में बड़ा सवाल यही है कि इस स्थल के संरक्षण के लिए जिम्मेदार कौन है? जब तक प्रशासनिक जवाबदेही तय नहीं की जाएगी और विभागों का आपसी तालमेल बेहतर नहीं होगा, तब तक स्वच्छ भारत अभियान के दावे इसी तरह सवाल के घेरे में रहेंगे। यह तालाब हजारों लोगों की आस्था का केंद्र है और इसकी बदहाली प्रशासनिक विफलता की जीवंत तस्वीर है।

चेतन तिवारी पाबना के उत्तर प्रदेश संवाददाता हैं और राज्य की राजनीति, प्रशासन तथा जमीनी मुद्दों को कवर करते हैं। लखनऊ में रहते हुए वे जिलों से लेकर विधानसभा तक की खबरें संतुलित रिपोर्टिंग के साथ पाठकों तक पहुंचाते हैं। आम लोगों के मुद्दों और स्थानीय घटनाओं पर उनका खास फोकस रहता है।

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