राष्ट्रीय राजनीति
48 मिनट पहले
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दिल्ली की सांसों पर संकट और आंकड़ों का खेल
इन दिनों दिल्ली और एनसीआर के निवासी गंभीर वायु प्रदूषण की मार झेल रहे हैं। दिवाली के त्योहार से पहले ही हवा की गुणवत्ता का सूचकांक यानी AQI का स्तर 400 को पार कर गया है, जिससे लोगों के लिए खुली हवा में सांस लेना भी मुश्किल हो गया है। हैरानी की बात यह है कि एक तरफ दिल्ली-एनसीआर में प्रदूषण का कहर बरपा है, तो दूसरी तरफ पंजाब और हरियाणा जैसे राज्यों में पराली जलाने की घटनाएं सरकारी आंकड़ों में काफी कम दिखाई दे रही हैं। क्या सिर्फ वाहनों के धुएं से हवा इतनी प्रदूषित हो सकती है कि सांस लेना दूभर हो जाए, या फिर इसके पीछे कोई और राज छिपा है?
पोखरण वाला दांव और किसानों की नई तरकीब
एक हालिया रिपोर्ट में इस पूरे मामले को लेकर बेहद चौंकाने वाले दावे किए गए हैं। रिपोर्ट के अनुसार, पंजाब और हरियाणा के किसान अब पराली जलाने के अपने तौर-तरीकों को सैटेलाइट की निगरानी से बचाने के लिए नई तकनीक का इस्तेमाल कर रहे हैं। दिलचस्प बात यह है कि यह तरीका वैसा ही है जैसा भारत के पूर्व राष्ट्रपति और महान वैज्ञानिक एपीजे अब्दुल कलाम ने पोखरण परमाणु परीक्षण के दौरान अमेरिकी सैटेलाइट्स को चकमा देने के लिए इस्तेमाल किया था। जिस तरह कलाम ने तकनीक का इस्तेमाल कर अपनी गतिविधियों को अमेरिकी नजरों से छिपा लिया था, ठीक उसी तरह किसान प्रशासन और सरकार को गुमराह करने में सफल हो रहे हैं।
क्यों गहरा रहा है संदेह?
पंजाब और हरियाणा में इस सीजन अब तक पराली जलाने की घटनाएं उम्मीद से बहुत कम रिकॉर्ड की गई हैं। यदि किसान वाकई पराली नहीं जला रहे हैं, तो सवाल उठता है कि फिर दिल्ली और आसपास के इलाकों में प्रदूषण का स्तर लगातार क्यों बढ़ रहा है? यह विसंगति अब बड़े संदेह को जन्म दे रही है कि आधिकारिक आंकड़ों और जमीनी हकीकत में भारी अंतर है। ऐसा लगता है कि किसान अब सैटेलाइट की तकनीक को समझते हुए खुद को निगरानी से बचाने की कला में माहिर हो गए हैं। इस वजह से न केवल प्रशासन की व्यवस्था सवालों के घेरे में है, बल्कि दिल्ली-एनसीआर की जहरीली होती हवा भी एक अनसुलझी पहेली बन गई है।
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