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एक घंटा पहले
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संयुक्त राष्ट्र के मंच पर शहबाज शरीफ का पुराना और घिसा-पिटा अंदाज
संयुक्त राष्ट्र महासभा यानी यूएनजीए (UNGA) का आयोजन हर साल अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के एक बड़े मंच के रूप में जाना जाता है। पूरी दुनिया के प्रमुख नेता यहां आकर अपने देश की नीतियों और वैश्विक चुनौतियों पर गंभीर चर्चा करते हैं, लेकिन पाकिस्तान के प्रधानमंत्री के लिए यह मंच अक्सर अपनी विफलताओं को छिपाने और दुनिया के सामने एक नई अपील पेश करने का जरिया बन जाता है। इस बार भी मियां शहबाज शरीफ अपने पूरे काफिले के साथ न्यूयॉर्क पहुंचे। उनके हाथ में वही पुराना और जग-जाहिर ‘भीख का कटोरा’ था, बस इस बार उन्होंने अपनी रणनीति बदली थी और उस पर ‘क्लाइमेट चेंज’ यानी जलवायु परिवर्तन और ‘ग्लोबल मध्यस्थता’ का एक नया आवरण चढ़ाया हुआ था। अपने घर के अंदरूनी संकटों से जूझ रहे शहबाज शरीफ ने दुनिया को यह दिखाने की कोशिश की कि वे वैश्विक समस्याओं को लेकर कितने चिंतित हैं, लेकिन उनके पूरे भाषण में भारत का नाम बार-बार लिया जाना उनकी हताशा को बयां कर रहा था। लगभग 23 मिनट तक चले उनके इस भाषण ने वहां मौजूद दुनिया भर के प्रतिनिधियों को यह सोचने पर मजबूर कर दिया होगा कि यह किसी देश के प्रधानमंत्री का आधिकारिक वक्तव्य है या फिर किसी इवेंट मैनेजमेंट फर्म द्वारा तैयार किया गया एक प्रचार शो।
सेना प्रमुख असीम मुनीर के पीआर एजेंट की भूमिका में शहबाज
भाषण की शुरुआत से ही ऐसा प्रतीत हुआ जैसे शहबाज शरीफ एक स्वतंत्र राष्ट्र के प्रधानमंत्री के बजाय पाकिस्तानी सेना के प्रमुख और फील्ड मार्शल असीम मुनीर के व्यक्तिगत पीआर मैनेजर की भूमिका निभा रहे हों। मंच पर पहुंचते ही उन्होंने पश्चिम एशिया के तनाव और ईरान तथा अमेरिका के बीच हुई कथित ‘इस्लामाबाद एमओयू’ (MoU) का उल्लेख कर अपनी पीठ थपथपानी शुरू कर दी। उन्होंने ऐसा व्यवहार किया मानो दुनिया में शांति बनाए रखने का सारा जिम्मा अकेले पाकिस्तान के कंधों पर है। गौर करने वाली बात यह है कि जिस देश की अपनी अर्थव्यवस्था बदहाल है, जहां लोग दाने-दाने के लिए मोहताज हैं और देश में हर दूसरे दिन गृहयुद्ध जैसे हालात बन जाते हैं, वह देश अमेरिका और ईरान के बीच मध्यस्थता कराने का दावा कर रहा था। शहबाज ने अपनी पूरी स्पीच के दौरान असीम मुनीर की ‘अथक कोशिशों’ का इतना गुणगान किया कि ऐसा लगा कि वह संयुक्त राष्ट्र के मंच से नहीं, बल्कि असीम मुनीर के किसी प्रमोशन इवेंट से संबोधित कर रहे हैं। जिस मोर्चे पर पाकिस्तान की तथाकथित कूटनीति पूरी तरह फ्लॉप साबित हो चुकी है, वहां भी मुनीर को हीरो बनाकर पेश करना उनकी लाचारी को दिखाता है।
‘ऑपरेशन सिंदूर’ का खौफ और डोनाल्ड ट्रंप की चापलूसी
पूरे भाषण के दौरान शहबाज शरीफ के चेहरे पर भारत के प्रति एक गहरा खौफ साफ नजर आ रहा था। ऐसा लग रहा था कि वे ‘ऑपरेशन सिंदूर’ की दहशत से अभी तक उभर नहीं पाए हैं। आपको याद होगा कि पिछले साल पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद भारत ने पाकिस्तान और पीओके (PoK) में छिपे आतंकवादियों के अड्डों को निशाना बनाया था और ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के जरिए उन्हें पूरी तरह तबाह कर दिया था। उस कार्रवाई की यादें आज भी पाकिस्तान के सत्ता गलियारों को डरा रही हैं। अपने भाषण में शहबाज बार-बार पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को याद करते रहे और समय पर हस्तक्षेप करने के लिए उनका हजारों बार शुक्रिया अदा किया। उन्होंने कहा कि अगर ट्रंप साहब ने समय रहते कदम नहीं उठाया होता, तो दो परमाणु शक्तियों के बीच भारी तबाही मच जाती। मजे की बात यह है कि भारत ने शुरुआत से ही स्पष्ट किया है कि इसमें किसी तीसरे देश की मध्यस्थता का कोई स्थान नहीं था और भारत ने अपनी शर्तों पर आतंकियों को सबक सिखाया था। शहबाज शरीफ अपनी काल्पनिक जीत के मनगढ़ंत किस्से सुनाकर दुनिया को गुमराह करने और खुद की व असीम मुनीर की साख बचाने की एक असफल कोशिश कर रहे थे।
