राजस्थान
44 मिनट पहले
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दीपावली का त्योहार देश भर में प्रकाश, खुशहाली और बुराई पर अच्छाई की विजय के प्रतीक के रूप में मनाया जाता है। हालांकि, राजस्थान के बीकानेर शहर में इस पावन पर्व का एक ऐसा अनूठा पहलू सामने आता है जो मजहब की तमाम बंदिशों को दरकिनार कर आपसी सौहार्द और भाईचारे की मिसाल पेश करता है। यहां दीपावली के आगमन से पहले मुस्लिम समाज के लोग एकत्रित होकर उर्दू में लिखी गई रामायण का पाठ करते हैं। पिछले करीब 30 वर्षों से अनवरत चली आ रही यह परंपरा बीकानेर की ऐतिहासिक गंगा-जमुनी तहजीब को गहराई से प्रदर्शित करती है।
तीन दशकों से निभाई जा रही है अनूठी परंपरा
इस सांस्कृतिक आयोजन में हिंदू और मुस्लिम दोनों ही समुदायों के लोग बड़ी संख्या में एक साथ शिरकत करते हैं और रामायण के उर्दू छंदों का आनंद लेते हैं। इस कार्यक्रम का संयुक्त रूप से आयोजन पर्यटन लेखक संघ और महफिल-ए-अदब नामक संस्थाओं द्वारा किया जाता है।
स्थानीय इतिहास और परंपरा के जानकार डॉ. जिया-उल-हसन कादरी के अनुसार, इस अद्भुत आयोजन की नींव लगभग 25 से 30 साल पहले जाने-माने एडवोकेट उपध्यान चंद्र कोचर की प्रेरणा और प्रयास से रखी गई थी। तब से लेकर आज तक हर वर्ष दीपावली से ठीक पहले उर्दू रामायण के वाचन का सिलसिला जारी है। वर्ष 2012 से इस कार्यक्रम को और अधिक व्यवस्थित रूप प्रदान करते हुए नियमित रूप से पाठ का आयोजन किया जा रहा है। आयोजन की समाप्ति के पश्चात सभी श्रद्धालु और नागरिक एक साथ मिलकर प्रसाद ग्रहण करते हैं।
1935 में बीकानेर में ही लिखी गई थी यह उर्दू रामायण
इस आयोजन का एक मुख्य आकर्षण यह भी है कि जिस उर्दू रामायण का पाठ किया जाता है, उसकी रचना का इतिहास स्वयं बीकानेर की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि से जुड़ा हुआ है। वर्ष 1935 में लखनऊ के विख्यात उर्दू शायर मौलवी बादशाह हुसैन राणा लखनवी ने बीकानेर प्रवास के दौरान इसकी रचना की थी। उस समय मौलवी राणा लखनवी बीकानेर रियासत के तत्कालीन शासक महाराजा गंगासिंह के दरबार में उर्दू और फारसी भाषा के अनुवादक के पद पर अपनी सेवाएं दे रहे थे।
कश्मीरी पंडित मित्र की फरमाइश और तीन महीने का अध्ययन
इस ग्रन्थ के लिखे जाने के पीछे भी एक बेहद दिलचस्प कहानी दर्ज है। डॉ. जिया-उल-हसन कादरी बताते हैं कि उस दौर में बनारस हिंदू विश्वविद्यालय द्वारा देश की विभिन्न मातृभाषाओं में काव्य रूप में रामायण की रचना करने की एक अखिल भारतीय प्रतियोगिता आयोजित की गई थी।
इसी दौरान मौलवी राणा लखनवी के एक कश्मीरी पंडित मित्र, जो उनके शिष्य भी थे, उन्होंने उनसे उर्दू जुबान में रामायण लिखने का खास आग्रह किया। शुरुआती दौर में राणा लखनवी रामायण के विभिन्न प्रसंगों और संपूर्ण कथाक्रम से पूरी तरह परिचित नहीं थे। उनके मित्र ने उन्हें रामचरितमानस के विभिन्न अध्यायों, पात्रों और प्रसंगों की विस्तृत जानकारी दी। इसके बाद राणा लखनवी ने रामचरितमानस का गहराई से अध्ययन किया और अपनी तीन महीने की अथक मेहनत के बाद रामायण को सुरीले उर्दू छंदों में पिरो दिया।
नौ पन्ने, 27 छंद और राष्ट्रीय स्वर्ण पदक
मौलवी राणा लखनवी की यह कृति अपनी सादगी, संक्षिप्तता और बेजोड़ साहित्यिक शैली के लिए जानी जाती है। इस ऐतिहासिक उर्दू रामायण की प्रमुख विशेषताएं निम्नलिखित हैं:
- यह पूरी रचना केवल नौ पृष्ठों में समाहित की गई है।
- इसमें कुल 27 छंद शामिल हैं।
- प्रत्येक छंद की रचना छह-छह पंक्तियों में की गई है।
रचना पूर्ण होने के लगभग तीन महीने बाद बनारस हिंदू विश्वविद्यालय की ओर से परिणाम घोषित किया गया, जिसमें राणा लखनवी की इस उर्दू रामायण को पूरे भारत में प्रथम स्थान प्राप्त हुआ। इस शानदार उपलब्धि के लिए उन्हें विश्वविद्यालय द्वारा गोल्ड मेडल देकर सम्मानित किया गया था। रचना की साहित्यिक विशालता और सामाजिक प्रासंगिकता को देखते हुए महाराजा गंगासिंह ने इसे बीकानेर रियासत के आठवीं कक्षा के शैक्षणिक पाठ्यक्रम में भी शामिल करवाया था।
सद्भाव और साहित्य की अमर विरासत
लगभग एक शताब्दी का समय बीत जाने के बाद भी मौलवी बादशाह हुसैन राणा लखनवी की यह साहित्यिक कृति लोगों को आपस में जोड़ने का महत्वपूर्ण कार्य कर रही है। बीकानेर में दीपावली से पूर्व होने वाला यह उर्दू रामायण वाचन कार्यक्रम न केवल पुरानी स्मृतियों को ताजा करता है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को भी सर्वधर्म समभाव का सशक्त संदेश प्रदान करता है।
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