विश्लेषण: राज्यसभा तक कैसे पहुंच सकते हैं महेश केवट? जानिए विधानसभा के आंकड़ों का पूरा गणित मध्य प्रदेश एक दिन पहले 8
मध्य प्रदेश में 18 जून को होने वाले राज्यसभा चुनाव में भाजपा के तीसरे उम्मीदवार महेश केवट की एंट्री ने मुकाबला रोचक बना दिया है। कांग्रेस प्रत्याशी मीनाक्षी नटराजन की राह अब कांटों भरी मानी जा रही है।

मध्य प्रदेश में खाली हो रहीं तीन राज्यसभा सीटों के लिए 18 जून 2026 को होने वाला मतदान राज्य की सियासत का तापमान बढ़ा चुका है। भारतीय जनता पार्टी ने शुरुआती दो सुरक्षित सीटों पर राष्ट्रीय महासचिव तरुण चुघ और रजनीश अग्रवाल को मैदान में उतारा। इसके बाद तीसरी सीट पर भी ताल ठोकते हुए पार्टी ने निवाड़ी निवासी और मछुआ कल्याण बोर्ड के पूर्व अध्यक्ष महेश केवट को अपना तीसरा प्रत्याशी घोषित कर दिया।

इससे पहले यह धारणा बनी हुई थी कि इस सीट से कांग्रेस की मीनाक्षी नटराजन बिना किसी अड़चन के राज्यसभा पहुंच जाएंगी। लेकिन भाजपा के इस कदम ने कांग्रेस खेमे की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव और भाजपा अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल की मौजूदगी में विधानसभा सचिव (रिटर्निंग ऑफिसर) के समक्ष महेश केवट का नामांकन दाखिल होते ही यह तय हो गया कि भाजपा तीसरी सीट पर सीधी टक्कर देने जा रही है।

विधानसभा में किसके पास कितनी ताकत

मध्य प्रदेश की 230 सदस्यीय विधानसभा की मौजूदा दलीय स्थिति के हिसाब से एक राज्यसभा सीट पर सीधी जीत के लिए करीब 58 विधायकों के वोट चाहिए। भाजपा के पास अपने 163 विधायक हैं, जिसके चलते तरुण चुघ और रजनीश अग्रवाल की दो सीटों (116 वोट) पर जीत पूरी तरह पक्की मानी जा रही है। दो उम्मीदवारों को जिता देने के बाद भी पार्टी के पास 47 अतिरिक्त वोट बच जाते हैं।

दूसरी ओर कांग्रेस के पास कुल 66 विधायक हैं, लेकिन इसी संख्या बल में छिपे तकनीकी और कानूनी पेच की वजह से उसका असली समीकरण लड़खड़ा गया है। आंकड़ों का यही महीन अंतर तीसरी सीट के मुकाबले को 'क्रॉस वोटिंग' की दिशा में धकेल रहा है। भाजपा ने केवट/निषाद (ओबीसी/मछुआरा) समुदाय से आने वाले महेश केवट को उतारकर विपक्षी खेमे पर मनोवैज्ञानिक दबाव भी बढ़ा दिया है।

कांग्रेस के दो वोटों पर कानूनी अड़चन

कांग्रेस के पास कागजों पर भले ही 66 विधायक दर्ज हों, लेकिन 18 जून को होने वाले इस चुनाव में उसके 2 विधायक कानूनी पेच के कारण मतदान नहीं कर पाएंगे। पहला झटका दतिया से कांग्रेस विधायक राजेंद्र भारती के रूप में लगा, जिन्हें विशेष अदालत द्वारा एक आपराधिक मामले में 3 साल की सजा सुनाए जाने के बाद जनप्रतिनिधित्व अधिनियम के तहत तत्काल प्रभाव से अयोग्य ठहरा दिया गया।

दूसरा बड़ा पेच विजयपुर से कांग्रेस विधायक मुकेश मल्होत्रा को लेकर है, जिनके निर्वाचन को (हलफनामे में जानकारी छिपाने के आरोप में) हाई कोर्ट द्वारा शून्य घोषित किए जाने के कारण उनके मतदान पर पूरी तरह रोक है। इस तरह मूल 66 की संख्या में से ये 2 वोट सीधे घट जाने से मतदान वाले दिन कांग्रेस की प्रभावी ताकत घटकर मात्र 64 रह जाती है।

