मिर्जापुर: वह रहस्यमयी मंदिर जहां औरंगजेब को झुकने पर मजबूर होना पड़ा, आज भी मौजूद है माफीनामा धर्म एक घंटा पहले 4
मिर्जापुर के चुनार किले में स्थित राजा भर्तहरि का समाधि स्थल अपने चमत्कारों के लिए मशहूर है। कहा जाता है कि यहां की दैवीय शक्तियों के आगे नतमस्तक होकर मुगल शासक औरंगजेब को न केवल माफी मांगनी पड़ी थी, बल्कि उसने मंदिर के रखरखाव के लिए आर्थिक सहायता का भी वादा किया था।

आध्यात्मिक नगरी मिर्जापुर और उसका गौरवशाली इतिहास

उत्तर प्रदेश का मिर्जापुर जिला अपनी धार्मिक और पौराणिक मान्यताओं के लिए पूरे देश में विख्यात है। यहाँ की मिट्टी में कई ऐसे रहस्य दबे हैं जो सदियों पुराने ऐतिहासिक घटनाक्रमों की गवाही देते हैं। मिर्जापुर के चुनार किले की ख्याति तो सर्वविदित है, लेकिन इसी किले के भीतर स्थित राजा भर्तहरि का समाधि स्थल एक अलग ही आध्यात्मिक ऊर्जा का केंद्र है। लोक मान्यता के अनुसार, राजा भर्तहरि ने इस स्थान की शांति और दिव्यता को देखकर यहाँ कठोर तपस्या की थी। इतिहास के पन्नों में यह स्थान उस घटना के लिए दर्ज है, जब मुगल बादशाह औरंगजेब अपनी विनाशकारी सोच के साथ यहाँ पहुँचा था, लेकिन उसे यहां की शक्तियों के आगे घुटने टेकने पड़े थे। कहा जाता है कि औरंगजेब ने अपनी गलती मानते हुए माफीनामा लिखा और मंदिर की व्यवस्था के लिए राजकोष से धनराशि देने की घोषणा भी की थी।

राजा भर्तहरि का वैराग्य और तपस्या

मंदिर के पुजारी राजाराम गोश्वामी ने इस स्थान के पौराणिक महत्व को साझा करते हुए बताया कि राजा भर्तहरि उज्जैन के राजा विक्रमादित्य के बड़े भाई थे। एक समय ऐसा आया जब वे अपना वैभवशाली साम्राज्य त्यागकर गुरु गोरखनाथ के दिखाए मार्ग पर चल पड़े। उन्होंने सांसारिक सुखों का मोह छोड़कर आध्यात्म का रास्ता चुना और सिद्धि प्राप्त करने के लिए चुनार के किले के समीप आ गए। इस स्थान की विशेषता यह है कि यहाँ गंगा नदी उत्तरवाहिनी होकर बहती है। इसी शांत और प्राचीन वातावरण को चुनकर उन्होंने अपनी तपोस्थली बनाई और साधना शुरू की। कहते हैं कि उन्हें खोजने के लिए उनके भाई राजा विक्रमादित्य भी यहाँ पहुँचे थे। उन्होंने भर्तहरि को वापस ले जाने का बहुत प्रयास किया, लेकिन वे अपने मार्ग पर अडिग रहे। बाद में राजा विक्रमादित्य ने ही इस किले की चारदीवारी का निर्माण करवाया था।

जब औरंगजेब की सेना पर हुआ भौरों का हमला

पुजारी राजाराम गोश्वामी के अनुसार, 1660 ईस्वी के बाद औरंगजेब पूर्वांचल के दौरे पर था। उस समय उसने करीब 10 वर्षों से अधिक के कार्यकाल में इस क्षेत्र के दर्जनों धार्मिक स्थलों को खंडित किया। जब वह चुनार किले में राजा भर्तहरि के समाधि स्थल को तोड़ने पहुँचा, तो उसने अहंकार में भरकर कहा कि अगर यहाँ कोई दैवीय शक्ति है, तो उसे महसूस कराया जाए। औरंगजेब ने जैसे ही समाधि स्थल के मुख्य विग्रह को नुकसान पहुँचाने का आदेश दिया, चमत्कारिक रूप से काले भौरों का एक विशाल झुंड सेना पर टूट पड़ा। अपनी सेना को बचाने के लिए औरंगजेब ने उन पर गर्म तेल डलवाने का आदेश दिया। कहा जाता है कि जितना अधिक गर्म तेल डाला जाता, उतने ही अधिक भौरे वहां प्रकट हो जाते थे। भौरों के इस भीषण हमले से औरंगजेब बुरी तरह घबरा गया और उसे यहां की अलौकिक शक्तियों का आभास हो गया।

आज भी मौजूद है औरंगजेब का माफीनामा

अपनी हार स्वीकार करते हुए औरंगजेब ने मंदिर को पूरी तरह नष्ट करने के बजाय, उसे चार खंभों के सहारे छत देकर छोड़ दिया और वहां से वापस लौट गया। राजाराम गोश्वामी ने दावा किया कि उस ऐतिहासिक घटना का प्रमाण आज भी वहाँ मौजूद है। औरंगजेब ने फारसी भाषा में एक माफीनामा लिखा था, जो इस बात का साक्ष्य है कि उसे अपनी भूल का अहसास हुआ था। उसने मंदिर के नियमित पूजन और रखरखाव के लिए धनराशि उपलब्ध कराने का वादा भी किया था। आज भी राजा भर्तहरि का यह समाधि स्थल भक्तों के लिए आस्था का प्रमुख केंद्र बना हुआ है। हर दिन यहां 1,000 से अधिक भक्त दर्शन और पूजन के लिए पहुँचते हैं। अपनी मनोकामना पूर्ण होने पर श्रद्धालु यहां घंटा अर्पित करते हैं और मंदिर की प्राचीन दीवारों में आज भी उस अतीत की गूंज सुनाई देती है।

चेतन तिवारी पाबना के उत्तर प्रदेश संवाददाता हैं और राज्य की राजनीति, प्रशासन तथा जमीनी मुद्दों को कवर करते हैं। लखनऊ में रहते हुए वे जिलों से लेकर विधानसभा तक की खबरें संतुलित रिपोर्टिंग के साथ पाठकों तक पहुंचाते हैं। आम लोगों के मुद्दों और स्थानीय घटनाओं पर उनका खास फोकस रहता है।

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