छत्तीसगढ़
एक घंटा पहले
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महंगाई के दौर में कम होती आमदनी का संकट
बढ़ती महंगाई और बदलती जीवनशैली के बीच समाज का एक ऐसा वर्ग है, जिसकी मेहनत तो कम नहीं हुई लेकिन कमाई का स्तर काफी नीचे गिर चुका है। शहर के चौक-चौराहों पर बैठकर जूते और चप्पलों की मरम्मत करने वाले मोची इस समय आर्थिक तंगी के सबसे कठिन दौर से गुजर रहे हैं। कभी सिलाई, पेंच और रबर लगाने जैसे कामों से अच्छी खासी आय अर्जित करने वाले इन मेहनतकश लोगों के लिए अब अपने परिवार का पेट पालना भी एक चुनौती बन गया है। बिलासपुर शहर के सीएम चौक पर काम करने वाले गोपाल अहिरवार जैसे कई कारीगर इस बात की गवाही दे रहे हैं कि कैसे बाजार के बदलते स्वरूप ने उनके पारंपरिक रोजगार की कमर तोड़ दी है।
40 वर्षों का अनुभव और गिरती हुई कमाई
बिलासपुर के प्रसिद्ध सीएम चौक, जिसे कंपनी गार्डन चौक और संतोष भवन चौक के नाम से भी जाना जाता है, वहां गोपाल अहिरवार पिछले करीब 25 वर्षों से अपना काम कर रहे हैं। हालांकि, उनका इस पेशे से नाता करीब 40 साल पुराना है। गोपाल अहिरवार बताते हैं कि जब उन्होंने इस काम की शुरुआत की थी, तब स्थितियां काफी अलग थीं। उस समय उनके पास दिन भर ग्राहकों का तांता लगा रहता था। उस दौरान वे एक दिन में आसानी से 500 से 600 रुपये तक कमा लिया करते थे, जिससे परिवार का जीवन स्तर काफी बेहतर था। लेकिन समय बीतने के साथ यह कमाई घटकर अब महज 250 से 300 रुपये के बीच सिमट गई है।
रेडीमेड जूतों ने छीना पारंपरिक काम
इस बदलाव के पीछे सबसे बड़ा कारण बाजार में रेडीमेड और फैंसी जूतों का बढ़ता चलन है। गोपाल अहिरवार के अनुसार, पहले लोग चमड़े के जूते ज्यादा पसंद करते थे, जिनमें बार-बार सिलाई, सोल लगवाना या पेंच कसने जैसे काम करने पड़ते थे। मोचियों के लिए ये काम नियमित आय का जरिया होते थे। लेकिन आज के दौर में बिकने वाले अधिकांश जूतों की बनावट ऐसी है कि उनमें मरम्मत की गुंजाइश ही नहीं बचती। कई जूतों में तो ऐसी सामग्री का उपयोग होता है जिसे सुई से सिलना भी संभव नहीं है। इस तकनीकी बदलाव के कारण उनके पारंपरिक काम पर लगभग 50 प्रतिशत तक का नकारात्मक असर पड़ा है।
6 से 7 हजार रुपये में चार लोगों के परिवार का भरण-पोषण
गोपाल अहिरवार के परिवार में कुल चार सदस्य हैं और घर की पूरी आर्थिक जिम्मेदारी उन्हीं के कंधों पर है। आज की महंगाई में महीने भर का खर्च 6 से 7 हजार रुपये की कमाई में चलाना किसी संघर्ष से कम नहीं है। वह बताते हैं कि दिन भर में बमुश्किल 8 से 10 ग्राहक ही आ पाते हैं। कोई ग्राहक 10 रुपये का छोटा काम करवाता है तो कोई 20 रुपये का। इन छोटी-छोटी बूंदों से दिन भर की जो कमाई जुड़ती है, उसी से किसी तरह दाल-रोटी का इंतजाम हो पाता है। उनके पास इस पेशे के अलावा आय का कोई दूसरा विकल्प या साधन नहीं है, जिससे उनकी चिंताएं और अधिक बढ़ गई हैं।
सरकारी सहायता और सुविधाओं की हकीकत
जब गोपाल अहिरवार से सरकारी योजनाओं के बारे में पूछा गया, तो उन्होंने गहरी नाराजगी जाहिर की। उन्होंने स्पष्ट किया कि करीब 40 से 45 साल पहले उनके परिवार को एक गुमटी मिली थी। इसके बाद नगर निगम की तरफ से केवल एक छोटी पेटी उपलब्ध कराई गई, लेकिन उसके बाद से उन्हें किसी भी तरह की विशेष सरकारी सहायता का लाभ नहीं मिला है। गोपाल का मानना है कि कागजों पर तो छोटे कामगारों के उत्थान की खूब बातें की जाती हैं, लेकिन हकीकत यह है कि इन योजनाओं का वास्तविक लाभ जमीनी स्तर पर बैठे लोगों तक पहुंच ही नहीं पाता है।
शासन-प्रशासन से एक व्यवस्थित दुकान की मांग
गोपाल अहिरवार ने शासन और प्रशासन से एक ठोस अपील की है। उनका कहना है कि शहर में जहां भी नए सरकारी कॉम्प्लेक्स बनाए जा रहे हैं, वहां मोची और अन्य छोटे पारंपरिक व्यवसाय से जुड़े कारीगरों को प्राथमिकता के आधार पर दुकानें आवंटित की जानी चाहिए। बिलासपुर में कई स्थानों पर नए निर्माण हो रहे हैं, लेकिन अब तक उन जैसे मेहनतकश लोगों की सुध लेने वाला कोई नहीं है। चौक-चौराहों के किनारे खुले में बैठकर काम करने के कारण कई बार ग्राहक भी उन्हें ढूंढ नहीं पाते। यदि उन्हें एक निश्चित जगह या पक्की दुकान मिल जाए, तो न केवल उनकी रोजी-रोटी सुरक्षित होगी, बल्कि वे सम्मान के साथ अपना जीवन यापन कर सकेंगे। यह कहानी केवल एक मोची की व्यथा नहीं है, बल्कि उन तमाम कारीगरों की है जो अपने हाथों के हुनर से समाज की सेवा कर रहे हैं लेकिन बाजार के इस नए दौर में खुद को अकेला और उपेक्षित महसूस कर रहे हैं।
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