राजस्थान
एक घंटा पहले
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भीलवाड़ा की बेटी ने कथक में बिखेरा जलवा
आज के दौर में जब युवा पीढ़ी पश्चिमी नृत्य शैलियों और नए डांस फॉर्म्स की तरफ तेजी से आकर्षित हो रही है, तब भीलवाड़ा की स्तुति बिरला ने भारतीय शास्त्रीय नृत्य कथक के प्रति अपनी अटूट निष्ठा और प्रतिभा का प्रदर्शन किया है। स्तुति ने हाल ही में एक ऐसा कारनामा कर दिखाया है जिसने उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई है। उन्होंने बेहद कम समय में कथक की जटिल हस्त मुद्राओं का प्रदर्शन करते हुए इंडिया बुक ऑफ रिकॉर्ड्स में अपना नाम दर्ज कराया है। यह उपलब्धि न केवल उनके व्यक्तिगत समर्पण को दर्शाती है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का एक बड़ा स्रोत भी बनी है।
मात्र 22 सेकंड में 55 मुद्राओं का प्रदर्शन
स्तुति बिरला ने 22 सेकंड के भीतर 55 अलग-अलग कथक हस्त मुद्राओं को प्रदर्शित करके रिकॉर्ड कायम किया है। कथक शास्त्र के जानकारों के अनुसार, ये मुद्राएं आचार्य नंदीकेश्वर द्वारा वर्णित हैं, जिन्हें सटीक तरीके से प्रदर्शित करना एक कठिन कला है। इतनी कम अवधि में इतनी अधिक मुद्राओं को बिना किसी त्रुटि के प्रस्तुत करना स्तुति की गहन साधना और एकाग्रता को सिद्ध करता है। इस उपलब्धि को हासिल करना किसी चुनौती से कम नहीं था, लेकिन स्तुति ने अपने निरंतर अभ्यास और संकल्प के दम पर इसे मुमकिन कर दिखाया है।
10 वर्षों की तपस्या और गुरु का आशीर्वाद
स्तुति की इस कामयाबी के पीछे लगभग 10 वर्षों का लंबा संघर्ष और कड़ी मेहनत छिपी है। उनकी कथक गुरु रमा पचीसिया ने स्तुति की इस यात्रा के बारे में बात करते हुए कहा कि उन्होंने हमेशा अनुशासन और पूर्ण समर्पण के साथ नृत्य का अभ्यास किया है। गुरु के अनुसार, किसी भी शास्त्रीय विधा में निपुणता हासिल करने के लिए निरंतरता ही एकमात्र कुंजी है और स्तुति इसका सबसे उत्तम उदाहरण है। पिछले एक दशक से वे लगातार कथक की बारीकियों को सीख रही थीं, जिसका सुखद परिणाम आज राष्ट्रीय सम्मान के रूप में सामने आया है।
परिवार के सहयोग का महत्वपूर्ण योगदान
इस बड़ी सफलता का श्रेय स्तुति ने अपने गुरु के साथ-साथ अपने माता-पिता, सुनीता और सत्यनारायण बिरला को दिया है। स्तुति को बचपन से ही नृत्य के प्रति विशेष लगाव था, जिसे देखते हुए उनके परिवार ने उन्हें हर कदम पर प्रोत्साहित किया और उनका संबल बने। माता-पिता का कहना है कि उनकी बेटी की इस उपलब्धि से वे अत्यंत गौरवान्वित हैं और यह उनके पूरे परिवार के लिए बेहद खुशी का पल है। उनका मानना है कि सही मार्गदर्शन और घर के सहयोग से कोई भी लक्ष्य प्राप्त करना संभव है।
भविष्य के बड़े सपने
इंडिया बुक ऑफ रिकॉर्ड्स में अपना नाम दर्ज कराने के बाद स्तुति अब यहीं रुकने वाली नहीं हैं। उन्होंने स्पष्ट किया है कि वे आने वाले समय में राष्ट्रीय मंचों के अलावा अंतरराष्ट्रीय पटल पर भी भीलवाड़ा और राजस्थान की सांस्कृतिक विरासत का प्रतिनिधित्व करना चाहती हैं। उनकी यह यात्रा यह संदेश देती है कि यदि लक्ष्य स्पष्ट हो और उसे प्राप्त करने के लिए अटूट मेहनत की जाए, तो सफलता निश्चित रूप से कदम चूमती है। भीलवाड़ा जैसे छोटे शहर से निकलकर इतनी बड़ी उपलब्धि हासिल करने वाली स्तुति आज कई युवाओं के लिए एक मिसाल बन चुकी हैं, जो अपनी जड़ों से जुड़े रहकर भी ऊंचाइयों को छूने का सपना देखते हैं।
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