क्या चांद पर अमेरिका का कब्जा हो सकता है? डोनाल्ड ट्रंप के दावे ने छेड़ी अंतरिक्ष कानून पर नई बहस अमेरिका एक घंटा पहले 6
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के 'चांद हमारा है' वाले बयान ने अंतरिक्ष के मालिकाना हक को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक बड़ी चर्चा शुरू कर दी है। क्या भविष्य में चंद्रमा के संसाधनों पर किसी एक देश का अधिकार होगा या यह पूरी मानवता की धरोहर रहेगी, आइए इसे कानून की नजर से समझते हैं।

सोशल मीडिया पोस्ट से छिड़ी नई बहस

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल पर चांद की एक तस्वीर साझा करते हुए एक ऐसा बयान दिया है जिसने अंतरराष्ट्रीय जगत में खलबली मचा दी है। ट्रंप ने तस्वीर के साथ लिखा, द मून इज अवर यानी कि चांद हमारा है। उनके इस दावे के बाद से ही दुनिया भर के जानकारों और अंतरिक्ष प्रेमियों के मन में यह सवाल उठ खड़ा हुआ है कि क्या सच में कोई देश चांद पर अपना मालिकाना हक जता सकता है। क्या अमेरिका वाकई चंद्रमा की जमीन पर कब्जा करने की तैयारी कर रहा है। यदि चांद किसी एक देश का नहीं है, तो वहां मौजूद दुर्लभ खनिज, बर्फ और पानी का उपयोग करने का अधिकार किसके पास होगा। इन तमाम सवालों के जवाब जटिल अंतरराष्ट्रीय संधियों और अंतरिक्ष कानूनों में छिपे हैं।

अंतरिक्ष कानून और 1967 की संधि

चांद पर कब्जे की कानूनी स्थिति को समझने के लिए हमें करीब 60 साल पीछे जाना होगा। वर्ष 1967 में दुनिया भर के देशों ने मिलकर एक महत्वपूर्ण समझौते पर हस्ताक्षर किए थे, जिसे बाहरी अंतरिक्ष संधि यानी आउटर स्पेस ट्रीटी के नाम से जाना जाता है। इस संधि का सबसे बुनियादी नियम यही है कि चंद्रमा और अन्य खगोलीय पिंड किसी भी एक देश की निजी संपत्ति नहीं हो सकते।

इसका सीधा सा अर्थ यह है कि यदि कोई देश चंद्रमा पर अपना झंडा फहराता है, वहां विशाल इमारतें बनाता है या कोई वैज्ञानिक शोध केंद्र स्थापित करता है, तो भी वह उस जमीन का कानूनी मालिक नहीं बन जाता। चीन, रूस, भारत या अमेरिका, कोई भी देश चांद के किसी विशेष हिस्से पर अपनी संप्रभुता का दावा नहीं कर सकता। वहां पहुंचना और वहां का मालिक बन जाना दो पूरी तरह से अलग कानूनी स्थितियां हैं।

ट्रंप का बयान: राजनीति या हकीकत

विशेषज्ञों का मानना है कि डोनाल्ड ट्रंप का यह बयान महज एक राजनीतिक टिप्पणी है। अंतरराष्ट्रीय कानून के दृष्टिकोण से इसे किसी देश की ओर से चंद्रमा पर औपचारिक दावे के रूप में नहीं देखा जा सकता। कानून स्पष्ट है कि सिर्फ चंद्रमा की सतह पर उतरने या वहां झंडा गाड़ने मात्र से कोई देश उस जगह का कानूनी स्वामी नहीं बन सकता। हालांकि, यह बयान एक महत्वपूर्ण बहस को जन्म देता है कि जब चांद की जमीन किसी की नहीं है, तो उससे निकाले जाने वाले संसाधनों का मालिक कौन होगा।

चांद पर संसाधनों की असली जंग

भविष्य की अंतरिक्ष दौड़ में सोना या चांदी नहीं, बल्कि पानी की बर्फ सबसे कीमती संसाधन साबित होने वाली है। चंद्रमा के कुछ ऐसे दुर्गम और अंधेरे हिस्से हैं जहां सूर्य की रोशनी कभी नहीं पहुंचती। वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि वहां बर्फ के रूप में पानी मौजूद है। यदि भविष्य में मानव बस्तियां वहां बसती हैं, तो इस बर्फ से न केवल पीने का पानी मिलेगा, बल्कि इससे ऑक्सीजन भी अलग की जा सकेगी और हाइड्रोजन के जरिए रॉकेट के लिए ईंधन तैयार किया जा सकेगा। इसके अलावा चंद्रमा की धूल में मौजूद बहुमूल्य धातुएं और खनिज वहां निर्माण कार्य के लिए अत्यंत उपयोगी होंगे।