तीसरी सीट पर क्यों उलझा है गणित

संख्या बल के आधार पर तीसरी सीट को सीधे अपने पाले में करने के लिए भाजपा के पास जादुई आंकड़े 58 से 11 वोट कम हैं। हालांकि पार्टी के पास मौजूद 47 सरप्लस वोटों के अलावा भारत आदिवासी पार्टी के कमलेश्वर डोडियार और बीना विधायक निर्मला सप्रे के समर्थन से यह आंकड़ा करीब 49 तक पहुंच जाता है। इसके बावजूद महेश केवट को राज्यसभा भेजने के लिए भाजपा को कम से कम 8 अतिरिक्त वोटों की जरूरत पड़ेगी।

ये 8 वोट सिर्फ और सिर्फ विपक्षी खेमे में सेंध, यानी 'क्रॉस वोटिंग' के जरिए ही जुटाए जा सकते हैं। भाजपा के रणनीतिकार इसी गुणा-गणित को बैठाने में जुटे हैं, जबकि कांग्रेस के पास 66 में से प्रभावी 63 वोट ही बचने के कारण उसका मार्जिन बेहद पतला रह गया है, जिससे मीनाक्षी नटराजन की उम्मीदवारी पर संकट के बादल मंडराने लगे हैं।

राज्यसभा चुनाव का मतदान फॉर्मूला

राज्यसभा की चुनाव प्रक्रिया आम चुनावों से कहीं अधिक जटिल होती है। यहां 'सिंगल ट्रांसफरेबल वोट' (एसटीवी) प्रणाली के तहत मतदान होता है, जिसमें विधायक मतपत्र पर अपनी पहली, दूसरी और तीसरी प्राथमिकता दर्ज करते हैं। सबसे पहले प्रथम वरीयता के वोट गिने जाते हैं और जो भी उम्मीदवार 58 का कोटा छू लेता है, वह सीधे विजयी घोषित हो जाता है।

असली पेच तीसरी सीट पर दूसरी प्राथमिकता के वोटों के स्थानांतरण और गुप्त मतदान के कारण शुरू होगा। पार्टी व्हिप जारी होने के बावजूद आंतरिक असंतोष के चलते विधायकों के टूटने का जोखिम हमेशा बना रहता है। कांग्रेस को यही सबसे बड़ा डर सता रहा है, और यही वजह है कि पार्टी अपने विधायकों को सुरक्षित रखने के लिए कर्नाटक जैसे कांग्रेस शासित राज्यों में शिफ्ट करने की रणनीति बना रही है।

क्या केवट के पक्ष में पलट सकती है बाजी

जमीनी समीकरणों और भाजपा के आक्रामक रुख का विश्लेषण करें तो महेश केवट की जीत पूरी तरह इस बात पर निर्भर है कि कांग्रेस के भीतर असंतुष्ट कड़ियां कितनी कमजोर साबित होती हैं। यदि मतदान वाले दिन कांग्रेस के 9 से 11 विधायक पाला बदल लेते हैं या क्रॉस वोटिंग कर देते हैं, तो मीनाक्षी नटराजन का गणित पूरी तरह बिगड़ जाएगा और महेश केवट जीत दर्ज करते हुए संसद के उच्च सदन में पहुंच जाएंगे।

कुल मिलाकर साफ है कि महेश केवट की राज्यसभा यात्रा विधानसभा के भीतर पर्दे के पीछे होने वाले सियासी तालमेल और आंकड़ों के प्रबंधन पर टिकी है। कागजों पर भले ही कांग्रेस के पास 62-64 विधायकों के साथ तकनीकी बढ़त दिखती हो, लेकिन जमीनी हकीकत और भाजपा के पास उपलब्ध 47 से 49 वोटों का ठोस आधार इस मुकाबले को बेहद रोमांचक बना रहा है। 18 जून को होने वाला मतदान और उसी शाम आने वाले नतीजे तय करेंगे कि भाजपा का यह दांव सफल होता है और महेश केवट दिल्ली पहुंचते हैं, या फिर कांग्रेस अपनी सीट बचाने में कामयाब रहती है।

चेतन शुक्ला (Chetan Shukla) Print & Broadcast News Agency (PABNA) में 'मुख्य संपादक' हैं। वह पत्रकारिता में 15 वर्ष से ज्यादा का अनुभव रखते हैं। ये मूल रूप से उत्तर प्रदेश के रहने वाले हैं। इन्हें राजनीति और आम आदमी से जुड़ी खबरें लिखना पसंद है।

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