सिंधु नदी की प्यास और कश्मीर का राग
संयुक्त राष्ट्र में पाकिस्तान के नेताओं का आना और कश्मीर का नाम न लेना, यह संभव नहीं है। शहबाज शरीफ ने एक बार फिर करीब 80 साल पुराना अपना घिसा-पिटा कैसेट बजाया और कश्मीर में जनमत संग्रह तथा मानवाधिकारों का रोना रोया। हालांकि, इस बार उनके दुख में एक और नया बिंदु जुड़ गया था, जो सिंधु जल संधि से संबंधित था। जब से भारत ने आतंकवाद को लेकर कड़ा रुख अपनाते हुए सिंधु जल संधि को होल्ड पर डालने के संकेत दिए हैं, पाकिस्तान के हुक्मरानों की हालत खराब है। शहबाज ने यूएनजीए के मंच से भारत को सलाह दी कि वे पानी को हथियार न बनाएं और नदियां देशों को जोड़ती हैं न कि तोड़ती हैं। अब सवाल यह उठता है कि जब पाकिस्तान की धरती से आतंकवाद को हथियार बनाकर भारत में मासूमों का खून बहाया जा रहा था, तब उनका यह मानवतावादी ज्ञान कहां था? भारत ने बहुत पहले ही स्पष्ट कर दिया है कि जब तक आतंकवाद का केंद्र पूरी तरह समाप्त नहीं होगा, पानी की एक बूंद के लिए भी पाकिस्तान को तरसना पड़ सकता है।
क्लाइमेट चेंज के नाम पर ‘भीख का कटोरा 2.0’
शहबाज शरीफ के भाषण का सबसे दिलचस्प हिस्सा उनका नया आर्थिक फॉर्मूला था, जिसे ‘भीख का कटोरा 2.0’ कहा जा सकता है। उन्होंने दुनिया से फंड ऐंठने के लिए एक नया हाई-टेक रास्ता अपनाया। उन्होंने तर्क दिया कि पाकिस्तान दुनिया के कुल प्रदूषण का 1% भी पैदा नहीं करता है, फिर भी उसे जलवायु परिवर्तन का सबसे अधिक नुकसान भुगतना पड़ रहा है। उन्होंने विकसित देशों से मांग की कि वे पाकिस्तान को फंड दें और यह पैसा उन्हें ‘हक’ के साथ मिलना चाहिए। उन्होंने मांग की कि क्लाइमेट चेंज के नाम पर यह पैसा जल्द से जल्द ट्रांसफर किया जाना चाहिए। यह वास्तव में उनकी नकारा नीतियों को छिपाने का एक तरीका है। देश की अर्थव्यवस्था खराब हो, आईएमएफ (IMF) के सामने कर्ज के लिए नाक रगड़नी पड़े, तो उसका सारा दोष जलवायु परिवर्तन पर मढ़ दो और दुनिया से पैसे मांगते रहो।
दुनिया को उपदेश और खुद के घर में आग
अपने 23 मिनट के भाषण में शहबाज ने भारत के राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS), ‘हिंदुत्व’, इस्लामियाफोबिया, गाजा और पश्चिम एशिया के हालात पर लंबी चौड़ी बात की। लेकिन जैसे ही बात उनके पड़ोसी देश अफगानिस्तान की आई, उनकी सारी हेकड़ी निकल गई। उन्होंने रोना शुरू कर दिया कि अफगानिस्तान की धरती से टीटीपी (TTP) के आतंकवादी पाकिस्तान पर हमले कर रहे हैं। जो देश दशकों से दुनिया भर के लिए आतंकवाद की नर्सरी बना हुआ था, आज वही देश जब खुद के बोए हुए कांटों से घायल हो रहा है, तो दूसरों से शांति की भीख मांग रहा है। कुल मिलाकर, शहबाज शरीफ का यह भाषण एक सुपरफ्लॉप कॉमेडी शो जैसा था, जिसमें घरेलू विफलताओं को छुपाने के लिए असीम मुनीर का महिमामंडन, भारत के ‘ऑपरेशन सिंदूर’ का डर और ‘क्लाइमेट चेंज’ के नाम पर नए कटोरे की नुमाइश की गई थी। पाकिस्तान की आज की कूटनीति का संदेश साफ है- हमें बस फंड दे दो, चाहे वह क्लाइमेट के नाम पर ही क्यों न हो।
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