संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत की दावेदारी को मिला बांग्लादेश का साथ, सुधारों की मांग पर नई बहस राष्ट्रीय राजनीति एक घंटा पहले 4
संयुक्त राष्ट्र महासभा के नए अध्यक्ष खलीलुर रहमान ने सुरक्षा परिषद में सार्थक सुधारों की वकालत की है। उन्होंने स्पष्ट किया कि 1945 के दौर की व्यवस्था वर्तमान वैश्विक चुनौतियों के लिए अपर्याप्त है, जो कि भारत की लंबे समय से चली आ रही मांग के साथ मेल खाती है।

वैश्विक मंच पर भारत और बांग्लादेश एक सुर में

अंतरराष्ट्रीय राजनीति के सबसे बड़े मंच संयुक्त राष्ट्र में एक नई हलचल देखने को मिल रही है। भारत लंबे समय से संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद यानी UNSC में व्यापक सुधारों की वकालत करता रहा है, ताकि विकासशील देशों को वैश्विक निर्णय लेने वाली इस संस्था में उचित प्रतिनिधित्व मिल सके। अब इसी दिशा में बांग्लादेश ने भारत के सुर में सुर मिलाते हुए अपना समर्थन स्पष्ट किया है। संयुक्त राष्ट्र महासभा के नवनियुक्त अध्यक्ष खलीलुर रहमान ने भी सुरक्षा परिषद में बदलाव की आवश्यकता पर जोर दिया है, जो भारत के लिए एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक संकेत माना जा रहा है।

सार्थक सुधारों पर जोर

संयुक्त राष्ट्र महासभा के 81वें सत्र की कमान संभालते ही खलीलुर रहमान ने सुधारों के एजेंडे को प्राथमिकता दी है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि संयुक्त राष्ट्र के भीतर किए जाने वाले बदलाव केवल दिखावे के लिए नहीं होने चाहिए, बल्कि वे सार्थक और प्रभावी होने चाहिए। रहमान के अनुसार, अगर सुधारों का उद्देश्य केवल नाममात्र का बदलाव है, तो उनसे दुनिया का भरोसा बहाल नहीं हो पाएगा। उन्होंने जोर देकर कहा कि सुधार ऐसे होने चाहिए जिनसे संगठन का अंतरराष्ट्रीय विश्वास फिर से मजबूत हो सके और वह भविष्य की चुनौतियों से निपटने के लिए पूरी तरह सक्षम बने। खलीलुर रहमान ने मंगलवार, 9 सितंबर 2026 को आधिकारिक रूप से अपना पद संभाला है।

1945 की व्यवस्था अब पुरानी

सुरक्षा परिषद की प्रासंगिकता पर बात करते हुए खलीलुर रहमान ने एक बड़ी टिप्पणी की। उन्होंने याद दिलाया कि वर्तमान संयुक्त राष्ट्र व्यवस्था की नींव 1945 के सैन फ्रांसिस्को सम्मेलन में रखी गई थी। उन्होंने कहा कि आज की दुनिया 1945 वाली दुनिया से बिल्कुल अलग है। उन्होंने स्पष्ट किया, 'हम अब उस दौर में नहीं जी रहे हैं। 21वीं सदी की दुनिया बदल चुकी है और संयुक्त राष्ट्र को बने हुए 80 साल से ज्यादा का समय हो चुका है। इसलिए अब समय के साथ बदलाव करना अपरिहार्य हो गया है। संगठन को आगे बढ़ना होगा और मैं इस प्रक्रिया में सक्रिय भूमिका निभाने के लिए तैयार हूं।'

भारत की पुरानी मांग और आज की हकीकत

भारत का दृष्टिकोण हमेशा से यही रहा है कि मौजूदा वैश्विक ढांचा आज की वास्तविकताओं को नहीं दर्शाता है। संयुक्त राष्ट्र में सुधारों को लेकर भारत ने बार-बार यह रेखांकित किया है कि सुरक्षा परिषद में विकासशील देशों की आवाज दबा दी जाती है। खलीलुर रहमान का यह रुख पूरी तरह से भारत की उस मांग के अनुरूप है, जिसमें सुरक्षा परिषद के विस्तार और उसमें बदलाव की बात कही गई है। संयुक्त राष्ट्र महासभा के अध्यक्ष का यह बयान भारत के दावे को और अधिक मजबूती प्रदान करता है।

UN80 पहल का समर्थन

खलीलुर रहमान ने यह भी स्पष्ट किया है कि वह संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस की 'UN80' पहल को अपना पूरा समर्थन जारी रखेंगे। इस पहल का मुख्य उद्देश्य संयुक्त राष्ट्र की कार्यप्रणाली को अधिक सरल, प्रभावी और परिणामोन्मुखी बनाना है। उन्होंने स्वीकार किया कि वर्तमान में संगठन के सामने भरोसे की कमी एक बहुत बड़ी चुनौती है। यदि इस संकट का समाधान करना है, तो संगठन को गहरे और संरचनात्मक सुधारों से गुजरना होगा, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि भविष्य की पीढ़ियों के लिए संयुक्त राष्ट्र एक मजबूत स्तंभ बना रहे।

सहयोग और कूटनीतिक बातचीत

भविष्य की रणनीति पर चर्चा करते हुए खलीलुर रहमान ने बताया कि उनका कार्यकाल सहयोग और आपसी बातचीत पर केंद्रित रहेगा। हालांकि उन्होंने यह भी माना कि वैश्विक स्तर पर मौजूद सभी समस्याओं का समाधान तुरंत नहीं निकाला जा सकता और न ही हर मुद्दे पर तत्काल सहमति बन सकती है। उन्होंने कहा कि कुछ मामले जटिल होते हैं और उनके समाधान में समय लग सकता है, लेकिन देशों को अपनी बातचीत जारी रखनी चाहिए ताकि साझा रास्तों की तलाश की जा सके।

अध्यक्ष पद का बदलाव

गौरतलब है कि खलीलुर रहमान को जून महीने में ही महासभा के 81वें सत्र का अध्यक्ष चुन लिया गया था। उन्होंने जर्मनी की पूर्व विदेश मंत्री एनालेना बेयरबॉक का स्थान लिया है। 8 सितंबर को संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में सत्र शुरू होने के बाद से ही उन्होंने सुधारों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता जाहिर कर दी है। बांग्लादेश के विदेश मंत्री के रूप में कार्य करने का उनका पिछला अनुभव निश्चित रूप से उन्हें वैश्विक कूटनीति की बारीकियों को समझने और उन पर काम करने में मदद करेगा। अब दुनिया की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि क्या रहमान के नेतृत्व में सुरक्षा परिषद वास्तव में बड़े बदलावों की ओर कदम बढ़ा पाएगी।

देवेंद्र पांडेय पाबना के राजनीतिक संवाददाता हैं और राष्ट्रीय राजनीति, सरकार तथा नीतियों पर रिपोर्टिंग करते हैं। चुनाव, संसद और बड़े सियासी घटनाक्रमों का वे गहराई से विश्लेषण करते हैं। उनकी रिपोर्टिंग निष्पक्ष और तथ्यों पर आधारित होती है।

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