चिड़ियों की भाषा समझने की कमाल की खोज: वैज्ञानिक जूली एली ने जीता लाखों का इनाम विश्व 2 महीने पहले 82
कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी की वैज्ञानिक डॉ. जूली एली ने जेब्रा फिंच चिड़िया की भाषा को डिकोड कर एक बड़ी उपलब्धि हासिल की है, जिसके लिए उन्हें प्रतिष्ठित कॉलर-डुलिटिल प्राइज से नवाजा गया है।

पक्षी और इंसान के बीच संवाद की नई शुरुआत

क्या आपने कभी सोचा है कि पक्षियों की चहचहाहट के पीछे क्या अर्थ छिपा होता है? अब इंसानों और जानवरों के बीच सीधी बातचीत का सपना धीरे-धीरे हकीकत में बदल रहा है। कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी बर्कले की प्रसिद्ध वैज्ञानिक डॉ. जूली एली ने पक्षियों की गुप्त भाषा को डिकोड करने में अद्भुत सफलता प्राप्त की है। इस क्रांतिकारी शोध के लिए उन्हें 1 लाख डॉलर यानी करीब 94.4 लाख रुपये का प्रतिष्ठित कॉलर-डुलिटिल प्राइज प्रदान किया गया है। जूली ने जेब्रा फिंच नाम की चिड़िया पर वर्षों तक गहराई से रिसर्च की है और पक्षियों के पूरे शब्दकोश को दुनिया के सामने रखा है। अब यह साबित हो चुका है कि पक्षी केवल बेतुकी आवाजें नहीं निकालते, बल्कि वे बाकायदा इंसानों की तरह बातचीत करते हैं, अपना परिचय देते हैं और अपने साथियों के साथ सूचनाओं का आदान-प्रदान भी करते हैं।

चिड़ियों की गुप्त भाषा का रहस्य

डॉ. जूली एली ने अपनी रिसर्च के दौरान जेब्रा फिंच पक्षियों की बातचीत के 11 मुख्य शब्दों को डिकोड करने में कामयाबी पाई है। इन शब्दों के जरिए चिड़िया न केवल अपनी विशिष्ट पहचान बताती हैं, बल्कि यह भी संकेत देती हैं कि वे वर्तमान में क्या गतिविधियां कर रही हैं। इन चिड़ियों के पास अपनी अलग पहचान होती है और दूसरी चिड़ियां केवल आवाज सुनकर ही समझ जाती हैं कि उनसे कौन बात कर रहा है। जूली ने पाया कि चिड़ियां केवल रटी-रटाई आवाजों की नकल नहीं करतीं, बल्कि उनके दिमाग में हर आवाज का एक निश्चित अर्थ होता है। वे इंसानों की भांति सोच-समझकर अपनी प्रतिक्रिया देती हैं। दिलचस्प बात यह है कि कभी-कभी ये चिड़ियां मिलते-जुलते अर्थ वाले शब्दों को लेकर भ्रमित भी हो जाती हैं, जो कि मानवीय बातचीत में होने वाली गलतियों के समान ही है।

मशीन लर्निंग का तकनीकी कमाल

इस जटिल शोध को पूरा करने के लिए जूली एली ने 15 साल तक निरंतर मेहनत की है। इस दौरान उन्होंने हजारों चिड़ियों की आवाजों को रिकॉर्ड किया और फिर उन पर मशीन लर्निंग एल्गोरिदम का प्रयोग किया। इस आधुनिक तकनीक ने पक्षियों की आवाजों का बहुत बारीकी से विश्लेषण किया। अपनी रिसर्च को पुख्ता करने के लिए जूली ने चिड़ियों पर कुछ विशेष प्रयोग भी किए। एक परीक्षण में चिड़ियों के सामने एक बटन लगाया गया, जिसे दबाने पर उन्हें अलग-अलग तरह की पक्षियों की आवाजें सुनाई देती थीं। इनमें से कुछ खास आवाजों को सुनने के बाद ही उन्हें भोजन के रूप में बीज मिलते थे। चिड़ियों ने बहुत जल्द ही यह सीख लिया कि कौन सी आवाजें फायदेमंद हैं और उन्होंने बेकार की आवाजों को बिल्कुल वैसे ही नजरअंदाज करना शुरू कर दिया, जैसे हम इंटरनेट पर किसी वीडियो को स्किप कर देते हैं।

क्या 2030 तक संभव होगी जानवरों से बातचीत?

यह प्रतिष्ठित प्राइज जेरेमी कॉलर फाउंडेशन और तेल अवीव यूनिवर्सिटी द्वारा संयुक्त रूप से दिया जाता है। इस फाउंडेशन ने जानवरों के साथ बातचीत के कोड को क्रैक करने के लिए 10 मिलियन डॉलर यानी लगभग 94.4 करोड़ रुपये का एक महाप्राइज भी रखा है। जूली एली के अलावा दुनिया भर के कई अन्य वैज्ञानिक भी इस दौड़ में शामिल हैं। उदाहरण के लिए, एक फ्रांसीसी टीम चूहों की अल्ट्रासोनिक आवाजों को समझने पर काम कर रही है, जबकि एक अन्य टीम बोनोबो बंदरों की भाषा का अध्ययन कर रही है, जो इंसानों की तरह वाक्यों को जोड़कर संवाद करते हैं। प्राइज के संस्थापक जेरेमी कॉलर का मानना है कि AI यानी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का क्षेत्र बहुत तेजी से विकसित हो रहा है। उन्होंने विश्वास जताया है कि साल 2030 तक इंसान और जानवर आपस में संवाद करने में सक्षम हो जाएंगे।

करण मल्होत्रा पाबना के अंतरराष्ट्रीय संवाददाता हैं, जो अमेरिका, यूरोप और एशिया की खबरें रिपोर्ट करते हैं। वैश्विक राजनीति, अर्थव्यवस्था और बड़े अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रमों पर वे नजर रखते हैं। उनकी रिपोर्ट्स दुनिया की हलचल को पाठकों तक तेजी से पहुंचाती हैं।

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