अमेरिका का अपना विशेष कानून

संसाधनों के दोहन को लेकर अमेरिका ने वर्ष 2015 में एक घरेलू कानून पारित किया था। इसके तहत अमेरिकी नागरिकों और वहां की निजी कंपनियों को यह कानूनी अधिकार दिया गया है कि वे अंतरिक्ष से संसाधन निकालकर उनका व्यावसायिक उपयोग कर सकें। अमेरिकी सरकार का तर्क है कि संसाधनों का दोहन करना और जमीन पर कब्जा करना दो अलग चीजें हैं। अमेरिका का कहना है कि यह कानून किसी खगोलीय पिंड के मालिकाना हक को नहीं दर्शाता, बल्कि केवल वहां से निकाले गए पदार्थों के उपयोग की अनुमति देता है।

निजी कंपनियों की भूमिका और विवाद

आजकल निजी कंपनियां भी चंद्रमा के मिशन पर काम कर रही हैं। यदि कोई अमेरिकी कंपनी चंद्रमा से 100 टन पानी की बर्फ का खनन करती है, तो वह बर्फ किसकी होगी। एक पक्ष का मानना है कि यदि अंतरराष्ट्रीय नियमों के तहत खनन किया गया है, तो कंपनी उस संसाधन की मालिक हो सकती है। वहीं, दूसरा पक्ष यह तर्क देता है कि यदि बड़ी कंपनियां चंद्रमा के सबसे समृद्ध इलाकों पर अपना नियंत्रण बना लेती हैं, तो यह उस भावना के विपरीत होगा जिसके तहत चांद को पूरी मानवता की साझा विरासत माना गया है।

नासा और आर्टेमिस समझौता

अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा आने वाले समय के लिए ऐसी तकनीकों पर काम कर रही है जिससे चंद्रमा की सतह से मिट्टी और सामग्री एकत्र की जा सके। इसका मुख्य उद्देश्य वैज्ञानिक अनुसंधान के साथ-साथ भविष्य में चंद्रमा पर इंसानी मौजूदगी को स्थायी बनाना है। इसी उद्देश्य के साथ वर्ष 2020 में अमेरिका ने आर्टेमिस समझौता शुरू किया। इसका मकसद चंद्रमा और मंगल पर शांतिपूर्ण खोज के लिए साझा नियम बनाना है। सितंबर 2026 तक इस समझौते से जुड़ने वाले देशों का आंकड़ा 72 तक पहुंच चुका है।

सुरक्षित इलाका और भविष्य के तनाव

आर्टेमिस समझौते में सुरक्षित इलाकों की परिकल्पना की गई है। इसका मतलब है कि एक अभियान के दौरान उसके आसपास का क्षेत्र सुरक्षित रखा जाएगा ताकि अन्य देशों की गतिविधियों से टकराव न हो। हालांकि, आलोचकों का कहना है कि यदि कोई देश लंबे समय तक किसी खास इलाके को अपना सुरक्षित क्षेत्र बनाए रखता है, तो व्यवहार में वह उस जमीन पर अपना नियंत्रण ही स्थापित कर लेगा। यह आने वाले समय में बड़े विवादों का केंद्र बन सकता है।

चांद समझौता और मानवता की विरासत

वर्ष 1979 में संयुक्त राष्ट्र के तहत चांद समझौता किया गया था, जिसमें स्पष्ट कहा गया था कि चांद और उसके संसाधन पूरी मानवता की साझा विरासत हैं। इस समझौते का उद्देश्य यह था कि संसाधनों का लाभ केवल कुछ अमीर देशों को न मिले। हालांकि, विडंबना यह है कि अमेरिका सहित दुनिया की बड़ी अंतरिक्ष शक्तियों ने इस समझौते को ज्यादा समर्थन नहीं दिया है, जिससे संसाधनों के दोहन पर वैश्विक आम सहमति नहीं बन पा रही है।

निष्कर्ष: क्या होगा आगे

चंद्रमा आज किसी एक देश की जागीर नहीं है, लेकिन भविष्य में वहां से संसाधनों को निकालने की दौड़ में नए संघर्ष पैदा हो सकते हैं। डोनाल्ड ट्रंप का पोस्ट भले ही केवल एक सोशल मीडिया हलचल हो, लेकिन इसने उस कड़वे सच को उजागर कर दिया है कि हमारे पास चंद्रमा पर संसाधनों के बंटवारे को लेकर कोई ठोस अंतरराष्ट्रीय नियम नहीं हैं। आने वाली अंतरिक्ष दौड़ यह तय करेगी कि चंद्रमा केवल एक शोध का केंद्र रहेगा या फिर यह भविष्य की नई आर्थिक महाशक्तियों का अखाड़ा बनेगा।

करण मल्होत्रा पाबना के अंतरराष्ट्रीय संवाददाता हैं, जो अमेरिका, यूरोप और एशिया की खबरें रिपोर्ट करते हैं। वैश्विक राजनीति, अर्थव्यवस्था और बड़े अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रमों पर वे नजर रखते हैं। उनकी रिपोर्ट्स दुनिया की हलचल को पाठकों तक तेजी से पहुंचाती हैं।

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