पाकिस्तान
एक घंटा पहले
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विचारों
पाकिस्तान का बदला हुआ रुख और सेना की नई रणनीति
पाकिस्तान लंबे समय से दुनिया भर में आतंकवाद और कट्टरपंथ को पनाह देने के आरोपों से घिरा रहा है। वहां की सत्ता और शक्तिशाली सेना ने वर्षों तक इन कट्टरपंथी समूहों को अपने राजनीतिक और सामरिक हितों के लिए खाद-पानी देने का काम किया। लेकिन अब हालात बदल रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय जगत में अपनी साख सुधारने और वैश्विक आकाओं के करीब आने के लिए पाकिस्तान अब उन्हीं कट्टरपंथियों पर चाबुक चला रहा है, जिन्हें कभी उसने खुद खड़ा किया था।
पाकिस्तान के आर्मी चीफ आसिम मुनीर ने खुद कमान संभालते हुए उस 'शैतान' को नियंत्रित करने का जिम्मा उठाया है, जिसे पाकिस्तान की सुरक्षा एजेंसियां पहले शह देती रही थीं। इसकी एक बानगी बीते महीने कराची में देखने को मिली। जब एक ईसाई परिवार पर ईशनिंदा के बेबुनियाद आरोप लगाए गए, तो वहां सैकड़ों लोगों की भीड़ जमा हो गई और हिंसा की साजिश रची जाने लगी। भीड़ का इरादा परिवार को जान से मारने का था। पुलिस को पता था कि चार महिलाओं और एक बच्चे की जान बचाने के लिए उनके पास बहुत कम समय है। वर्ष 1990 के बाद से पाकिस्तान में ईशनिंदा के मामलों में करीब 90 लोग मॉब लिंचिंग का शिकार हो चुके हैं।
कराची का वाकया और पुलिस की नई सक्रियता
जब पुलिस अधिकारी संघार अली मलिक अपनी टीम के साथ मौके पर पहुंचे, तो उन्होंने देखा कि भीड़ उग्र थी, लेकिन वहां कट्टरपंथी संगठनों के वे नेता गायब थे जो आमतौर पर ऐसे दंगों को भड़काते हैं। रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, सेना के नेतृत्व में चल रहे क्रैकडाउन का यह सीधा असर था कि इस वर्ष ईशनिंदा के मामलों में करीब दो-तिहाई की कमी दर्ज की गई है। अधिकारी मलिक ने भीड़ को कानून हाथ में न लेने की चेतावनी दी और कुरान की आयतों का हवाला देकर उन्हें शांत करने का प्रयास किया। हैरान करने वाली बात यह रही कि भीड़ ने उनकी बात सुनी और बिना किसी बड़ी हिंसा के वहां से छंट गई। यह संकेत था कि इन समूहों को अब सैन्य समर्थन मिलना बंद हो गया है।
पश्चिमी देशों के साथ रिश्ते सुधारने की कवायद
विशेषज्ञों का कहना है कि पाकिस्तान की सेना ने दशकों तक इन कट्टरपंथी गुटों का इस्तेमाल नागरिक सरकार पर दबाव बनाने और दुश्मन देशों के खिलाफ तनाव पैदा करने के लिए किया था। हालांकि, सुरक्षा और सरकारी तंत्र से जुड़े चार प्रमुख सूत्रों ने पुष्टि की है कि आसिम मुनीर की देखरेख में चलाए जा रहे अभियानों के चलते ये संगठन अब बैकफुट पर हैं। पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था इस समय गहरी खाई में है और उसे वैश्विक बाजारों से जुड़ने की सख्त जरूरत है। यही कारण है कि सेना प्रमुख अब अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के साथ निजी संबंधों को मजबूत करने में जुटे हैं। इस्लामाबाद के संबंध अब अपने पुराने सहयोगी अफगान तालिबान से भी खराब हो चुके हैं, जिससे मुनीर की प्राथमिकताएं बदल गई हैं।
ज़ीरो टॉलरेंस की नीति
आसिम मुनीर के करीबी सूत्रों का कहना है कि सेना प्रमुख इस बात को लेकर पूरी तरह स्पष्ट हैं कि एक तरक्कीपसंद पाकिस्तान और ये कट्टरपंथी संगठन साथ-साथ नहीं चल सकते। परमाणु हथियारों से लैस पाकिस्तान की अंतरराष्ट्रीय छवि सुधारने के लिए उन्होंने कट्टरपंथियों के खिलाफ जीरो टॉलरेंस यानी किसी भी तरह की रियायत न देने की नीति अपनाई है। गृह राज्य मंत्री तलाल चौधरी ने बताया कि राज्य ने अपने पुराने कड़वे अनुभवों से सबक सीखा है और अब सेना व सरकार पूरी तरह एक ही दिशा में काम कर रहे हैं। उनका उद्देश्य ऐसे हर समूह को खत्म करना है जो देश या जनता को अपनी शर्तों पर बंधक बनाने का प्रयास करता है।
आंकड़ों में दिख रहा बदलाव
स्वतंत्र संस्था ह्यूमन राइट्स कमीशन ऑफ पाकिस्तान के अनुसार, इस सख्ती का परिणाम जमीन पर दिखाई दे रहा है। इस साल अब तक ईशनिंदा के दर्ज मामलों की संख्या घटकर मात्र 13 रह गई है, जो बीते कुछ वर्षों की तुलना में करीब दो-तिहाई कम है। इसके अलावा, संघर्षों पर नजर रखने वाली वैश्विक संस्था ACLED के आंकड़े बताते हैं कि जहां वर्ष 2021 से 2024 के बीच पाकिस्तान में हर साल औसतन 7 से ज्यादा ईशनिंदा दंगे या हमले होते थे, वहीं बीते 12 महीनों में ऐसी केवल 1 घटना सामने आई है।
जनरल मुनीर और उनकी चुनौतियां
आसिम मुनीर एक इमाम के बेटे हैं और खुद भी काफी रूढ़िवादी माने जाते हैं। बावजूद इसके, वे देश को बदलने की कोशिश कर रहे हैं। उन्हें अमेरिका, चीन और सऊदी अरब के साथ संबंधों को संतुलित करने के साथ-साथ देश के भीतर चरमराई अर्थव्यवस्था और आंतरिक विद्रोहों का सामना करना पड़ रहा है। बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा जैसे खनिज समृद्ध इलाकों में बढ़ते विद्रोहों के कारण उन पर अतिरिक्त दबाव है। उन्होंने पिछले साल अमेरिकी सरकार को इन क्षेत्रों में निवेश का प्रस्ताव भी दिया था।
अंत में, कराची वाले मामले में जिस ईसाई परिवार को पुलिस ने बचाया, वे सुरक्षित हैं और जांच में उन पर लगे आरोप झूठे साबित हुए हैं। हालांकि, अल्पसंख्यकों के मन में अभी भी डर है, लेकिन इस बदलाव को वे किसी चमत्कार से कम नहीं मान रहे हैं। यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या यह बदलाव स्थायी है या केवल एक रणनीतिक दिखावा।
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