उत्तर प्रदेश
एक घंटा पहले
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विचारों
बलिया के एक गरीब परिवार पर दुखों का ऐसा पहाड़ टूटा है कि मानो पूरा घर ही बिखर गया हो। बेटे की पीड़ा, कर्ज का बोझ और व्यवस्था में कथित भ्रष्टाचार — इन तीनों के बीच परिवार रो-रोकर न्याय की गुहार लगा रहा है। यह कहानी सिस्टम पर कई गंभीर सवाल खड़े करती है।
हाईस्कूल की परीक्षा दे रहा 17 वर्षीय छात्र बेहतर भविष्य के सपने देख रहा था, लेकिन गांव के ही एक व्यक्ति की लापरवाही ने उसकी जिंदगी को बेहाल कर दिया। हादसे में किशोर का एक पूरा अंग बेकार हो गया है और दोनों पैर जल गए हैं।
कैसे हुआ हादसा
पीड़ित किशोर शुभम की मां रिंकू देवी रोते-बिलखते बताती हैं कि वह जनपद बलिया के सुखपुरा थाना क्षेत्र के मिड्ढा गांव की रहने वाली हैं। उनके मुताबिक खेत में सीसीटीवी लगाने के काम के लिए गांव के ही रहने वाले मुन्ना सिंह उनके नाबालिग बेटे को जबरन अपने साथ ले गए।
परिवार ने बार-बार मना भी किया कि शाम हो चुकी है, अभी रहने दीजिए, लेकिन उनकी एक न सुनी गई। काम के दौरान ही खेत में 11 हजार वोल्ट की हाईटेंशन लाइन की चपेट में आने से छात्र गंभीर रूप से झुलस गया। साथ ले जाने वाला शख्स उसे बचाने में नाकाम रहा और आसपास के लोगों की मदद से किसी तरह उसकी जान बचाई गई। इसके बाद से बच्चे की हालत लगातार बिगड़ती चली गई।
बलिया से बीएचयू तक का सफर
शुभम के पिता राजू ने बताया कि करीब रात साढ़े सात बजे उनके बेटे को यह कहकर काम पर ले जाया गया कि छोटी-मोटी मदद करनी है। हादसे के तुरंत बाद आनन-फानन में उसे जिला अस्पताल बलिया पहुंचाया गया, जहां डेढ़ महीने तक इलाज चला।
परिवार का आरोप है कि डॉक्टर ने बेहतर इलाज के लिए बच्चे को बीएचयू ले जाने की सलाह दी। इस पर गरीब परिवार आयुष्मान कार्ड चालू कराने के लिए जिला अस्पताल पहुंचा, लेकिन परिवार के मुताबिक वहां भी उसके साथ धोखा हुआ।
आयुष्मान कार्ड से 75 हजार की कटौती
परिवार का कहना है कि खून चढ़ाने और इलाज के दौरान आयुष्मान कार्ड का इस्तेमाल कराया गया, लेकिन बाद में पता चला कि कार्ड से करीब 75 हजार रुपए निकाल लिए गए हैं। पूछताछ करने पर परिवार को बताया गया कि यह रकम बाहर से मंगाई गई दवा और इंजेक्शन के लिए काटी गई है।
परिवार का यह भी आरोप है कि जिला अस्पताल शुरू से ही बाहर की दवा लिखने को लेकर बदनाम रहा है, जबकि सरकारी अस्पताल में बाहर से दवा लिखना मना है।
गरीब परिवार से इतनी रकम क्यों?
अब बड़ा सवाल यह है कि जब जिला अस्पताल सरकारी है, तो आखिर एक गरीब परिवार के आयुष्मान कार्ड से इतनी बड़ी रकम क्यों काटी गई। पीड़ित परिवार का आरोप है कि उन्हें इस बारे में कोई स्पष्ट जानकारी तक नहीं दी जा रही।
दूसरी ओर, जिस व्यक्ति के साथ किशोर काम पर गया था, उसने भी हादसे के बाद जिम्मेदारी से हाथ खड़े कर दिए हैं। बेहतर इलाज के लिए लड़के को वाराणसी रेफर किया गया था, लेकिन फिलहाल परिवार उसका इलाज घर पर ही करा रहा है।
कर्ज में डूबा परिवार, न्याय की दरकार
पिछले तीन महीनों से परिवार कर्ज में डूबा हुआ है। घर की आर्थिक हालत इतनी खराब है कि दो वक्त की रोटी जुटाना भी मुश्किल हो गया है। मां की आंखों से आंसू नहीं रुकते और पिता हर दरवाजे पर न्याय की उम्मीद लेकर भटक रहे हैं। पिता मजदूरी करते हैं और मां घर-घर जाकर बर्तन साफ करती हैं।
यह मामला केवल एक गरीब परिवार का नहीं, बल्कि उन सवालों का आईना है जो नाबालिगों से मजदूरी कराने, हादसों की जिम्मेदारी तय करने और सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं में पारदर्शिता को लेकर उठ रहे हैं। परिवार की मांग है कि प्रशासन पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराकर दोषियों पर कार्रवाई करे, आयुष्मान कार्ड से हुई कटौती की सच्चाई सामने लाए और पीड़ित परिवार को आर्थिक सहायता एवं न्याय दिलाए।
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