राजस्थान
एक घंटा पहले
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शहरों, कस्बों और गांवों में मंदिर सहज ही नजर आ जाते हैं, परंतु वनवासी इलाकों में धार्मिक स्थलों की संख्या तुलनात्मक रूप से कम देखने को मिलती है। इसी कमी को दूर करते हुए सनातन संस्कृति के संरक्षण और धार्मिक चेतना को विस्तार देने के उद्देश्य से भीलवाड़ा के संत महामंडलेश्वर स्वामी हंसराम उदासीन महाराज ने एक विशिष्ट पहल की है। उनके निर्देशन में जनजातीय अंचलों में हनुमान मंदिरों की स्थापना का अभियान आरंभ किया गया है।
प्रथम चरण में 61 प्रतिमाएं रवाना
हंसगंगा हरिशेवा चैरिटेबल ट्रस्ट एवं हरि शेवा धर्मशाला की ओर से भारत माता भक्ति धाम को तीन फीट ऊंचाई वाली 61 हनुमान जी की प्रतिमाएं, 61 रामचरितमानस और 600 हनुमान चालीसा भेंट किए गए हैं। इन प्रतिमाओं की स्थापना डूंगरपुर, बांसवाड़ा तथा आसपास के वनवासी क्षेत्रों में की जाएगी। अभियान का मूल ध्येय जनजातीय समाज को उसकी धार्मिक एवं सांस्कृतिक विरासत से पुनः जोड़ना है।
वैदिक मंत्रोच्चार के साथ हुआ पूजन
प्रतिमाओं को रवाना करने से पूर्व हरि शेवा उदासीन आश्रम सनातन मंदिर में वैदिक मंत्रोच्चार के बीच विधि-विधान से पूजन-अर्चन संपन्न हुआ। विद्वान पंडितों ने धार्मिक रीति-रिवाजों के अनुरूप प्रतिमाओं का अभिषेक एवं पूजन कराया। इसके पश्चात श्रद्धालुओं की उपस्थिति में प्रतिमाओं को वनवासी क्षेत्रों के लिए विदा किया गया।
101 प्रतिमाओं की स्थापना का लक्ष्य
महामंडलेश्वर स्वामी हंसराम उदासीन महाराज ने बताया कि कुल 101 हनुमान प्रतिमाएं स्थापित करने का लक्ष्य तय किया गया है। पहले चरण में 61 प्रतिमाएं भेजी गई हैं, जबकि शेष प्रतिमाओं को आने वाले समय में विभिन्न जनजातीय क्षेत्रों में स्थापित किया जाएगा। उनका कहना है कि मंदिर केवल पूजा-अर्चना का स्थल नहीं होता, बल्कि वह समाज को एकजुट करने और संस्कारों को आगे बढ़ाने का केंद्र भी बनता है।
सांस्कृतिक चेतना और समरसता को बल
स्वामी हंसराम उदासीन महाराज के अनुसार, वनवासी क्षेत्रों में धार्मिक गतिविधियों तथा मंदिरों की स्थापना से सनातन संस्कृति के प्रति लोगों में जागरूकता बढ़ेगी। साथ ही युवाओं और बच्चों को अपनी परंपराओं, धार्मिक ग्रंथों एवं सांस्कृतिक मूल्यों की जानकारी प्राप्त होगी। इस अभियान से सामाजिक समरसता और सांस्कृतिक चेतना को भी मजबूती मिलेगी।
बांसवाड़ा परियोजना के प्रमुख प्रचारक धर्मराज जी भाईसाहब भी इस अभियान में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। ट्रस्ट का मानना है कि यह पहल जनजातीय समाज को अपनी जड़ों से जोड़ने और सनातन संस्कृति के संरक्षण में महत्वपूर्ण योगदान सिद्ध होगी।
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